<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863</id><updated>2012-02-14T11:58:31.147-08:00</updated><category term='स्मृति'/><category term='गाहे-बगाहे'/><category term='नववर्ष'/><category term='कहानियाँ'/><category term='मैं और मेरा जीवन (आत्मकथ्य)'/><category term='लघुकथाएं'/><category term='ग़ज़ल'/><category term='कविताएं'/><title type='text'>सृजन-यात्रा</title><subtitle type='html'>सुभाष नीरव का रचना-सफ़र</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>47</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6394118030464854784</id><published>2012-02-08T06:21:00.000-08:00</published><updated>2012-02-08T06:31:25.953-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-D_kB78LTrGY/TzKFysTLQbI/AAAAAAAAAk4/7w7Qmfauu8g/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5706770783763382706" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-D_kB78LTrGY/TzKFysTLQbI/AAAAAAAAAk4/7w7Qmfauu8g/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मित्रो&lt;br /&gt;कभी-कभी हमें अपनी नई लिखी कोई रचना अधिक संतोषजनक नहीं लगती। ऐसा नहीं है कि वह रचना नहीं होती, पर हम उसमें कुछ और अच्छा और श्रेष्ठ लाने की कोशिश करते रहते हैं। एक ज़माना था कि ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक में छपना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी। हर नया-पुराना लेखक उसमें छपने को लालायित रहा करता था। धर्मवीर भारती जी सम्पादक हुआ करते थे। कहा यह भी जाता था कि ‘धर्मयुग’ में यदि किसी की कहानी छप जाती थी तो उसे कथाकार मान लिया जाता था। उस समय के लेखक ‘धर्मयुग’ में किसी न किसी रूप में प्रवेश पाना चाहते थे। कहानी, कविता, बाल कविता अथवा बाल कहानी के रूप में। जब मेरी लघुकथाएं उन दिनों ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुईं और साथ ही साथ लघुकथा को पूर्णत: समर्पित लघु-पत्रिकाओं में भी छपने लगीं, तो एक दिन मुझे ‘धर्मयुग’ से मनमोहन सरल जी का पत्र आया। उन्होंने यह बताते हुए कि ‘धर्मयुग’ में अच्छी लघुकथाएं प्रकाशित करने का सिलसिला प्रारंभ किया जा रहा है(तब ‘धर्मयुग’ में लघुकथाएं नहीं छपा करती थीं), मुझसे उन्होंने दो अप्रकाशित लघुकथाएं भेजने को लिखा था। उस पत्र को पाकर मेरे पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। एक नशा-सा तारी हो गया था। पर सवाल था कि कौन-सी लघुकथाएँ भेजूं। लिखी हुईं लघुकथाओं में दो-तीन को छोड़कर सभी प्रकाशित हो चुकी थीं। अब संकट यह था कि जो दो-तीन लघुकथाएं अभी तक अप्रकाशित थीं, उनसे मैं स्वयं संतुष्ट नहीं था। और जिस तारीख़ तक लघुकथाएं मांगी गई थीं, वह निकट थी। दो-चार दिन नई लघुकथा लिखने में जाया किए, पर कामयाबी नहीं मिली। तब, अप्रकाशित लघुकथाओं पर फिर से काम किया और जब उनमें से दो लघुकथाएँ कुछ ठीकठाक –सी लगीं, तो मैंने ‘धर्मयुग’ को पोस्ट कर दीं। मन में धुकधुक-सी लगी रही कि पता नहीं वे लघुकथाएँ ‘धर्मयुग’ को पसन्द आती भी हैं कि नहीं। पर दोस्तों, जल्द ही एक लघुकथा ‘धर्मयुग’ में छप गई। अब तो मैं हवा में उड़ने लगा। जहाँ मैं रहता था यानी आर्डनेंस फ़ैक्टरी मुरादनगर के एस्टेट में, वहाँ कवि तो ज्यादा थे, परन्तु कथा-कहानी से जुड़े मित्र दो-चार ही थे। उन्हें खुद जाकर ‘धर्मयुग’ का वह अंक दिखाया और उन्होंने लघुकथा पढ़कर मुझे बधाई दी। वह लघुकथा ‘बड़े बाबू’ शीर्षक से ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित हुई थी। बहुत बाद में जब अपनी लघुकथाओं पर पुन: काम कर रहा था, तो लघुकथा के क्षेत्र में जमे हुए और सशक्त लेखकों से इस रचना पर भी बात हुई। उन्होंने इसके शीर्षक को बदलने की बात की। कथाकार बलराम अग्रवाल का कहना था कि इस लघुकथा में सरकारी दफ़्तर की जिस बीमारी की ओर संकेत किया गया है, वह बीमारी तो हर दफ़्तर में व्याप्त है। इसलिए इस लघुकथा का शीर्षक ‘बड़े बाबू’ से ‘बीमारी’ कर दिया गया और आज यह लघुकथा इसी शीर्षक से मेरे पहले एकल लघुकथा संग्रह ‘सफ़र में आदमी’ में शामिल है। इसे मैं यहाँ अपने ब्लॉग पर अपनी लघुकथाओं की श्रृंखला की अगली कड़ी के तौर पर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपकी राय की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;-सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बीमारी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बच्चे को अस्पताल से दवा दिलाकर जब रामदीन दफ्तर पहुँचा तो बारह से ऊपर का समय हो रहा था। बड़े बाबू उसे देखते ही गुर्राये।&lt;br /&gt;''यह दफ्तर आने का समय है ?''&lt;br /&gt;''साहब, बच्चा कल से बीमार है। अस्पताल ले गया था। वहीं से आ रहा हूँ।'' रामदीन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ''सुबह दफ्तर आया था। उस वक्त तक आप नहीं आये थे। इसलिए छोटे बाबू से कहकर गया था।''&lt;br /&gt;''कहकर गया था। हुंह...'' बड़े बाबू का गुस्सा सातवें आसमान पर था। बोले, ''यहाँ इतना काम पड़ा है। यह कौन करेगा?... क्या मैं ?... बिना बताये काम से गैर-हाज़िर रहता है। रिपोर्ट करनी पड़ेगी। आये दिन बहाना। कभी बीवी बीमार है तो कभी बच्चा।''&lt;br /&gt;रामदीन बड़े बाबू की डांट सहता हुआ चुपचाप अपने काम में लग गया।&lt;br /&gt;''रामदीन...'' लंच के बाद, बड़े बाबू ने रामदीन को अपने पास बुलाया। आवाज में मिसरी घुली थी।&lt;br /&gt;''जी, साहब।''&lt;br /&gt;''ज़रा हमारा एक काम तो करना। सुपर-बाजार में कंट्रोल पर कॉपियाँ मिल रही हैं। बच्चों के लिए मंगवानी थी।'' जेब से पैसे निकालते हुए उन्होंने कहा।&lt;br /&gt;''पर साहब, वहाँ तो देर लग जायेगी। बहुत लम्बी लाइन लगती है। और इधर काम भी...''&lt;br /&gt;''अरे, छोड़ काम...। काम तो होता ही रहता है। मैं सम्हाल लूँगा।'' उन्होंने उसको पैसे थमाते हुए कहा, ''और सुन, कॉपियाँ लेकर इधर मत आना। मेरे घर देते हुए अपने घर चले जाना, समझे।... तुम्हारा बच्चा बीमार है न। यहाँ की फिक्र मत कर। मैं सब सम्हाल लूँगा।'' &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6394118030464854784?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6394118030464854784/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6394118030464854784&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6394118030464854784'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6394118030464854784'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-D_kB78LTrGY/TzKFysTLQbI/AAAAAAAAAk4/7w7Qmfauu8g/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-8708275574724513239</id><published>2012-01-04T08:34:00.001-08:00</published><updated>2012-01-04T08:43:26.621-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-Tj1nFAWnAGo/TwR_9bySfXI/AAAAAAAAAgU/-3sjFd8YBe8/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5693816522310581618" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-Tj1nFAWnAGo/TwR_9bySfXI/AAAAAAAAAgU/-3sjFd8YBe8/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;मित्रो&lt;br /&gt;लघुकथा लिखना मेरे लिए कहानी लिखने से अधिक दुष्कर कार्य रहा है। बहुत सी लघुकथाएं लिखीं और फाड़ दीं। कारण, मैं खुद ही उनसे संतुष्ट नहीं था। कई बार तो मित्रों को अच्छी लगने वाली और प्रकाशित हो चुकी लघुकथाओं को भी मुझे खारिज करना पड़ा। रमेश बत्तरा मेरे अच्छे मित्रों में से रहे। मेरा अक्सर उनसे मिलना होता था। वह कहानी और विशेषकर लघुकथा के बहुत सशक्त लेखक तो थे ही, एक अच्छे पारखी भी थे। मैं अपने आत्मकथ्य में यह स्वीकार कर चुका हूँ कि लघुकथा लेखन में और पंजाबी से हिंदी अनुवाद कर्म में मैं न आया होता, यदि रमेश बत्तरा से मेरी मित्रता न हुई होती। पंजाबी की पहली कहानी का अनुवाद मैंने उनके कहने पर ही ‘सारिका’ के लिए किया था और अपनी पहली लघुकथा भी मैंने उनके कहने पर लिखी थी जो ‘सारिका’ के ‘लघुकथा विशेषांक में ‘कमरा’ शीर्षक से छ्पी थी। वह मुझे निरन्तर लघु पत्रिकाओं में लघुकथाएं भेजने के लिए प्रेरित करते रहते थे। अपने शुरूआती दिनों में (लघुकथा लेखन के सन्दर्भ में) मैंने एक लघुकथा ‘मासूम सवाल’ शीर्षक से लिखी और एक रविवार राज नगर, गाजियाबाद स्थित उनके निवास पर जब उनसे मिलने गया तो बड़ी हिचक के साथ उन्हें यह लघुकथा पढ़कर सुनाई। पढ़कर वह काफी देर तक कुछ नहीं बोले। बोलते तो वैसे ही बहुत कम थे, मुँह में पान होने के कारण। उनकी चुप्पी मुझे परेशान करती रही। मुझे लगा, उन्हें लघुकथा पसन्द नहीं आई है और वह इस पर चुप रहना ही बेहतर समझते हैं। फिर वह उठकर बाहर चले गए। पान थूक कर आए और मेरे पास बैठते हुए बोले- “नीरव, लघुकथा तो तुमने बहुत अच्छी लिखी है, पर मैं बस यही सोच रहा हूँ कि जो शीर्षक तुमने इसे दिया है, क्या वह सही शीर्षक है? और उन्होंने सुझाया कि इसका शीर्षक ‘मासूम सवाल’ नहीं, ‘बीमार’ होना चाहिए… यह हमारी कैसी व्यवस्था है कि हम अपने बच्चों को हिन्दी और अंग्रेजी की जिस वर्णमाला से पढ़ना सिखाते हैं, उसकी वर्णमाला में पहले अक्षर ही फलों से जुड़े होते हैं और विडम्बना यह कि हम वर्णमालाओं से फलों की जानकारी तो अपने बच्चों को देते हैं, पर उन फलों को उन्हें खिला सकने की कूवत हममें नहीं होती।” इस लघुकथा का पंजाबी, बंगला, मलयालम में अनुवाद हुआ और अब तक न जाने कितनी पत्र-पत्रिकाओं में इसका प्रकाशन हो चुका है। यहाँ मैं अपनी लघुकथाओं की श्रृंखला में वही लघुकथा आपके समक्ष रख रहा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-k2yme2EkTp8/TwSAKWd0a0I/AAAAAAAAAgg/VXs-i3sAd10/s1600/safar%2Bme%2Baadmi%2528Raj%2BKamal%2529.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5693816744220846914" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 144px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-k2yme2EkTp8/TwSAKWd0a0I/AAAAAAAAAgg/VXs-i3sAd10/s200/safar%2Bme%2Baadmi%2528Raj%2BKamal%2529.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ ही, नव वर्ष में आपसे अपनी एक खुशी भी साझा कर रहा हूँ। वह यह कि मेरा पहला एकल लघुकथा-संग्रह “सफ़र में आदमी” शीर्षक से नीरज बुक सेंटर, पटपड़गंज, दिल्ली से प्रकाशित होकर आ गया है। इस संग्रह की कुछ लघुकथाएं तो मैं “सृजन-यात्रा” में प्रकाशित कर चुका हूँ, शेष भी प्रकाशित करूँगा। &lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;नव वर्ष की शुभकामनाएं…&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;बीमार &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''चलो, पढ़ो।''&lt;br /&gt;तीन वर्षीय बच्ची किताब खोलकर पढ़ने लगी, ''अ से अनाल... आ से आम...'' एकाएक उसने पूछा, ''पापा, ये अनाल क्या होता है ?''&lt;br /&gt;''यह एक फल होता है, बेटे।'' मैंने उसे समझाते हुए कहा, ''इसमें लाल-लाल दाने होते हैं, मीठे-मीठे!''&lt;br /&gt;''पापा, हम भी अनाल खायेंगे...'' बच्ची पढ़ना छोड़कर जिद-सी करने लगी। मैंने उसे डपट दिया, ''बैठकर पढ़ो। अनार बीमार लोग खाते हैं। तुम कोई बीमार हो! चलो, अंग्रेजी की किताब पढ़ो। ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने...।''&lt;br /&gt;सहसा, मुझे याद आया, दवा देने के बाद डॉक्टर ने सलाह दी थी- पत्नी को सेब दीजिये, सेब।&lt;br /&gt;लेकिन मैं मन ही मन पैसों का हिसाब लगाने लगा था। सब्जी भी खरीदनी थी। दवा लेने के बाद जो पैसे बचे थे, उसमें एक वक्त की सब्जी ही आ सकती थी। बहुत देर सोच-विचार के बाद, मैंने एक सेब तुलवा ही लिया था- पत्नी के लिए।&lt;br /&gt;बच्ची पढ़े जा रही थी, ''ए फॉर एप्पिल... एप्पिल माने सेब.. .''&lt;br /&gt;''पापा, सेब भी बीमाल लोग खाते हैं ? जैसे मम्मी ?...''&lt;br /&gt;बच्ची के इस प्रश्न का जवाब मुझसे नहीं बन पड़ा। बस, उसके चेहरे की ओर अपलक देखता रह गया था।&lt;br /&gt;बच्ची ने किताब में बने सेब के लाल रंग के चित्र को हसरत-भरी नज़रों से देखते हुए पूछा, ''मैं कब बीमाल होऊँगी, पापा ?'' &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-8708275574724513239?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/8708275574724513239/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=8708275574724513239&amp;isPopup=true' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8708275574724513239'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8708275574724513239'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-Tj1nFAWnAGo/TwR_9bySfXI/AAAAAAAAAgU/-3sjFd8YBe8/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-3441527468532639410</id><published>2011-12-20T08:04:00.001-08:00</published><updated>2011-12-20T08:43:03.647-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-44qeUyyqXIE/TvCyn1W_LXI/AAAAAAAAAgE/xIbQkVDbet0/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5688242726777073010" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-44qeUyyqXIE/TvCyn1W_LXI/AAAAAAAAAgE/xIbQkVDbet0/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;मित्रो&lt;br /&gt;अपनी लघुकथा ‘कड़वा अपवाद’ को यहाँ प्रस्तुत करते हुए मुझे विक्रम सोनी जी की याद हो आ रही है और याद आ रही है, उनकी पत्रिका ‘लघु आघात’। विक्रम सोनी जी जितने सशक्त लघुकथा लेखक रहे, उतने ही अच्छे एक संपादक भी रहे हैं। 'लघु आघात' के माध्यम से उन्होंने हिन्दी लघुकथा लेखन को प्रोत्साहन दिया और उसके विकास के लिए जो काम किया, वह भुलाया नहीं जा सकता। मेरे शुरुआती लेखन के समय में विक्रम जी ने मेरी कई लघुकथाएं ‘लघु आघात’ में प्रकाशित की थीं। मुझे आश्चर्य होता था कि उन दिनों ‘सारिका’ में छपी मेरी लघुकथा(ओं) पर इतना नोटिस नहीं लिया गया था, जितना 'लघु आघात' में छ्पी मेरी लघुकथाओं पर लिया गया। लघुकथा लेखन के क्षेत्र में तब सक्रिय अनेकों लेखकों ने मुझे जाना और कइयों से मेरा परिचय हुआ जो आज तक कायम है। आज लघुकथा के आकाश का यह सितारा गुमनामी के अंधेरे में है। कथाकार बलराम अग्रवाल ने बताया कि वह अब उज्जैन में रहते हैं और लिख-पढ़ सकने की स्थिति में नहीं हैं। ईश्वर उन्हें स्वस्थ-सानन्द रखे, यही कामना करते हुए आपके समक्ष अपनी लघुकथा 'कड़वा अपवाद ' प्रस्तुत कर रहा हूँ। आपकी प्रतिक्रिया की मुझे प्रतीक्षा रहेगी।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;कड़वा अपवाद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेलवे क्रॉसिंग। फाटक बन्द होने के कारण बस एक झटके के साथ रुक गयी। तभी एक औरत गोद में बच्चा लिये हुए बस में चढ़ी।&lt;br /&gt;''बाऊजी... भाई साहब... मुसीबत की मारी गरीब आपके आगे हाथ फैलाकर भीख मांगती... रात ठंड से मेरा आदमी गुजर गया साब... ल्हास के कफन के वास्ते मांगती... झूठ नीं बोलती... बाऊजी... बच्चे की कसम खाती... पेट की खातिर नहीं, आदमी की ल्हास के वास्ते हाथ फैलाती... वहाँ गली के मोड़ पर पड़ी है ल्हास... मेरी मदद करो, मेरे माई-बाप... रुपया-दो रुपया गरीब की झोली में डालकर... भगवान आपकी मदद करेगा, मेरे मालिक...''&lt;br /&gt;उसका करुण रुदन सुनकर सभी के दिल पसीजने लगे। वह बार-बार बच्चे की कसम खाती, झुककर बैठे हुए लोगों के पैरों को छूती और जोरों से प्रलाप करने लगती।&lt;br /&gt;लोग अपनी जेबें टटोलने लगे। एक ने दिया तो सभी देने लगे। कोई रुपया, तो कोई दो रुपया दे रहा था। किसी-किसी ने तो पाँच-दस का नोट भी दिया। देखते-देखते, उसके पल्लू में तीस-चालीस रुपये जमा हो गये। वह फिर भी मांगे जा रही थी। मेरे पास आकर उसने मेरे पैर भी छूने चाहे। मुझे यह सब ढोंग लग रहा था। जानता था कि भीख मांगने के लिए आजकल किस-किस तरह के हथकंडे अपनाये जाते हैं। मैंने उसे बेरहमी से झिड़क दिया, ''बन्द करो यह ड्रामेबाजी... तुम्हारा कोई आदमी-वादमी नहीं मरा है... भीख मांगने का अनोखा तरीका खोज निकाला है तुम लोगों ने...''&lt;br /&gt;''अरे भई, नहीं देना तो मत दो, पर बेचारी को डांटो तो नहीं...'' बस में से एक आवाज उभरी।&lt;br /&gt;''यह सब नाटक कर रही है। अभी कुछ देर बाद इसका आदमी दूसरी बस में चढ़ेगा और कहेगा, मेरी औरत मर गयी... उसके कफन के वास्ते पैसे चाहिएँ...ये लोग भीख मांगने के लिए कभी अपनी माँ को मारते हैं तो कभी अपनी बीवी को...कभी बाप को तो कभी बेटे को...।''&lt;br /&gt;''अरे, बेचारी अपने बच्चे की कसम खा रही है। कोई झूठ बोल रही होगी क्या ?'' दूसरी आवाज उभरी।&lt;br /&gt;''जो भीख मांगने के लिए अपने आदमी को मार सकती है, उसके लिए बच्चे की कसम खाना कोई बड़ी बात नहीं है।'' मैं उत्तेजित होकर बोल रहा था, ''यह सब ढोंग है। नहीं यकीन तो चलो, मैं दिखाता हूँ... नशा करके पड़ा होगा इसका खसम...।''&lt;br /&gt;मेरी बातों का कुछ असर-सा हुआ लोगों पर। फाटक अभी भी बन्द था। बस चलने में अभी काफी देर थी।&lt;br /&gt;''चल, दिखा, कहाँ है लाश?'' मैंने उस औरत से कहा।&lt;br /&gt;''उस गली के मोड़ पर पड़ी है।'' औरत ने इशारे से बताया।&lt;br /&gt;मैंने संग चलने को कहा तो वह आनाकानी करने लगी। अब अन्य लोग भी उसके पीछे पड़ गये, ''चल दिखा, कहाँ मरा पड़ा है तेरा आदमी...।'' उसके लिए अब बचना मुश्किल था। वह चुपचाप चल दी। मैं कुछ लोगों के साथ उसके पीछे हो गया। गली के मोड़ पर पहुँचकर देखा, वहाँ कोई लाश वगैरह नहीं थी। एक विजयी मुस्कान मेरे होंठों पर तैर गई। लोगों ने सख्ती से पूछा, ''कहाँ है लाश ?... झूठ बोलती थी !''&lt;br /&gt;वह रोती हुई कुछ और आगे बढ़ी।&lt;br /&gt;कुछ ही दूरी पर कुछ लोग किसी को घेरे हुए खड़े थे। वह औरत आगे बढ़कर जमीन पर लेटे हुए आदमी से लिपट गयी और जोर-जोर से रोने लगी। मुझे लगा, मेरे पैर काँपने-से लगे हैं... तभी, मैं आगे बढ़कर बोला, ''साला, बन रहा है... नशा करके लेटा होगा...'' और मैंने एक झटके से उसके ऊपर की चिथड़ा हुई धोती को खींचकर एक तरफ कर दिया।&lt;br /&gt;मेरे पाँव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। वह तो सचमुच ही ठंड से अकड़कर मर चुका था।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-3441527468532639410?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/3441527468532639410/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=3441527468532639410&amp;isPopup=true' title='23 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3441527468532639410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3441527468532639410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-44qeUyyqXIE/TvCyn1W_LXI/AAAAAAAAAgE/xIbQkVDbet0/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-8806501853884731008</id><published>2011-11-09T23:33:00.000-08:00</published><updated>2011-11-08T23:42:53.979-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-ZRg-gWzhaKg/TrotPweWRaI/AAAAAAAAAfA/U9y5RTDDUfM/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5672896429360039330" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-ZRg-gWzhaKg/TrotPweWRaI/AAAAAAAAAfA/U9y5RTDDUfM/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;मित्रो&lt;br /&gt;‘वॉकर’ मेरी उन लघुकथाओं में से एक है जो मुझे भी बहुत प्रिय रही हैं। यह मेरी शुरूआती दिनों की लघुकथा है और कई बार पुरस्कृत हो चुकी है। यह उन दिनों की लघुकथा है, जब सौ रूपये का नोट बहुत अहमियत रखता था परन्तु आज सौ रूपये की कीमत कुछ भी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;वॉकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-xRvGUxTxmAM/TrotfRM7NjI/AAAAAAAAAfM/HnS8mJXGRbk/s1600/imagesCAGUPZS4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5672896695843370546" style="WIDTH: 107px; CURSOR: hand; HEIGHT: 127px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/-xRvGUxTxmAM/TrotfRM7NjI/AAAAAAAAAfM/HnS8mJXGRbk/s200/imagesCAGUPZS4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;''सुनो जी, अपनी मुन्नी अब खड़ी होकर चलने की कोशिश करने लगी है।'' पत्नी ने सोते समय पास सोयी हुई मुन्नी को प्यार करते हुए मुझे बताया।&lt;br /&gt;''पर, अभी तो यह केवल आठ ही महीने की हुई है!'' मैंने आश्चर्य व्यक्त किया।&lt;br /&gt;''तो क्या हुआ? मालूम है, आज दिन में इसने तीन-चार बार खड़े होकर चलने की कोशिश की।'' पत्नी बहुत ही उत्साहित होकर बता रही थी, ''लेकिन, पाँव आगे बढ़ाते ही धम्म से गिर पड़ती है।''&lt;br /&gt;मुन्नी हमारी पहली सन्तान है। इसलिए हम उसे कुछ अधिक ही प्यार करते हैं। पत्नी उसकी हर गतिविधि को बड़े ही उत्साह से लेती है। मुन्नी का खड़े होकर चलना, हम दोनों के लिए ही खुशी की बात थी। पत्नी की बात सुनकर मैं भी सोयी हुई मुन्नी को प्यार करने लग गया।&lt;br /&gt;एकाएक पत्नी ने पूछा, ''सुनो, वॉकर कितने तक में आ जाता होगा ?''&lt;br /&gt;''यही कोई सौ-डेढ़ सौ में...।'' मैंने अनुमानत: बताया।&lt;br /&gt;''कल मुन्नी को वॉकर लाकर दीजियेगा।'' पत्नी ने कहा, ''वॉकर से हमारी मुन्नी जल्दी चलना सीख जायेगी।''&lt;br /&gt;मैं सोच में पड़ गया। महीना खत्म होने में अभी दस-बारह दिन शेष थे और जेब में कुल डेढ़-दौ सौ रुपये ही बचे थे। मेरे चेहरे पर आयी चिन्ता की शिकन देखकर पत्नी बोली, ''घबराओ नहीं, सौ रुपये मेरे पास हैं, ले लेना। वक्त-बेवक्त के लिए जोड़कर रखे थे। कल ज़रूर वॉकर लेकर आइयेगा।''&lt;br /&gt;सुबह तैयार होकर दफ्तर के लिए निकलने लगा तो पत्नी ने सौ का नोट थमाते हुए कहा, ''घी बिलकुल खत्म हो गया है और चीनी, चाय-पत्ती भी न के बराबर हैं। शाम को लेते आना। परसों दीदी और जीजा जी भी तो आ रहे हैं न!''&lt;br /&gt;मैंने एक बार हाथ में पकड़े हुए सौ के नोट को देखा और फिर पास ही खेलती हुई मुन्नी की ओर। मैंने कहा, ''मगर, वह मुन्नी का वॉकर...।''&lt;br /&gt;''अभी रहने दो। पहले घर चलाना ज़रूरी है।''&lt;br /&gt;मैंने देखा, मुन्नी मेरी ओर आने के लिए उठकर खड़ी हुई ही थी कि तभी धम्म् से नीचे बैठकर रोने लगी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-8806501853884731008?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/8806501853884731008/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=8806501853884731008&amp;isPopup=true' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8806501853884731008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8806501853884731008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-ZRg-gWzhaKg/TrotPweWRaI/AAAAAAAAAfA/U9y5RTDDUfM/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-7203576514777393819</id><published>2011-10-18T07:06:00.001-07:00</published><updated>2011-10-18T07:13:11.155-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-aeTL-dQKIRU/Tp2IwPTbx3I/AAAAAAAAAeE/eGvBZdtPhWo/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5664834268625094514" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-aeTL-dQKIRU/Tp2IwPTbx3I/AAAAAAAAAeE/eGvBZdtPhWo/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;em&gt;मित्रो&lt;br /&gt;'सृजन-यात्रा' ब्लॉग पर जनवरी 2011 से मैंने अपनी लघुकथाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था। अब तक कुल छह लघुकथाएं ही प्रकाशित हुई हैं। अपनी सभी लघुकथाएं एक एक करके मैं 'सृजन-यात्रा' में प्रकाशित करुँगा। मेरी ये सभी लघुकथाएं शीघ्र ही पुस्तक रूप में भी आपके समक्ष होंगी - 'सफ़र में आदमी' शीर्षक से जो भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित होने जा रहा है। इसी संग्रह में से इस बार प्रस्तुत है एक और लघुकथा- 'अकेला चना'... आशा है, आप अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवश्य अवगत करायेंगे।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आप सबको दीप-पर्व दीपावली की अनेक शुभकामनाएं....&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;अकेला चना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस पहले ही आधा घंटा लेट हो चुकी थी। दफ्तर जाने वाले सभी यात्री चीख-चिल्ला रहे थे। रास्ते में चैकिंग-स्टाफ खड़ा था। बस रुकवाकर चैकिंग की जाने लगी। सभी गुस्से में बड़बड़ाने लगे। पिछले दो दिनों से मैं लेट पहुंच रहा था। बॉस ने कल वार्निंग भी दी थी। मुझसे नहीं रहा गया।&lt;br /&gt;''बस पहले ही आधा घंटा लेट है। इसे रोककर चैकिंग करने से हम और लेट हो जायेंगे। आप चलती बस में चैकिंग क्यों नहीं करते ?'' सीट से उठकर मैंने चैकिंग-स्टाफ से कहा।&lt;br /&gt;''तू म्हारा अफसर लागै है के ?'' उनमें से एक बोला, ''हमणै आपणी ड्यूटी करणी सै। बस लेट हो रीयै तो हम के करैं ?''&lt;br /&gt;''यह गलत तरीका है आपका...!'' मैंने रोष प्रकट किया। मुझे लगा, मेरी आवाज़ हद से ज्यादा तेज़ हो गयी थी।&lt;br /&gt;''घणा शोर नी कर, बस चैक होण दे।''&lt;br /&gt;''चलती बस भी चैक हो सकती है। बेवजह आप बस को नहीं रोक सकते। हम सब लोग दफ्तर के लिए पहले ही लेट हुए जा रहे हैं।'' मैं अकेला ही उनसे अड़ गया।&lt;br /&gt;''रोक कै ई होगी चैक...भले ही घंटा लागै।'' दूसरा चैकर मुझे घूरते हुए बोला, ''चल, आपणा टिकट दिखा।''&lt;br /&gt;मैंने खीझते हुए अपना टिकट उसे थमा दिया। वह टिकट लेकर बस से नीचे उतर गया और बोला, ''इब तू नीचे आ जा... घणा शोर मचावै था, बेटिकट चले है...।''&lt;br /&gt;मैंने प्रतिवाद किया, ''मेरा टिकट आपके हाथ में है, मैं बेटिकट नहीं हूँ ?''&lt;br /&gt;वह हँसा। सभी चैकर मुझे घेरकर खड़े हो गये।&lt;br /&gt;''इस बस का टिकट ना है ये।''&lt;br /&gt;“इसी बस का है ये टिकट…” मैं लगभग चीख ही पड़ा था।&lt;br /&gt;''हमणै बेईमान बताण लाग रीया सै...चल।'' उसने मुझे एक ओर धकेला और बस को चलने की व्हिसिल दे दी।&lt;br /&gt;एक क्षण मैंने जाती हुई बस की ओर देखा। बस में बैठे हुए लोग उपहासभरी दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे।&lt;br /&gt;''घणा नेता नी बणा करते... चल, निकाल सौ रुपइया...।''&lt;br /&gt;हाथों में पकड़ी सौ रुपये की पर्ची को मैंने एक बार गुस्से से देखा और फिर दांत पीसते हुए उसे चिन्दी-चिन्दी करके वहीं हवा में बिखेर दिया।&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-7203576514777393819?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/7203576514777393819/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=7203576514777393819&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7203576514777393819'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7203576514777393819'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-aeTL-dQKIRU/Tp2IwPTbx3I/AAAAAAAAAeE/eGvBZdtPhWo/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-1470175850598520366</id><published>2011-09-10T22:06:00.000-07:00</published><updated>2011-09-10T22:09:13.552-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/-CrGpt6wMgEs/TmxCZIkjhrI/AAAAAAAAAdY/C2edZNFKcj8/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 130px; height: 98px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-CrGpt6wMgEs/TmxCZIkjhrI/AAAAAAAAAdY/C2edZNFKcj8/s200/images.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5650964632008099506" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:worddocument&gt;   &lt;w:view&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   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गया और अभी भी बच्चों को इकट्ठा करके &lt;/span&gt;'&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;अ आ इ ई&lt;/span&gt;' &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;पढ़ा रहा हूँ।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;एक बार मुझे शहर जाना पड़ा। ठहरने के लिए मैं राकेश के घर चला गया। सुबह-सुबह जब मैं उसके घर पहुँचा तो वह कुछेक बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा था। दो-तीन बैच पढ़ाकर नौ बजे वह स्कूल चला गया। शाम को चार बजे के करीब लौटा। कुछ बच्चे पहले से ही आये बैठे थे। वह तुरन्त उनको पढ़ाने बैठ गया। आठ-आठ&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;दस-दस बच्चों के कई बैच उसने रात नौ बजे तक पढ़ाये।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;जब सभी बच्चे पढ़कर चले गये तो मैंने उससे पूछा&lt;/span&gt;, ''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;राकेश&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;इतने बच्चों को तुम ट्यूशन....।&lt;/span&gt;''&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;इसमें क्या मुश्किल है &lt;/span&gt;? &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;सीधा-सा तरीका है।&lt;/span&gt;''&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;क्या &lt;/span&gt;?'' &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;मैंने उत्सुकता जाहिर की।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;वह मेरे बहुत करीब खिसक आया जैसे कोई राज़ की बात बताने जा रहा हो।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बात यह है&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;यार&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;परीक्षा के दिनों में अंग्रेजी विषय की कापियाँ मैं ही जाँचता हूँ। छमाही परीक्षा में मैं अधिकांश बच्चों को फेल कर देता हूँ&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;या बहुत कम नंबर देता हूँ। बच्चे हिन्दी में या किसी अन्य भाषा में भले ही कम नंबर लायें या फेल हो जायें&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;कोई भी अभिभावक यह नहीं चाहता कि उसका बच्चा अंग्रेजी में फिसड्डी रहे।&lt;/span&gt;''&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;फिर &lt;/span&gt;?''&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;फिर क्या &lt;/span&gt;?'' &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;वह बोला&lt;/span&gt;, ''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;बस&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;कुछ ही दिनों बाद कुछ बच्चों के अभिभावक मुझसे मिलते हैं और अनुरोध करते हैं कि मैं उनके बच्चे को ट्यूशन पढ़ाऊँ। कुछेक अभिभावकों से मैं ख़ुद भी मिलता हूँ। उनसे कहता हूँ- देखिये&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;आपका बच्चा अंग्रेजी में बहुत कमजोर है। आप स्वयं भी इसे घर में पढ़ाया करें। बस&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;तुम तो जानते ही हो&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;आजकल किस अभिभावक के पास इतना समय है कि वह अपने बच्चों के संग सिर-खपाई करे। सो&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;वे कह उठते हैं- मास्टर जी&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;आप ही हमारे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया कीजिये न। और मैं स्वीकार कर लेता हूँ।&lt;/span&gt;''&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-tab-count:1"&gt;            &lt;/span&gt;&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;मुझे अवाक् देखकर उसने अपनी दायीं आँख होले से दबाई और मुसकराकर बोला&lt;/span&gt;, ''&lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;क्यों&lt;/span&gt;, &lt;span  lang="HI" style="font-family:Mangal;"&gt;अच्छा तरीका है न&lt;/span&gt;?''&lt;/p&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-1470175850598520366?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/1470175850598520366/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=1470175850598520366&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1470175850598520366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1470175850598520366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/09/blog-post_10.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-CrGpt6wMgEs/TmxCZIkjhrI/AAAAAAAAAdY/C2edZNFKcj8/s72-c/images.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-1607657556232956180</id><published>2011-06-27T08:49:00.000-07:00</published><updated>2011-06-27T08:52:34.013-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-TUTYi-v37qs/Tgim-MD79nI/AAAAAAAAAdI/qwkcBbD-v-c/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5622927722091902578" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-TUTYi-v37qs/Tgim-MD79nI/AAAAAAAAAdI/qwkcBbD-v-c/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;रंग-परिवर्तन&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर मन्त्री बनने का मनोहर लाल जी का पुराना सपना साकार हो ही गया। शपथ-ग्रहण समारोह के बाद वह मंत्रालय के सुसज्जित कार्यालय में पहुँचे। वहाँ उनके प्रशंसकों का तांता लगा हुआ था। सभी उन्हें बधाई दे रहे थे।&lt;br /&gt;देश-विदेश के प्रतिष्ठित चैनलों, पत्रों और पत्रिकाओं के सैकड़ों पत्रकार व संवाददाता भी वहाँ उपस्थित थे।&lt;br /&gt;एक संवाददाता ने उनसे पूछा, ''मन्त्री बनने के बाद आप अपने मंत्रालय में क्या सुधार लाना चाहेंगे ?''&lt;br /&gt;उन्होंने तत्काल उत्तर दिया, ''सबसे पहले मैं फिजूलखर्ची को बन्द करूंगा।''&lt;br /&gt;''देश और देश की जनता के बारे में आपको क्या कहना है ?''&lt;br /&gt;इस प्रश्न पर वह नेताई मुद्रा में आ गये और धारा-प्रवाह बोलने लगे, ''देश में विकास की गति अभी बहुत धीमी है। देश को यदि उन्नति और प्रगति के पथ पर ले जाना है तो हमें विज्ञान और तकनॉलोजी का सहारा लेना होगा। देश की जनता को धार्मिक अंधविश्वासों से ऊपर उठाना होगा। तभी हम इक्कीसवीं सदी में अपने पहुँचने को सार्थक सिद्ध कर सकेंगे।''&lt;br /&gt;तभी, उनके निजी सहायक ने फोन पर बजर देकर सूचित किया कि छत्तरगढ़ वाले आत्मानंदजी महाराज उनसे मिलना चाहते हैं। मन्त्री जी ने कमरे में उपस्थित सभी लोगों से क्षमा-याचना की। सब-के-सब कमरे से बाहर चले गये।&lt;br /&gt;महाराज के कमरे में प्रवेश करते ही, मन्त्री जी आगे बढ़कर उनके चरणस्पर्श करते हुए बोले, ''महाराज, मैं तो स्वयं आपसे मिलने को आतुर था। यह सब आपकी कृपा का ही फल है कि आज...''&lt;br /&gt;आशीष की मुद्रा में महाराज ने अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाया और चुपचाप कुर्सी पर बैठ गये। उनकी शान्त और गहरी आँखों ने पूरे कमरे का निरीक्षण किया और फिर यकायक चीख-से उठे, ''बचो, मनोहर लाल, बचो!.... इस हरे रंग से बचो। यह रंग तुम्हारी राशि के लिए अशुभ और अहितकारी है।''&lt;br /&gt;मन्त्री महोदय का ध्यान कमरे में बिछे कीमती कालीन, सोफा-कवर्स और खिड़कियों पर लहराते पर्दों की ओर गया। पूरे कमरे में हरीतिमा फैली थी। अभी कुछ माह पहले ही पूर्व मन्त्री क़ी इच्छा पर इसे सुसज्जित किया गया था।&lt;br /&gt;''जानते हो, तुम्हारे लिए नीला रंग ही शुभ और हितकारी है।'' महाराज ने चेताया।&lt;br /&gt;मन्त्री महोदय ने तुरन्त निजी सचिव को तलब किया। उससे कुछ बातचीत की और फिर महाराज को साथ लेकर अपनी कोठी की ओर निकल गये।&lt;br /&gt;अब मंत्रालय के छोटे-बड़े अधिकारी रंग-परिवर्तन के लिए युद्धस्तर पर जुटे थे।&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-1607657556232956180?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/1607657556232956180/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=1607657556232956180&amp;isPopup=true' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1607657556232956180'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1607657556232956180'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-TUTYi-v37qs/Tgim-MD79nI/AAAAAAAAAdI/qwkcBbD-v-c/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-3231484569248418488</id><published>2011-05-07T10:30:00.000-07:00</published><updated>2011-07-02T04:00:18.156-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग़ज़ल'/><title type='text'>ग़ज़ल</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-NELU8Gk-n7E/TcWGBWGaj3I/AAAAAAAAAb8/FLI5XfMlalM/s1600/44375699.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5604032669002927986" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 97px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-NELU8Gk-n7E/TcWGBWGaj3I/AAAAAAAAAb8/FLI5XfMlalM/s200/44375699.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;मित्रो&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;em&gt;'सृजन-यात्रा' में इस माह अपनी लघुकथाओं के प्रकाशन के सिलसिले को विराम देते हुम 'माँ दिवस' पर अपनी एक ग़ज़ल आपसे साझा कर रहा हूँ। यह तो ग़ज़ल के पारखी ही बताएँगे कि यह ग़ज़ल है भी कि नहीं, पर 'माँ' को लेकर मेरे भीतर जो पवित्र भावना रही है, उसे इसी रूप में अभिव्यक्त कर पाया हूँ। आशा है, आप भी मेरे भीतर की भावना से सहमत होंगे…&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(204,0,0)"&gt;माँ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;&lt;span class=""&gt;दुनिया भर की दुख- तक़लीफें भुला लिया करता हूँ&lt;br /&gt;माँ के दामन में जब सर को छुपा लिया करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ देती जब ढारस मुझको मेरी नाकामी पे&lt;br /&gt;अपने भीतर दूनी ताकत जुटा लिया करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खफ़ा खफ़ा सी नींद मेरी तब मुझे मनाती है&lt;br /&gt;माँ की बांहों को तकिया जब बना लिया करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँ ही मंदिर, माँ ही मस्जिद, माँ गिरजा - गुरद्वारा&lt;br /&gt;रब के बदले माँ को मैं सर नवा लिया करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही हुनर सीखा है मैंने हर पल खटती माँ से&lt;br /&gt;बोझ कोई भी हो हंस कर उठा लिया करता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मायूसी के अँधियारों में जब-जब घिर जाता हूँ&lt;br /&gt;माँ की यादों के दीपक तब जला लिया करता हूँ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#000000;"&gt;00&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-3231484569248418488?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/3231484569248418488/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=3231484569248418488&amp;isPopup=true' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3231484569248418488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3231484569248418488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='ग़ज़ल'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-NELU8Gk-n7E/TcWGBWGaj3I/AAAAAAAAAb8/FLI5XfMlalM/s72-c/44375699.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6474226030736782376</id><published>2011-04-05T08:30:00.000-07:00</published><updated>2011-04-05T08:33:13.782-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-St7fF8-g684/TZs1y5J3_KI/AAAAAAAAAbs/Nov8GE0GVt4/s1600/95303bd88375623c.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 150px; height: 135px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-St7fF8-g684/TZs1y5J3_KI/AAAAAAAAAbs/Nov8GE0GVt4/s200/95303bd88375623c.jpg" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5592122510762572962" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;&lt;b style="color: rgb(255, 0, 0);"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रफ़-कॉपी&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-size: 20pt; font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;  &lt;p class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal; color: rgb(51, 51, 255);" lang="HI"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;बाबू रामप्रकाश खाना खा चुकने के बाद&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;रो&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;ज़&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;की तरह आज भी अपने कमरे में बैठकर ऑफिस से लाया काम करने में जुट गये। कुछ ही देर बाद&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;उनका दस वर्षीय बेटा रमेश कमरे में दाख़िल हुआ और समीप आकर बोला&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, ''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;पापा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;आप मेरे रफ-काम के लिए कापी नहीं लाए &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;?''&lt;/span&gt;  &lt;/div&gt;&lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;बाबू रामप्रकाश पलभर अपनी याददाश्त को कोसते रहे। पिछले तीन दिनों से वह भूलते आ रहे थे। आज फिर उन्होंने बेटे को समझाने की कोशिश की&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, ''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;ओह बेटा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;हम आज फिर भूल गये। देखो न&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;कितना काम रहता है! याद ही नहीं रहता&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;सच।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;हम कुछ नहीं जानते। आप तीन दिन से टाले जा रहे हैं। हमें कापी आज ही चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;'' &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;रमेश ज़िद करने लगा।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;बेटा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;रात को इस वक्त दुकानें भी बंद हो गयी होंगी। कल हम ज़रूर ला देंगे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;पर&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;बेटा अड़ा रहा। बाबू रामप्रकाश सोच में पड़ गये। एकाएक उनकी नज़र मेज़ पर रखे पतले-से उस नये रजिस्टर पर पड़ी जिसे वह आज ही दफ़्तर से नयी एंट्री करने के लिए लाये थे।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;लो बेटा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;तुम इस पर अपना रफ़-काम कर लिया करो।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;'' &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;उन्होंने रमेश को रजिस्टर थमाते हुए कहा।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;रमेश ने रजिस्टर को खोलकर देखा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, ''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;पापा&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;इसमें तो खाने बने हुए हैं।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;''&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;span style=""&gt;     &lt;/span&gt;''&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;तुझे रफ़-काम करने से मतलब है या खानों से &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;?'' &lt;/span&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="HI"&gt;बाबू रामप्रकाश एकाएक गुस्सा हो उठे। रमेश रजिस्टर लिये सहमा हुआ-सा कमरे से बाहर निकल गया।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoBodyText" style="text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span style="font-size: 12pt; font-family: Mangal;" lang="AR-SA"&gt;बेटे के चले जाने के बाद बाबू रामप्रकाश ने मन ही मन सोचा - कल फिर स्टेशनरी-क्लर्क को नया रजिस्टर इशू करने के लिए चाय पिला देंगे। चाय कॉपी से सस्ती पड़ती है। फिर प्रसन्न से ऑफिस से लाया दूसरा काम करने में जुट गए।&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;  &lt;p class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;00&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6474226030736782376?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6474226030736782376/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6474226030736782376&amp;isPopup=true' title='13 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6474226030736782376'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6474226030736782376'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/04/blog-post_05.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-St7fF8-g684/TZs1y5J3_KI/AAAAAAAAAbs/Nov8GE0GVt4/s72-c/95303bd88375623c.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5772062950728182</id><published>2011-03-12T10:01:00.001-08:00</published><updated>2011-03-12T10:07:43.958-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-K_gKkBY_Lkk/TXu1e9qZVnI/AAAAAAAAAbc/Zw0oLmrcsS0/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5583255706608948850" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-K_gKkBY_Lkk/TXu1e9qZVnI/AAAAAAAAAbc/Zw0oLmrcsS0/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;बहुत-सी रचनाओं का जन्म हमारे कार्यक्षेत्र के अनुभवों से जुड़ा होता है। मेरी ऐसी अनेक कहानियाँ, लघुकथाएँ हैं जो मेरी रोजी रोटी से जुड़े कार्यक्षेत्र के तनावों में से ही उपजीं। यहाँ 'अपने क्षेत्र का दर्द' शीर्षक से जो लघुकथा प्रस्तुत की जा रही है, यह उन दिनों की उपज है जब मेरी ड्यूटी भारत सरकार के एक केन्द्रीय मंत्री के कार्यालय में थी। सन् 80-85 के बीच की बात होगी। मंत्रियों के दोहरे चरित्र मैंने तभी बहुत करीब से देखे। उनकी कथनी और करनी में बहुत बड़ा अन्तर देखने को मिला, आँखें फटी की फटी रह गईं। वो जो दिखते हैं, होते नहीं। जो होते हैं, वे दिखते नहीं। एक जबरदस्त तनाव और छटपटाहट के बीच हम पेट की खातिर कुछ नहीं कर पाते। परन्तु, उस ‘कुछ’ न कर पाने के अपराध बोध से लेखक मुक्ति का एक दूसरा रास्ता अपनाता है। मैंने भी अपनाया यानी अपने देखे-अनुभव किए को अभिव्यक्त करने का रास्ता। मैंने उस ‘सच’ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर अपने अपराधबोध और ग्लानि को कुछ कम करने का प्रयास किया और मैं सफल भी रहा। 'गोली दागो रामसिंह'(कहानी जो दिनमान टाइम्स, नई दिल्ली में प्रकाशित हुई), और 'रंग-परिवर्तन' (लघुकथा जो रमेश बत्तरा ने नवभारत टाइम्स में छापी) 'अपने क्षेत्र का दर्द' की भांति ऐसे ही माहौल से उपजी मेरी रचनाएँ हैं। 'गोली दागो रामसिंह' कहानी 'सृजन-यात्रा' में 'कहानियाँ' लेबल के अन्तर्गत प्रकाशित हो चुकी है और 'रंग परिवर्तन' लघुकथाओं के क्रम में आगे आपके समक्ष प्रस्तुत होगी।&lt;br /&gt;'अपने क्षेत्र का दर्द' लघुकथा भी 'सारिका' में सन् 1986 के आसपास प्रकाशित हुई। इसे बलराम ने वर्ष 1988 में प्रकाशित 'हिंदी लघुकथा कोश' में मेरी अन्य लघुकथाओं के साथ शामिल किया था।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;-&lt;span style="color:#006600;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;अपने क्षेत्र का दर्द&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन्त्री जी के नाम आयी सारी-की-सारी डाक चपरासी ने मेज़ पर उसके सामने रख दी।&lt;br /&gt;उन सबके बीच मुड़े-तुड़े मैले-से एक कागज ने उसका ध्यान अपनी ओर बरबस ही खींच लिया। यह&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-bEAv2xQ1C2E/TXu1P-oH08I/AAAAAAAAAbU/k0euimlcATY/s1600/girls%2Bon%2Bfile%2B2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5583255449169810370" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 94px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/-bEAv2xQ1C2E/TXu1P-oH08I/AAAAAAAAAbU/k0euimlcATY/s200/girls%2Bon%2Bfile%2B2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; अस्पष्ट शब्दों में लिखा एक पत्र था। उसने उसे निकाला और अन्त तक पढ़ा। पत्र का एक-एक शब्द एक गरीब और असहाय बाप की पीड़ा को व्यक्त कर रहा था जिसकी इकलौती बेटी को दहेज के भूखे भेड़ियों ने जिन्दा जला डाला था। इलाके के थानेदार ने ससुराल वालों के खिलाफ़ रपट लिखने की बजाय, उल्टा उसे ही बुरी तरह मारा-पीटा और धमकाया था। 'गरीबों के मसीहा', 'ईश्वर', 'देवता' आदि कितने ही विशेषणों से मन्त्री जी को सम्बोधित करते हुए उसने अपने पत्र में न्याय दिलाने की गुहार लगाई थी।&lt;br /&gt;पत्र को पढ़कर उसे अपनी बेटी का ध्यान हो आया। आये दिन वह एक नयी माँग के साथ धकेल दी जाती है - मायके में। क्या किसी दिन उसे भी ? नहीं-नहीं... वह भीतर तक काँप उठा।&lt;br /&gt;उसने तुरन्त सम्बन्धित प्रदेश के मुख्य मन्त्री के नाम चिट्ठी टाइप करवाई और मन्त्री जी के हस्ताक्षर के लिए उनके कमरे में भेज दी।&lt;br /&gt;थोड़ी ही देर बाद, मन्त्री जी ने उसे बुलाया।&lt;br /&gt;''यह चिट्ठी तुमने भिजवाई है ?''&lt;br /&gt;''जी सर! बेचारे गरीब की बेटी को जिन्दा जला डाला दरिन्दों ने दहेज के लालच में। यही नहीं सर, इलाके के थानेदार ने रपट तक दर्ज नहीं की और उस बूढ़े को बुरी तरह मारा-पीटा भी...।''&lt;br /&gt;''हूँ...'' मन्त्री जी ने एक बार उसकी ओर देखा। चिट्ठी मन्त्री जी की उँगलियों के बीच झूल रही थी, ''तुमने पत्र मुझे दिखलाने से पहले ही चिट्ठी तैयार करवा दी! मुझसे पूछा तक नहीं ?''&lt;br /&gt;''जी मैंने...'' उसने हकलाते हुए कारण स्पष्ट किया, ''बात यह है सर, कि पिछले दिनों ऐसी ही एक चिट्ठी के जवाब में आपने सम्बन्धित प्रदेश के मुख्य मन्त्री के नाम इसी प्रकार की सख़्त चिट्ठी भिजवाई थी, सो मैंने...''&lt;br /&gt;''चिट्ठी तैयार करने से पहले मुझसे पूछ लिया करो।'' कहते हुए मन्त्री जी ने अपनी उँगलियों के बीच झूलती हुई चिट्ठी को चिन्दी-चिन्दी कर नीचे रखी टोकरी में फेंका और बोले, ''तुम्हें मालूम है, वह हमारे संसदीय क्षेत्र का मामला था, और यह...''&lt;br /&gt;मन्त्री जी के कमरे में से निकलते हुए उसे लगा, जैसे उसकी अपनी बेटी जिन्दा जला दी गयी हो और वह कुछ न कर पाने के लिए शापित हो।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;00&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5772062950728182?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5772062950728182/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5772062950728182&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5772062950728182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5772062950728182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-K_gKkBY_Lkk/TXu1e9qZVnI/AAAAAAAAAbc/Zw0oLmrcsS0/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6807742155305810850</id><published>2011-02-21T00:15:00.001-08:00</published><updated>2011-02-21T00:28:32.389-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-5HezRYjgeE4/TWIhLRf4KdI/AAAAAAAAAbM/fztwqAOy0ck/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5576055766197479890" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/-5HezRYjgeE4/TWIhLRf4KdI/AAAAAAAAAbM/fztwqAOy0ck/s200/diamond-pd.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;मित्रो,&lt;br /&gt;जिस समय मैंने लघुकथा लेखन में प्रवेश किया उस समय लघुकथा लेखन में एक आन्दोलन- जैसी स्थिति थी। बड़ी व्यवसायिक पत्रिकाएँ तो लघुकथा के लिए स्थान बना ही चुकी थीं और उन्हें ससम्मान छापने भी लगी थीं। हिंदी की प्रसिद्ध कथा पत्रिका ‘सारिका’ के ‘लघुकथा विशेषांकों ने इसमें गति भी प्रदान की। इसके अतिरिक्त बहुत सी लघु- पत्रिकाएं भी मैदान में थीं जो पूरी तरह समर्पित भाव से लघुकथा के विकास और संवर्द्धन के लिए खुद को कटिबद्ध किये हुए थीं। मुझे याद आती हैं –‘लघु-आघात’ ‘मिनीयुग’ ‘क्षितिज’ ‘सनद’ पत्रिकाएँ जो अच्छी और मानक लघुकथाओं के प्रकाशन के लिए उस दिनों जानी जाती थीं और हर नया पुराना लेखक यदि कोई नई लघुकथा लिखता था तो इन पत्रिकाओं में उसे छपवाने के लिए लालायित रहता था। मेरी शुरूआती दौर की कई लघुकथाओं को ‘लघु-आघात’, ‘क्षितिज’ और ‘सनद’ में प्रकाशित होने का गौरव प्राप्त हुआ है। आरंभ में ये पत्रिकाएँ मुझे भाई रमेश बत्तरा उपलब्ध कराया करते थे, बाद में फिर मैं इनका सदस्य बन गया था और ये मुझे डाक से मिलने लग पड़ी थीं। भाई रमेश बत्तरा जब विवाह के बाद राजौरी गार्डन से नया गाजियाबाद शिफ्ट हुए तो मैं अक्सर अवकाश वाले दिन उनके घर चला जाता था। इसके दो कारण थे। एक तो उनके यहाँ ढेरों नई-पुरानी हिंदी-पंजाबी की पत्र-पत्रिकाएँ आया करती थीं जिनको देखने-पढ़ने का लालच मुझे खींच ले जाता था और दूसरा यह भी कि मैं उन दिनों मैं गाजियाबाद के बहुत निकट मुरादनगर में रहता था, जिसके कारण आने-जाने में कोई परेशानी नहीं आती थी। रमेश भाई ‘सारिका’ के दफ्तर में जब मिलते तो बहुत कम बोलते थे। उनके मुँह में पान होता और वह अपने काम में व्यस्त-से रहते। बीच-बीच में छोटी-छोटी कोई एक आध बात कर लेते थे। लेकिन घर पर वह खुलकर बात करते, घर-परिवार के बारे में, साहित्य के बारे में, नये लिखे के बारे में। कभी-कभी राजनीति के बारे में भी। वे मुझे अच्छी पत्रिकाओं में रचनाएँ भेजने के लिए प्रेरित करते रहते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों बहुत से ऐसे कॉमन-से विषय थे जिनपर हर कोई कलम चला रहा था। जैसे सामाजिक- राजनैतिक भ्रष्टाचार, पुलिस और नेताओं के चरित्र, आदि। दनादन लिखी जा रही लघुकथाओं की भीड़ में बहुत-सी अच्छी लघुकथाएँ भी दब कर रह जाती थीं। यहाँ प्रस्तुत मेरी लघुकथा ‘दिहाड़ी’ वर्ष 1984 में लिखी गई और ‘सारिका’ के वर्ष 1985 के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई। कथाकार बलराम ने इसे मेरी अन्य लघुकथाओं के साथ “हिंदी लघुकथा कोश”(वर्ष 1988) में संकलित किया। यह लघुकथा भी मेरी अन्य लघुकथाओं की भाँति पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर छपी।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;-सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;दिहाड़ी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महीने के आखिरी दिन चल रहे थे।&lt;br /&gt;इन दिनों घर में राशन-पानी सब खत्म हो चुका होता है। जब वह ड्यूटी पर रहता था तो किसी&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-W5hOBsmTgVc/TWIfVnpoJnI/AAAAAAAAAbE/ePos8dtSEL4/s1600/images1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5576053744919389810" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 124px; CURSOR: hand; HEIGHT: 238px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/-W5hOBsmTgVc/TWIfVnpoJnI/AAAAAAAAAbE/ePos8dtSEL4/s200/images1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; तरह खींच-खाँचकर ले जाता था-पहली तारीख तक। पुलिस में सिपाही होने का यह फायदा तो था ही उसे। लेकिन पिछले दो महीनों से वह मेडिकल-लीव पर चल रहा था- पीलिया के कारण। उसने सरकारी अस्पताल के डॉक्टर के आगे बहुत मिन्नत-चिरौरी की कि उसे ड्यूटी दे दे, पर वह नहीं माना और एक महीने का रेस्ट और बढ़ा दिया।&lt;br /&gt;सुबह बच्चे बिना खाये-पिये ही स्कूल चले गये थे। पत्नी ने पड़ोसियों से कुछ भी माँगने से साफ इन्कार कर दिया था। वह चुपचाप चारपाई पर लेटा सोचता रहा- सुबह तो बच्चे भूखे-प्यासे चले गये, शाम को भी क्या बिना खाये-पिये सोना पड़ेगा उन्हें ?&lt;br /&gt;वह उठकर बैठ गया। बहुत देर तक सोचता रहा।&lt;br /&gt;एकाएक उसकी नज़र खूँटी पर टँगी वर्दी पर टँगकर रह गयी।&lt;br /&gt;शाम होते ही वह वर्दी पहनकर अपने इलाके में पहुँच गया।&lt;br /&gt;रेहड़ी-पटरी वालों में उसे देखते ही हरकत आ गयी। बहुत दिनों बाद दिखाई दिया था वह। सब सलाम ठोंकने लगे। वह डंडा घुमाता हुआ सबके सामने से गुजरा- बेहद चौकन्नेपन और सावधानी के साथ।&lt;br /&gt;''अरे रतन, तू तो मेडिकल-लीव पर था! ड्यूटी ज्वाइन कर ली क्या ?''&lt;br /&gt;जिस बात का उसे डर था, वही हो गयी। घर वापसी के समय सामने से आते हुए रामसिंह ने रोककर पूछ ही लिया।&lt;br /&gt;''नहीं यार, घर पर सारा दिन यूँ ही पड़े-पड़े बोर हो जाता हूँ। सोचा, थोड़ा टहल ही आऊँ। सो, इधर ही आ गया।'' उसने सफाई दी।&lt;br /&gt;''वर्दी में हो, मैंने सोचा...''&lt;br /&gt;''वो...वो क्या है कि पत्नी ने आज सभी कपड़े धोने के लिए भिगो दिये थे। सो, वर्दी ही पहनकर आ गया इधर।'' उसने मुस्कराते हुए बात को घुमाने की कोशिश की।&lt;br /&gt;''और यह डंडा ?''&lt;br /&gt;रामसिंह का यह प्रश्न डंडे की भाँति ही आया। उसे लगा, इस प्रहार से वह चारों खाने चित्त हो गया है।&lt;br /&gt;''आदत-सी पड़ गयी है न। वर्दी पहनते ही डंडा हाथ में आ जाता है।''&lt;br /&gt;और वे दोनों एक-साथ हँस पड़े।&lt;br /&gt;रामसिंह से विदा ले, जब वह घर की ओर चला तो बहुत उत्साहित था। जेब में आयी दिहाड़ी को उसने टटोलकर देखा- काफी है।&lt;br /&gt;लेकिन तभी एक बात उसके जेहन में तेजी से उभरी और सुन्न-सा करती चली गयी- कल फिर अगर रामसिंह या कोई और टकरा गया तो!&lt;br /&gt;00 &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6807742155305810850?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6807742155305810850/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6807742155305810850&amp;isPopup=true' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6807742155305810850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6807742155305810850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-5HezRYjgeE4/TWIhLRf4KdI/AAAAAAAAAbM/fztwqAOy0ck/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-7223005425890319681</id><published>2011-01-27T23:09:00.000-08:00</published><updated>2011-02-06T00:45:05.332-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लघुकथाएं'/><title type='text'>लघुकथा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TUJsPeQySVI/AAAAAAAAAZ8/SzAs-HCj2CI/s1600/diamond-pd.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5567131102460660050" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TUJsPeQySVI/AAAAAAAAAZ8/SzAs-HCj2CI/s200/diamond-pd.jpg" style="cursor: hand; height: 79px; width: 200px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;मित्रो,&lt;br /&gt;‘सृजन-यात्रा’ ब्लॉग मई २००८ में जब आरंभ किया था, तो इसके पीछे मकसद यह था कि एक ऐसा भी ब्लॉग हो जहाँ पर केवल मैं होऊँ, मेरी स्वयं की प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाएँ हों, मेरे अपने जीवन के सुख-दुख से जुड़े अनुभव हों… ‘&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal; mso-bidi-language: HI;"&gt;&lt;span style="color: #cc0000;"&gt;सेतु-साहित्य&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;’, ‘वाटिका’, ‘गवाक्ष’, ‘साहित्य-सृजन’ और ‘कथा-पंजाब’ आदि मेरे ब्लॉग्स तो हैं हीं (जिनमें कहानी, कविता, लघुकथा, उपन्यास, संस्मरण जैसी विधाओं में रचा गया उत्तम साहित्य देने का प्रयास होता है), जहाँ मेरा उद्देश्य रहता है कि हिंदी और हिंदीतर भाषाओं के श्रेष्ठ साहित्य को अपने ब्लॉग्स के माध्यम से विश्वभर के उन हिंदी पाठकों को उपलब्ध करवाऊँ जिन्हें मंहगी प्रिंटिड पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों और मंहगी डाक प्रणाली के चलते ऐसा साहित्य सुलभ नहीं हो पाता। परन्तु उन दिनों मैं स्वयं और मेरे बहुत से करीबी मित्र भी यह चाहते थे कि मेरा एक ऐसा ब्लॉग भी हो जहाँ केवल मैं शाया होऊँ… मेरे मित्रों का यही कहना था कि मैं अन्य ब्लॉग्स के माध्यम से दूसरों का साहित्य तो साहित्य-प्रेमियों को उपलब्ध कराता ही रहता हूँ, लेकिन मुझे अपना साहित्य भी उन तक इस नई तकनीक के माध्यम से पहुँचाना चाहिए। मुझे भी लगा कि मेरी तमाम रचनाएँ जो इधर-उधर पत्र-पत्रिकाओं में, किताबों में बिखरी पड़ी हैं और अब वे पाठकों को सहज सुलभ भी नहीं हैं, क्यों न उन्हें एक स्थान पर सहेज-संभाल लूँ।&lt;br /&gt;मई २००८ से अब तक ‘सृजन-यात्रा’ में मेरी १७ कहानियाँ, १४ कविताएं, एक आत्मकथ्य का प्रकाशन हो चुका है। अभी प्रकाशित-अप्रकाशित अनेक कहानियाँ, कविताएं शेष रहती हैं और शेष रहती हैं मेरी लघुकथाएं… अत: कहानियों, कविताओं को हाल-फिलहाल यहीं विराम देते हुए जनवरी २०११ से मैं अपने इस ब्लॉग में अपनी लघुकथाओं का प्रकाशन सिलसिलेवार आरंभ करने जा रहा हूँ। इनमें से बहुत सी लघुकथाएं आपने अवश्य ही प्रिंट मीडिया में पढ़ी होंगी, कुछेक ब्लॉग्स और वेब-पत्रिकाओं में भी पढ़ी होंगी। यदि यहाँ वे आपको पुन: पढ़ने को मिल रही हैं तो इसकी वजह यही है कि मेरी तमाम लघुकथाएं यहाँ सिलसिलेवार संकलित-संग्रहित होने जा रही हैं। ये लघुकथाएं मेरे शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे लघुकथा-संग्रह “वाह मिट्टी” में संकलित हैं।&lt;br /&gt;यहाँ प्रस्तुत लघुकथा ‘कमरा’ मेरी पहली लघुकथा है जो वर्ष 1984 में लिखी गई और ‘सारिका’ के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई। कथाकार बलराम ने इसे मेरी अन्य लघुकथाओं के साथ “हिंदी लघुकथा कोश”(वर्ष 1988) में संकलित किया। यह लघुकथा कथाकार सुकेश साहनी द्वारा वर्ष 2001 में संपादित पुस्तक “समकालीन भारतीय लघुकथाएं” में भी संकलित हुई। इसके अतिरिक्त अनेकों संकलनों में, पत्र-पत्रिकाओं में इसका पुनर्प्रकाशन हुआ और यह सिलसिला अभी तक जारी है। यह अब तक पंजाबी, मराठी, तेलगू, मलयालम और बंगला भाषा में अनूदित हो चुकी है।&lt;br /&gt;मैं चाहूँगा कि मेरी लघुकथाओं पर आपकी बेबाक राय मुझे मिलती रहे…&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #006600;"&gt;-सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: 180%;"&gt;कमरा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #3333ff; font-size: 130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TUJtPGacLzI/AAAAAAAAAaE/FJl9p9OvjbY/s1600/th_IMG_0005.jpg"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5567132195570331442" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TUJtPGacLzI/AAAAAAAAAaE/FJl9p9OvjbY/s200/th_IMG_0005.jpg" style="cursor: hand; float: left; height: 120px; margin: 0px 10px 10px 0px; width: 160px;" /&gt;&lt;/a&gt;''पिताजी, क्यों न आपके रहने का इंतज़ाम ऊपर बरसाती में कर दिया जाये ?'' हरिबाबू ने वृद्ध पिता से कहा।&lt;br /&gt;''देखिये न, बच्चों की बोर्ड की परीक्षा सिर पर है। बड़े कमरे में शोर-शराबे के कारण वे पढ़ नहीं पाते। हमने सोचा, कुछ दिनों के लिए यह कमरा उन्हें दे दें।'' बहू ने समझाने का प्रयत्न किया।&lt;br /&gt;''मगर बेटा, मुझसे रोज ऊपर-नीचे चढ़ना-उतरना कहाँ हो पायेगा ?'' पिता ने चारपाई पर लेटे-लेटे कहा।&lt;br /&gt;''आपको चढ़ने-उतरने की क्या ज़रूरत है! ऊपर ही हम आपको खाना-पानी सब पहुँचा दिया करेंगे। और शौच-गुसलखाना भी ऊपर ही है। आपको कोई दिक्कत नहीं होगी।'' बेटे ने कहा।&lt;br /&gt;''और, सुबह-शाम घूमने के लिए चौड़ी खुली छत है।'' बहू ने अपनी बात जोड़ी।&lt;br /&gt;पिताजी मान गये। उसी दिन उनका बोरिया-बिस्तर ऊपर बरसाती में लगा दिया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले ही दिन, हरिबाबू ने पत्नी से कहा, ''मेरे दफ्तर में एक नया क्लर्क आया है। उसे एक कमरा चाहिए किराये पर। तीन हजार तक देने को तैयार है। मालूम करना, मोहल्ले में अगर कोई....।''&lt;br /&gt;''तीन हजार रुपये!'' पत्नी सोचने लगी, ''क्यों न उसे हम अपना छोटा वाला कमरा दे दें?''&lt;br /&gt;''वह जो पिताजी से खाली करवाया है ?'' हरिबाबू सोचते हुए से बोले, ''वह तो बच्चों की पढ़ाई के लिए...।''&lt;br /&gt;''अजी, बच्चों का क्या है!'' पत्नी बोली, ''जैसे अब-तक पढ़ते आ रहे हैं, वैसे अब भी पढ़ लेंगे। उन्हें अलग से कमरा देने की क्या ज़रूरत है ?''&lt;br /&gt;अगले दिन वह कमरा किराये पर चढ़ गया।&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-7223005425890319681?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/7223005425890319681/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=7223005425890319681&amp;isPopup=true' title='21 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7223005425890319681'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7223005425890319681'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='लघुकथा'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TUJsPeQySVI/AAAAAAAAAZ8/SzAs-HCj2CI/s72-c/diamond-pd.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>21</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5914515103558840850</id><published>2010-12-31T00:53:00.000-08:00</published><updated>2010-12-31T00:58:20.353-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नववर्ष'/><title type='text'>अहा !  नववर्ष 2011… तुम्हारा स्वागत है…</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TR2ag4L1Y2I/AAAAAAAAAZ0/sx_oCrtBejE/s1600/thumbnailCAC7VSXA.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5556767404873573218" style="WIDTH: 160px; CURSOR: hand; HEIGHT: 120px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TR2ag4L1Y2I/AAAAAAAAAZ0/sx_oCrtBejE/s200/thumbnailCAC7VSXA.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;प्रिय दोस्तो !&lt;br /&gt;आज 31 दिसंबर है यानि जाते हुए साल का आख़िरी दिन… आज हमें इसे विदा करना है, अलविदा कहना है… और नये साल 2011 को खुशामदीद कहना है… उसका स्वागत करना है… वर्ष 2010 जैसा भी रहा, इसने हमें जो कुछ भी दिया, उसे हमने स्वीकार किया। चाहे वे सुख भरे दिन थे अथवा दुख-तकलीफ़ों से भरे दिन… चाहे सपनों का टूटना था या हमारे भीतर नई आशाओं का बीजारोपण… जो कुछ भी इस जाते वर्ष में हमने पाया या खोया, उसका हमें इस विदायगी के समय कोई शिकवा-गिला नहीं करना है और इसे खुशी-खुशी विदा करना है… इसे अलविदा कहना है। जो कमियाँ- खामियाँ रह गईं, जो कार्य अधूरे रह गए, उन्हें नए साल में पूरा करना है। आओ इस नव वर्ष 2011 का हम इस विश्वास के साथ भरपूर स्वागत करें कि इस नये साल में हमारे अन्दर की सारी कालिमाएं खत्म होंगी… घृणा- द्वेष और नफ़रत की बीज नष्ट होंगे, हमारे दिलों में प्रेम और सोहार्द के सोते फूटेंगे… नकारात्मक्ता को छोड़ सकारात्मकता को अपनाएँगे…अपने चारों ओर खुशहाली का वातावरण सिरजेंगे… अपने लिए ही नहीं ,ओरों के लिए भी जीना सीखेंगे… जो असहाय हैं, निर्बल हैं, गरीब हैं, उनके लिए सम्बल बनेंगे… मानवता के विरोध में जो शक्तियाँ खड़ी हैं, उनका मिलजुल कर मुकाबला करेंगे… विश्व का हर प्राणी अपने अपने मोर्चे पर शांति और बंधुत्व की स्थापना में अपना योगदान देगा… अपने समाज, देश और विश्व को और बेहतर बनाएंगे…&lt;br /&gt;आप सबको नववर्ष 2011 की मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ… यह नया साल आपके लिए सुखमय हो, मंगलमय हो, सुख-समृद्धियों से भरा हो…&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5914515103558840850?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5914515103558840850/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5914515103558840850&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5914515103558840850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5914515103558840850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/12/2011.html' title='अहा !  नववर्ष 2011… तुम्हारा स्वागत है…'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TR2ag4L1Y2I/AAAAAAAAAZ0/sx_oCrtBejE/s72-c/thumbnailCAC7VSXA.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-1216362335187415504</id><published>2010-12-12T07:25:00.001-08:00</published><updated>2010-12-12T07:34:15.238-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TQTq3UHMw3I/AAAAAAAAAZo/QzFq0yuUDaU/s1600/55b85575d48dd358.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5549818876839904114" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 96px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TQTq3UHMw3I/AAAAAAAAAZo/QzFq0yuUDaU/s200/55b85575d48dd358.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;बधाइयों की भीड़ में चिंतामग्न अकेला व्यक्ति&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जब न मिलने के आसार बहुत हों&lt;br /&gt;जो मिल जाए, वही अच्छा है'&lt;br /&gt;एक अरसे के बाद&lt;br /&gt;सुनने को मिलीं ये पंक्तियाँ&lt;br /&gt;उनके मुख से&lt;br /&gt;जब मिला उन्हें लखटकिया पुरस्कार&lt;br /&gt;उम्र की ढलती शाम में&lt;br /&gt;उनकी साहित्य-सेवा के लिए ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिली बहुत-बहुत चिट्ठियाँ&lt;br /&gt;आए बहुत-बहुत फोन&lt;br /&gt;मिले बहुत-बहुत लोग&lt;br /&gt;बधाई देते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो अपने थे&lt;br /&gt;हितैषी थे, हितचिंतक थे&lt;br /&gt;उन्होंने की जाहिर खुशी यह कह कर&lt;br /&gt;'चलो, देर आयद, दुरस्त आयद&lt;br /&gt;इनकी लंबी साधना की&lt;br /&gt;कद्र तो की सरकार ने ...&lt;br /&gt;वरना&lt;br /&gt;हकदार तो थे इसके&lt;br /&gt;कई बरस पहले ... ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो रहे छत्तीस का आंकड़ा&lt;br /&gt;करते रहे ईर्ष्या&lt;br /&gt;उन्होंने भी दी बधाई&lt;br /&gt;मन ही मन भले ही वे बोले&lt;br /&gt;'चलो, निबटा दिया सरकार ने&lt;br /&gt;इस बरस एक बूढ़े को ...'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बधाइयों के इस तांतों के बीच&lt;br /&gt;कितने अकेले और चिंतामग्न रहे वे&lt;br /&gt;बत्तीस को छूती&lt;br /&gt;अविवाहित जवान बेटी के विवाह को लेकर&lt;br /&gt;नौकरी के लिए भटकते&lt;br /&gt;जवान बेटे के भविष्य की सोच कर&lt;br /&gt;बीमार पत्नी के मंहगे इलाज, और&lt;br /&gt;ढहने की कगार पर खड़े छोटे से मकान को लेकर ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने से पहले&lt;br /&gt;इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएँ&lt;br /&gt;वे इस लखटकिया पुरस्कार से&lt;br /&gt;इसी सोच में डूबे&lt;br /&gt;बेहद अकेला पा रहे हैं वे खुद को&lt;br /&gt;बधाइयों की भीड़ में ।&lt;br /&gt;0&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-1216362335187415504?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/1216362335187415504/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=1216362335187415504&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1216362335187415504'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1216362335187415504'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TQTq3UHMw3I/AAAAAAAAAZo/QzFq0yuUDaU/s72-c/55b85575d48dd358.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5668255995386687780</id><published>2010-11-19T09:27:00.000-08:00</published><updated>2010-11-19T09:51:10.672-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;परिन्दे&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परिन्दे&lt;br /&gt;मनुष्य नहीं होते। &lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOa4yQHLuWI/AAAAAAAAAZg/jNRuaD8F5wo/s1600/1599-15174.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541319564984039778" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 231px; CURSOR: hand; HEIGHT: 203px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOa4yQHLuWI/AAAAAAAAAZg/jNRuaD8F5wo/s200/1599-15174.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धरती और आकाश&lt;br /&gt;दोनों से रिश्ता रखते हैं परिन्दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनकी उड़ान में है अनन्त व्योम&lt;br /&gt;धरती का कोई टुकड़ा&lt;br /&gt;वर्जित नहीं होता परिन्दों के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर-आँगन, गाँव, बस्ती, शहर&lt;br /&gt;किसी में भेद नहीं करते परिन्दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाति, धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय से&lt;br /&gt;बहुत ऊपर होते हैं परिन्दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर में, मस्जिद में, चर्च और गुरुद्वारे में&lt;br /&gt;कोई फ़र्क नहीं करते&lt;br /&gt;जब चाहे बैठ जाते हैं उड़कर&lt;br /&gt;उनकी ऊँची बुर्जियों पर बेखौफ!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कर्फ्यूग्रस्त शहर की&lt;br /&gt;खौफजदा वीरान-सुनसान सड़कों, गलियों में&lt;br /&gt;विचरने से भी नहीं घबराते परिन्दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रांत, देश की हदों-सरहदों से भी परे होते हैं&lt;br /&gt;आकाश में उड़ते परिन्दे।&lt;br /&gt;इन्हें पार करते हुए&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOa4V_8su_I/AAAAAAAAAZY/2F4tYKD9OPA/s1600/images.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5541319079608761330" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 228px; CURSOR: hand; HEIGHT: 198px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOa4V_8su_I/AAAAAAAAAZY/2F4tYKD9OPA/s200/images.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;नहीं&lt;/span&gt; चाहिए होती इन्हें कोई अनुमति&lt;br /&gt;नहीं चाहिए होता कोई पासपोर्ट-वीज़ा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुक्र है-&lt;br /&gt;परिन्दों ने नहीं सीखा रहना&lt;br /&gt;मनुष्य की तरह धरती पर।&lt;br /&gt;0&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5668255995386687780?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5668255995386687780/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5668255995386687780&amp;isPopup=true' title='28 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5668255995386687780'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5668255995386687780'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TOa4yQHLuWI/AAAAAAAAAZg/jNRuaD8F5wo/s72-c/1599-15174.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>28</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6907713872695027446</id><published>2010-10-31T01:21:00.000-07:00</published><updated>2010-10-31T01:33:53.769-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TM0obw_Kj1I/AAAAAAAAAYw/XFIAlBxweSw/s1600/imagesCAC1ABNP.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5534123974579621714" style="WIDTH: 130px; CURSOR: hand; HEIGHT: 98px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TM0obw_Kj1I/AAAAAAAAAYw/XFIAlBxweSw/s200/imagesCAC1ABNP.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;em&gt;मित्रों, पिछले कुछ माह से घर-परिवार और कार्यालयी उलझनों, परेशानियों के चलते तथा आँख के आप्रेशन के कारण अपने ब्लॉग ‘सृजन-यात्रा’ पर ही नहीं अपितु अपने अन्य ब्लॉगों पर भी ध्यान नहीं दे पाया। स्थितियाँ कुछ बेहतर हुईं तो आज छूटे हुए कामों को पूरा करने का यत्न कर रहा हूँ। ‘सृजन-यात्रा’ में अपनी कुछ कहानियों के बाद कविताओं के प्रकाशन का सिलसिला मैंने आरंभ किया था। इस पोस्ट में अपनी कविता ‘कविता मेरे लिए’ इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ कि दीपावली का शुभ-पर्व करीब है और मेरी इस कविता में ‘शब्दों’ को ‘रौशनी’ बनाने की बात आई है। इस कविता को आप सबके सम्मुख दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ रख रहा हूँ…&lt;/em&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;&lt;br /&gt;कविता मेरे लिए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता की बारीकियाँ&lt;br /&gt;कविता के सयाने ही जाने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर तो&lt;br /&gt;जब भी लगा है कुछ&lt;br /&gt;असंगत, पीड़ादायक&lt;br /&gt;महसूस हुई है जब भी भीतर&lt;br /&gt;कोई कचोट&lt;br /&gt;कोई खरोंच&lt;br /&gt;मचल उठी है कलम&lt;br /&gt;कोरे काग़ज़ के लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतनी भर रही कोशिश&lt;br /&gt;कि कलम कोरे काग़ज़ पर&lt;br /&gt;धब्बे नहीं उकेरे&lt;br /&gt;उकेरे ऐसे शब्द&lt;br /&gt;जो सबको अपने से लगें।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TM0nlzdATcI/AAAAAAAAAYo/L0wiYEgT7tw/s1600/ujala_s.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5534123047528713666" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 141px; CURSOR: hand; HEIGHT: 367px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TM0nlzdATcI/AAAAAAAAAYo/L0wiYEgT7tw/s200/ujala_s.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;शब्द जो बोलें तो बोलें&lt;br /&gt;जीवन का सत्य&lt;br /&gt;शब्द जो खोलें तो खोलें&lt;br /&gt;जीवन के गहन अर्थ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्द जो तिमिर में&lt;br /&gt;रौशनी बन टिमटिमाएँ&lt;br /&gt;नफ़रत के इस कठिन दौर में&lt;br /&gt;प्यार की राह दिखाएँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने लिए तो&lt;br /&gt;यही रहे कविता के माने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता की बारीकियाँ तो&lt;br /&gt;कविता के सयाने ही जाने।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(&lt;span style="color:#990000;"&gt;कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित&lt;/span&gt;)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6907713872695027446?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6907713872695027446/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6907713872695027446&amp;isPopup=true' title='24 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6907713872695027446'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6907713872695027446'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TM0obw_Kj1I/AAAAAAAAAYw/XFIAlBxweSw/s72-c/imagesCAC1ABNP.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-3740177307453861505</id><published>2010-08-07T23:08:00.000-07:00</published><updated>2010-08-07T23:17:50.136-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;बेहतर दुनिया का सपना देखते लोग&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग इस दुनिया में&lt;br /&gt;जो चढ़ते सूरज को करते हैं नमस्कार&lt;br /&gt;जुटाते हैं सुख-सुविधाएँ और पाते हैं पुरस्कार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग&lt;br /&gt;जो देख कर हवा का रुख चलते हैं&lt;br /&gt;जिधर बहे पानी, उधर ही बहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अधिक गिनती में हैं ऐसे लोग&lt;br /&gt;जो कष्टों-संघर्षों से कतराते हैं&lt;br /&gt;करके समझौते बहुत कुछ पाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम नहीं है ऐसे लोगों की गिनती&lt;br /&gt;जो पाने को प्रवेश दरबारों में&lt;br /&gt;अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रीढ़हीन लोगों की इस बहुत बड़ी दुनिया में&lt;br /&gt;बहुत कम गिनती में हैं ऐसे लोग जो-&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TF5Kh9-cQNI/AAAAAAAAAXo/341CAhKYuXk/s1600/thumbnailCADFPOA5.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5502917742125924562" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 180px; CURSOR: hand; HEIGHT: 303px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TF5Kh9-cQNI/AAAAAAAAAXo/341CAhKYuXk/s200/thumbnailCADFPOA5.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;धारा&lt;/span&gt; के विरुद्ध चलते हैं&lt;br /&gt;कष्टों-संघर्षों से जूझते हैं&lt;br /&gt;समझौतों को नकारते हैं&lt;br /&gt;अपना सूरज खुद उगाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भले ही कम हैं&lt;br /&gt;पर हैं अभी भी ऐसे लोग&lt;br /&gt;जो बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं&lt;br /&gt;और बचाये रखते हैं अपनी रीढ़&lt;br /&gt;रीढ़हीन लोगों की भीड़ में।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;“रोशनी की लकीर”&lt;/span&gt; में संग्रहित)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-3740177307453861505?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/3740177307453861505/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=3740177307453861505&amp;isPopup=true' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3740177307453861505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3740177307453861505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TF5Kh9-cQNI/AAAAAAAAAXo/341CAhKYuXk/s72-c/thumbnailCADFPOA5.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-3442560724512157975</id><published>2010-07-04T00:34:00.000-07:00</published><updated>2010-07-05T11:18:29.169-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>दो कविताएं/सुभाष नीरव</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDA-Iv1ajNI/AAAAAAAAAWw/cKbgcWPE_7k/s1600/0b04534b0b7e3b4c.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5489956265765014738" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 108px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDA-Iv1ajNI/AAAAAAAAAWw/cKbgcWPE_7k/s200/0b04534b0b7e3b4c.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;आदमी की फितरत&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;पहले तुमने मुझे&lt;br /&gt;अपने होंठों से लगाया&lt;br /&gt;फिर आँच दे दी&lt;br /&gt;मेरा जीवन शुरू हो गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उठाते रहे लुत्फ़ तुम&lt;br /&gt;कश-दर-कश&lt;br /&gt;जब तक मुझमें आँच थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर क्या मालूम था मुझे&lt;br /&gt;जब यही आँच बनने लगेगी खतरा&lt;br /&gt;तुम्हारी उंगलियों के लिए&lt;br /&gt;तुम मुझे फर्श पर फेंक&lt;br /&gt;अपने जूते की नोक से&lt;br /&gt;बेरहमी से मसल दोगे।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#006600;"&gt;शिखरों पर लोग&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जो कटे नहीं&lt;br /&gt;अपनी ज़मीन से&lt;br /&gt;शिखरों को छूने के बाद भी&lt;br /&gt;गिरने का भय&lt;br /&gt;उन्हें कभी नहीं रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्होंने छोड़ दी&lt;br /&gt;अपनी ज़मीन&lt;br /&gt;शिखरों की चाह में&lt;br /&gt;वे गिरे&lt;br /&gt;तो ऐसे गिरे&lt;br /&gt;न शिखरों के रहे&lt;br /&gt;न ज़मीन के।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;(कविता संग्रह &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;“रोशनी की लकीर”&lt;/span&gt; में संग्रहित)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-3442560724512157975?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/3442560724512157975/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=3442560724512157975&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3442560724512157975'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3442560724512157975'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='दो कविताएं/सुभाष नीरव'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TDA-Iv1ajNI/AAAAAAAAAWw/cKbgcWPE_7k/s72-c/0b04534b0b7e3b4c.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-515760435995176736</id><published>2010-06-12T21:45:00.000-07:00</published><updated>2010-06-12T21:49:21.446-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TBRigu_5T2I/AAAAAAAAAWY/PGqL7C6tyP8/s1600/Kites.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5482114960928100194" style="WIDTH: 135px; CURSOR: hand; HEIGHT: 90px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TBRigu_5T2I/AAAAAAAAAWY/PGqL7C6tyP8/s200/Kites.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;धारा के विरुद्ध&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बने बनाये साँचों में ढलना&lt;br /&gt;बहुत आसान होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कठिन होता है&lt;br /&gt;अपने लिए अलग साँचा बनाना&lt;br /&gt;और खुद को उसमें ढालना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा करके देखो-&lt;br /&gt;अलग दिखोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धारा के साथ&lt;br /&gt;हर कोई बह सकता है&lt;br /&gt;कठिन होता है&lt;br /&gt;धारा के विरुद्ध तैरना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तैर कर देखो-&lt;br /&gt;अलग दिखोगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतंग जब तक&lt;br /&gt;हवा के साथ होती है&lt;br /&gt;उड़ती है पर&lt;br /&gt;ऊँचाइयाँ नहीं छूती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होती है जब&lt;br /&gt;हवा के विरुद्ध&lt;br /&gt;उठती है ऊपर, बहुत ऊपर&lt;br /&gt;और दीखती है&lt;br /&gt;सबसे अलग आकाश में !&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;रोशनी की लकीर&lt;/span&gt;” में संग्रहित)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-515760435995176736?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/515760435995176736/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=515760435995176736&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/515760435995176736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/515760435995176736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/TBRigu_5T2I/AAAAAAAAAWY/PGqL7C6tyP8/s72-c/Kites.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6512778097784441218</id><published>2010-05-20T01:57:00.000-07:00</published><updated>2010-05-20T02:05:19.610-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S_T64TSH1ZI/AAAAAAAAAWE/QgSZvZlj-KU/s1600/e852b6cdfe307b88.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5473275292317898130" style="WIDTH: 145px; CURSOR: hand; HEIGHT: 100px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S_T64TSH1ZI/AAAAAAAAAWE/QgSZvZlj-KU/s200/e852b6cdfe307b88.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;भाषा की नदी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे बीच&lt;br /&gt;भाषा की जो नदी&lt;br /&gt;बहा करती थी&lt;br /&gt;जाने क्या हुआ&lt;br /&gt;एकाएक सूख गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन शब्दों से&lt;br /&gt;होता था हमारा सम्वाद&lt;br /&gt;वे इतनी बार&lt;br /&gt;कि किए गए प्रयोग&lt;br /&gt;कि घिस घिस कर लुप्त हो गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब हमारे बीच&lt;br /&gt;भाषा की सूखी नदी पसरी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तुम&lt;br /&gt;उस पार हो गुमसुम&lt;br /&gt;और इस पार&lt;br /&gt;मैं खामोश...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलो,&lt;br /&gt;अच्छा हुआ&lt;br /&gt;सूख गई भाषा की नदी&lt;br /&gt;अधरों का काम खत्म हुआ&lt;br /&gt;कानों को भी मिलेगा आराम&lt;br /&gt;लेकिन-&lt;br /&gt;तुम्हारे नयनों में क्या है&lt;br /&gt;मैं पढ़ सकता हूँ&lt;br /&gt;मेरी आँखों की भाषा को&lt;br /&gt;बांचना कठिन नहीं तुम्हारे लिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भाषा की नदियां&lt;br /&gt;जब रिश्तों के बीच सूख जाती हैं&lt;br /&gt;तब आँखें ही तो&lt;br /&gt;हमारे अधर होती हैं&lt;br /&gt;और हमारे कान भी !&lt;br /&gt;00&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6512778097784441218?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6512778097784441218/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6512778097784441218&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6512778097784441218'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6512778097784441218'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S_T64TSH1ZI/AAAAAAAAAWE/QgSZvZlj-KU/s72-c/e852b6cdfe307b88.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-3877535489760953274</id><published>2010-04-17T11:03:00.000-07:00</published><updated>2010-04-17T11:07:13.737-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S8n4P1JVtUI/AAAAAAAAAVE/y2P12X4Gu3k/s1600/imagesCAOYVTBI.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5461168974011413826" style="WIDTH: 135px; CURSOR: hand; HEIGHT: 101px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S8n4P1JVtUI/AAAAAAAAAVE/y2P12X4Gu3k/s200/imagesCAOYVTBI.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#3333ff;"&gt;नदी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#ff0000;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्वत शिखरों से उतर कर&lt;br /&gt;घाटियों-मैदानों से गुजरती&lt;br /&gt;पत्थरों-चट्टानों को चीरती&lt;br /&gt;बहती है नदी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी जानती है&lt;br /&gt;नदी होने का अर्थ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी होना&lt;br /&gt;बेरोक निरंतर बहना&lt;br /&gt;आगे…आगे… और आगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं मचलती&lt;br /&gt;कहीं उद्विग्न, उफनती&lt;br /&gt;किनारे तोड़ती&lt;br /&gt;कहीं शांत-गंभीर&lt;br /&gt;लेकिन –&lt;br /&gt;निरंतर प्रवहमान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सागर से मिलने तक&lt;br /&gt;एक महायात्रा पर होती है नदी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी बहती है निरंतर&lt;br /&gt;सागर में विलीन होने तक&lt;br /&gt;क्योंकि वह जानती है&lt;br /&gt;वह बहेगी&lt;br /&gt;तो रहेगी !&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;रोशनी की लकीर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में संग्रहित)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-3877535489760953274?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/3877535489760953274/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=3877535489760953274&amp;isPopup=true' title='19 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3877535489760953274'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/3877535489760953274'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/04/blog-post_17.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S8n4P1JVtUI/AAAAAAAAAVE/y2P12X4Gu3k/s72-c/imagesCAOYVTBI.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>19</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5581081341330409918</id><published>2010-04-03T09:52:00.001-07:00</published><updated>2010-04-03T10:28:42.051-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गाहे-बगाहे'/><title type='text'>गाहे-बगाहे</title><content type='html'>&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S7dykaJ44XI/AAAAAAAAAU0/Paac6n9IwaA/s1600/keyboard.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455955443404300658" style="WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S7dykaJ44XI/AAAAAAAAAU0/Paac6n9IwaA/s200/keyboard.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;ब्लॉग की दुनिया के दोस्तो, मेरे नये-पुराने साहित्यिक मित्रो !&lt;br /&gt;इस बार &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;‘सृजन-यात्रा’&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में अपनी कोई रचना प्रकाशित करने का मन नहीं कर रहा, बस आपसे दो-एक बातें साझी करने की इच्छा जागी है। वैसे भी काफी दिनों से मैं अपने इस ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाल पाया हूँ। 3 नवंबर 2009 की पोस्ट ‘स्मृति-शेष’ पिता में मैंने अपने दिवंगत पिता को याद किया था और उसके बाद 10 दिसंबर 2009 में अपनी एक कविता पोस्ट की थी – “पढ़ना चाहता हूँ एक अच्छी कविता…”। फ़िर काम के गहरे बोझ की गठरी के नीचे दबता-दबता और कुछेक व्यक्तिगत परेशानियों से जूझता मैं गहरे तनाव और अवसाद का शिकार हो गया और नतीजा यह निकला कि स्वास्थ बुरी तरह गड़बड़ा गया। डॉक्टर की सलाह पर पत्नी और बच्चों ने कंप्यूटर के सामने बैठने की सख़्त मनाही कर दी। फरवरी 2010 तो पूरा यूँ ही निकल गया। मार्च 2010 में ऑफिस जाने योग्य हुआ तो ऑफिस से लौट कर घर में मेल चेक करने के बहाने चोरी-छिपे अपने उन ब्लॉग्स पर काम किया जिन पर अधिक लम्बे मैटर की दरकार नहीं होती। अब चूंकि स्थिति पहले से बेहतर है तो धीरे-धीरे घरवालों का विरोध कम होने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने ब्लॉग की दुनिया में जब प्रवेश किया था(14 अगस्त 2007) तो मेरे मन में ‘साहित्य’ और ‘अनुवाद’ को लेकर ब्लॉग की दुनिया में कुछ सार्थक काम करने की तीव्र इच्छा थी। मैंने अपना पहला ब्लॉग ही ‘अनूदित साहित्य’ पर केन्द्रित किया- &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.setusahitya.blogspot.com/"&gt;“सेतु साहित्य”&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; नाम से। लेकिन चूंकि यह मेरी परिकल्पनाओं की पूरी तरह पूर्ति नहीं कर रहा था इसलिए धीरे-धीरे मैंने कविताओं से जुड़ा &lt;a href="http://www.vaatika.blogspot.com/"&gt;&lt;strong&gt;“वाटिका”&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; ब्लॉग, फिर प्रवासी भारतीय लेखकों की अभिव्यक्ति से सम्बद्ध &lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.gavaksh.blogspot.com/"&gt;“गवाक्ष”&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;, साहित्य की सभी छोटी- बड़ी विधाओं से जुड़ा ब्लॉग –&lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.sahityasrijan.blogspot.com/"&gt;‘साहित्य सृजन’&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; और पंजाबी के श्रेष्ठ कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व करने वाला ब्लॉग &lt;strong&gt;&lt;a href="http://www.kathapunjab.blogspot.com/"&gt;“कथा पंजाब”&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt; प्रारंभ किया। निसंदेह, मेरे इन ब्लॉगों में मेरे द्वारा किए गए अनुवाद को छोड़कर मेरी मौलिक रचनाएं नहीं जाती हैं। मेरे बहुत से साहित्यिक और ब्लॉग के माध्यम से बने नये मित्र बंधु गाहे-बगाहे मुझसे कहते रहे कि भाई नीरव, ब्लॉग की दुनिया के अधिकांश लोग अपने ब्लॉग्स पर अपना-अपना ही परसोते रहते हैं और तुम हो कि दूसरों के अच्छे लेखन को, उनके श्रेष्ठ साहित्य को ही अपने ब्लॉग्स में प्रमोट करते रहते हो, तुम स्वयं एक लेखक-कवि हो और तुम्हारी अपनी बहुत लम्बी लेखन-यात्रा रही है, मौलिक लेखन और अनुवाद की अनेक किताबें छपी हैं, हिंदुस्तान की कोई पत्रिका नहीं है जहाँ तुम न छ्पे हो, कहानियाँ, लघुकथाएँ, कविताएँ, समीक्षाएँ प्रिंट-मीडिया में छपती रही हैं और अब तक छ्प रही हैं, तो तुम क्यों नहीं ब्लॉग के माध्यम से स्वयं को प्रमोट करते ? अपनी रचनाएं इस नये माध्यम द्वारा विश्व के विशाल पाठक के सम्मुख रखते? तो बन्धुओ ! मेरे इस &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;‘सृजन-यात्रा’&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; ब्लॉग के निर्माण के पीछे सीधे-सीधे तो आपको यह लग सकता है कि मैंने मित्रों का आग्रह मानकर इस ब्लॉग की शुरूआत की होगी। परन्तु, मेरे भीतर जो इसका मकसद था, वो किंचित दूसरा भी था। मेरी प्रारंभिक पुस्तकें अब उपलब्ध नहीं है, एक-दो प्रति यदि उपलब्ध भी है तो वह बहुत जीर्ण-शीर्ण और जर्जर अवस्था में है। प्रकाशक उन्हें री-प्रिंट नहीं करेंगे, जानता हूँ। घर में फाइलों में, पत्रिकाओं, अख़बारों के सहेज कर रखे अंकों के पीले और नष्ट-से हो चुके पृष्टों पर मेरी रचनाएं इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं। दीपावली के कुछ दिन पूर्व जब घर में साफ-सफाई होती है अथवा जब-जब मकान बदलना होता है तो मैं अपनी पत्नी और बच्चों की मदद से इनकी धूल साफ कर लेता हूँ। तो मित्रो, अपना निजी ब्लॉग अर्थात अपनी ही रचनाओं को प्रस्तुत करने वाला ब्लॉग &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;“सृजन-यात्रा”&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; जब बनाने की बात आई तो उसके पीछे मंशा यह भी थी कि वे इस बहाने एक जगह उपलब्ध और सुरक्षित हो सकें। दूर-दराज बैठे बहुत से पाठक जब मुझसे मेरी कोई पुरानी किताब, किसी कहानी अथवा कविता की मांग करते हैं तो मैं बेबस और उदास हो जाया करता हूँ। पुरानी किताबों की इतनी प्रतियां हैं नहीं कि उठाऊँ और पोस्ट कर दूँ। इंटरनेट पर मिली इस सुविधा के चलते यह काम मुझे बहुत सहज और सरल लगा, प्रारंभ में अवश्य श्रम-साध्य है परन्तु बाद में जब सभी रचनाएँ एक जगह समाहित हो जाएँगी तो उन्हें भेजने में अथवा पाठकों को उपलब्ध करवाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी, यही सोचकर मैंने अपना निजी/मौलिक रचना-संसार &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;‘सृजन-यात्रा’&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में क्रमवार प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया। अब जब भी समय मिलता है, मैं इस पर अपनी कोई रचना पोस्ट कर देता हूँ। नेट की दुनिया के पाठक पढ़ते हैं, अपनी टिप्पणी/राय देते हैं तो अच्छा लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य की दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा अंतर्जाल पर इस ब्लॉगिंग को लेकर अभी भी नाक-&lt;span class=""&gt;भौं&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S7d5aeex1sI/AAAAAAAAAU8/2okFSZbFIvY/s1600/dictionary.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5455962969348363970" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 79px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S7d5aeex1sI/AAAAAAAAAU8/2okFSZbFIvY/s200/dictionary.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/span&gt; सिकोड़ता है और उसकी धारणा है कि जो लोग कहीं नहीं छपते, वे अपनी छपास की भूख मिटाने के लिए अपना ब्लॉग खोल कर बैठ जाते हैं, जहाँ वे खुद ही लेखक–कवि होते हैं और खुद ही संपादक और इसी के चलते अपनी कच्ची, अधकचरी, बेसिर-पैर की रचनाएं देश-विदेश के पाठकों पर थोपते रहते हैं और अपनी रचनाओं जैसी ही कच्ची, अधकचरी टिप्पणियाँ अपने फेवर में पाकर अपने आप को एक महान लेखक-कवि के संभ्रम में जीते रहते हैं। मित्रो, हिंदी में ब्लॉगों की बेइंतहा भीड़ पर अगर नज़र डालें तो यह बात कुछ हद तक सही भी प्रतीत होती है परन्तु मेरा मानना है कि इतने भर से इस माध्यम के चलते हो रही अभिव्यक्ति पर पूरी तरह लकीर मार देना भी उचित नहीं है। क्या प्रिंट मीडिया में अब तक अच्छा, श्रेष्ठ और उत्कृष्ट ही छपता आया है। जब अंतर्जाल पर यह साधन(ब्लॉगिंग को मैं एक साधन के रूप में ही लेता हूँ) नहीं था, तब भी और आज भी मैं देखता हूँ कि बहुत से लोग अपनी-अपनी पत्रिकाएं लिए नज़र आते हैं। कुछेक को छोड़ दें तो बहुत सी अपने पहले अंक के बाद ही दम तोड़ देती हैं। इनके पीछे कोई महती और सार्थक उद्देश्य भी नहीं होता, बस पत्रिका निकालने का ख़ब्त होता है और खुद ही संपादक बनने का। अपनी और अपने खास मित्रो की रचनाएँ छापने के लिए ये स्वतंत्र होते हैं। साहित्य के नाम पर कचरा आपको वहाँ भी बहुत मिलता है और इस कचरे के ढेर तले कुछेक अच्छी पत्रिकाएं जो एक खास उद्देश्य को लेकर चलती हैं, दबकर रह जाती हैं। तो दोस्तो, ब्लॉग की दुनिया में भी ठीक वैसी ही स्थिति है। पत्रकारिता, साहित्य, अनुवाद से जुड़े बहुत से ब्लॉग हैं जो अपनी साकारात्मकता और रचनात्मकता को लेकर रेखांकित किए जा सकते हैं। उनके महत्व को किसी भी तरह से कम करके नहीं आंका जा सकता। यहाँ नाम गिनाने की मेरी कोई मंशा नहीं है। जो लोग इस दुनिया में हैं या इससे परिचित हैं वे भलीभांति जानते ही हैं। हमें ऐसे ब्लॉग अथवा वेब पत्रिकाओं द्वारा किये जा रहे प्रयासों का खुलकर स्वागत करना होगा और साथ ही साथ उनके हौसलों को मज़बूत भी करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;-सुभाष नीरव&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5581081341330409918?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5581081341330409918/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5581081341330409918&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5581081341330409918'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5581081341330409918'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='गाहे-बगाहे'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/S7dykaJ44XI/AAAAAAAAAU0/Paac6n9IwaA/s72-c/keyboard.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6450693485448379733</id><published>2009-12-10T23:32:00.000-08:00</published><updated>2009-12-10T23:37:56.425-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SyH17V6zyWI/AAAAAAAAAQY/Q06KOaMZP5I/s1600-h/fall-1.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5413878626920941922" style="WIDTH: 96px; CURSOR: hand; HEIGHT: 135px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SyH17V6zyWI/AAAAAAAAAQY/Q06KOaMZP5I/s200/fall-1.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#cc0000;"&gt;पढ़ना चाहता हूँ एक अच्छी कविता&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं पढ़ना चाहता हूँ&lt;br /&gt;एक अच्छी कविता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता&lt;br /&gt;कि जिसे पढ़कर&lt;br /&gt;खुल जाएं&lt;br /&gt;बाहर-भीतर के किवाड़&lt;br /&gt;मन का कोना-कोना&lt;br /&gt;गमकने-महकने लगे&lt;br /&gt;ताज़ी हवा से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता&lt;br /&gt;कि जिसे पढ़कर&lt;br /&gt;मन के अँधेरों में&lt;br /&gt;उतर आए&lt;br /&gt;रोशनी की लकीर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पढ़ना चाहता हूँ मैं&lt;br /&gt;एक अच्छी कविता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसी कविता&lt;br /&gt;जो उतरे मेरे भीतर&lt;br /&gt;जैसे उतरते हैं&lt;br /&gt;पहाड़ों पर से&lt;br /&gt;घाटियों में&lt;br /&gt;जल-प्रपात&lt;br /&gt;अपने मधुर संगीत के साथ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता&lt;br /&gt;तुम आओ तो इसी तरह आना&lt;br /&gt;मेरे पास !&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;“रोशनी की लकीर”&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में संग्रहित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6450693485448379733?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6450693485448379733/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6450693485448379733&amp;isPopup=true' title='12 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6450693485448379733'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6450693485448379733'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SyH17V6zyWI/AAAAAAAAAQY/Q06KOaMZP5I/s72-c/fall-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-289601050600363640</id><published>2009-11-03T04:31:00.000-08:00</published><updated>2009-11-03T04:39:33.519-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृति'/><title type='text'>स्मृति-शेष पिता !</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिता अब नहीं रहे। गत 22 अक्तूबर 2009 (बृहस्पतिवार रात्रि 10.30 बजे) उन्होंने मुझसे छोटे दो भाइयों की गोद में अन्तिम सांस ली। जीवन भर दुख-तकलीफ़ों और मुश्किलों से लोहा लेने वाले पिता अपनी भंयकर बीमारी से भी अपनी जीर्ण-शीर्ण काया में बची खुची शक्ति से चुपचाप लड़ते -जूझते रहे। उन्हें दायें फेफड़े में कैंसर था जो अन्तिम स्टेज पर पहुंच चुका था। वह असहनीय और मर्मान्तक पीड़ा को हमसे हर क्षण छुपाने की कोशिश करते रहे, कभी दर्द में चीखे-चिल्लाये नहीं। कभी-कभी मद्धम-सी कराह जबरन उनके मुँह से निकलती तो लगता कि वह उसे भी अपने भीतर रोकने की भरसक कोशिश कर रहे थे। लेकिन उनके चेहरे पर खिंची असहनीय दर्द की लकीरें हमें भीतर तक रुला जाती थीं। अब वह घना छायादार वृक्ष हमारे सिर पर नहीं रहा जिसकी छाया तले हम अपने दुख-दर्द भूल जाते थे, दिन भर की थकान मिटा लेते थे। शेष रह गई हैं बस उसकी स्मृतियाँ ! जिस जीवट और साहस का परिचय पिता अपने जीवन में देते रहे, उसी जीवट और साहस से हमें जीवन की हर मुश्किल से लोहा लेना है। उनके दिखाये गए रास्तों पर चलना है। उनकी स्मृतियों की पूंजी को संजो कर रखना है, उन्हें विस्मृतियों की गर्द से बचा कर रखना है। इन स्मृतियों के सहारे ही अशरीरी पिता हमारे साथ रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;शोक के इन क्षणों में पिता जी पर फिलहाल बस इतना ही लेकिन जल्द ही उनके जीवन संघर्षों पर विस्तार से लिखने का प्रयास करूंगा।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;0&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भाई रूप सिंह चन्देल मेरे परिवार के हर दुख-सुख में सदैव आगे बढ़कर सम्मिलित होते रहे हैं। उन्होंने ही मेरे सभी मित्रों को फोन और ई-मेल के द्वारा इस बारे में सूचित करने का दायित्व निभाया। मेरे परिवार की इस दुखद घड़ी में अनेक मित्रों ने उपस्थित होकर, फोन अथवा ई-मेल द्वारा अपनी शोक संवेदनाएं प्रकट करके मुझे और मेरे परिवार को जो सांत्वना और शक्ति प्रदान की, उसके लिए मैं उन सभी का हृदय से आभारी हूँ। &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;-सुभाष नीरव &lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-289601050600363640?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/289601050600363640/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=289601050600363640&amp;isPopup=true' title='24 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/289601050600363640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/289601050600363640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='स्मृति-शेष पिता !'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6290734295345151451</id><published>2009-10-15T10:23:00.000-07:00</published><updated>2009-10-15T10:37:55.615-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/StdbGOfcnhI/AAAAAAAAAPo/4P3l7wIJjV0/s1600-h/2007-01-02_21.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; cssfloat: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img $r="true" border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/StdbGOfcnhI/AAAAAAAAAPo/4P3l7wIJjV0/s200/2007-01-02_21.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: red; font-size: large;"&gt;दो कविताएँ/ सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue; font-size: x-large;"&gt;ठोकरें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;पहली ठोकर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उसके क्रोध का कारण बनी।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;दूसरी ने&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उसमें खीझ पैदा की।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;तीसरी ठोकर ने&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;किया उसे सचेत।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;चौथी ने भरा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;आत्म-विश्वास&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उसके भीतर।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अब नहीं करता &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;वह परवाह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ठोकरों की !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: #660000; font-size: x-large;"&gt;रास्ते&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;बने बनाये रास्ते&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ले गए हमको&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अपनी ही तयशुदा &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;मंज़िल पर।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;रास्ते जो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;हमने बनाये&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;उन्हें हम ले गए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;अपनी मनचाही&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;मंज़िल पर।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;रोशनी की लकीर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में संग्रहित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6290734295345151451?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6290734295345151451/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6290734295345151451&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6290734295345151451'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6290734295345151451'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/StdbGOfcnhI/AAAAAAAAAPo/4P3l7wIJjV0/s72-c/2007-01-02_21.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-7493218244343658887</id><published>2009-09-05T23:59:00.000-07:00</published><updated>2009-09-27T00:35:00.964-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविता</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SqNZuF8IjqI/AAAAAAAAAKI/l8xkCQP0XE8/s1600-h/fire+in+city.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" lk="true" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SqNZuF8IjqI/AAAAAAAAAKI/l8xkCQP0XE8/s320/fire+in+city.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: large;"&gt;&lt;span style="color: red; font-size: x-large;"&gt;आग और धुआँ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;धुआँ देख&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हरकत में नहीं आते हैं वे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;‘दीखती नहीं हैं लपटें&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;नहीं, यह नहीं है आग…’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;धुएँ का होना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;उनके लिए आग नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;वे बैठे हैं बेहरकत&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;और धुआँ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;इधर से उधर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;उधर से इधर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;ऊपर से ऊपर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;गाढ़ा हो फैलता ही जाता है।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;‘वो उठीं लपटें…&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;हाँ, यह है आग…’&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;और हरकत में आ जाते हैं वे।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;चीखने लगते हैं सायरन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;बजने लगती हैं घंटियाँ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;दौड़ने लगती हैं दमकलें…&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;लेकिन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;जब तक पहुँचते हैं वे आग तक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;घंटियाँ और सायरन बजाती &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;दमकलों के साथ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;कुछ नहीं रहता शेष&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;शेष रहता है&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;मातम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;धुआँ&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;राख !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: small;"&gt;0&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;(कविता संग्रह &lt;span style="color: blue;"&gt;&lt;strong&gt;“रोशनी की लकीर”&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में संग्रहित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-7493218244343658887?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/7493218244343658887/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=7493218244343658887&amp;isPopup=true' title='15 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7493218244343658887'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/7493218244343658887'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='कविता'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SqNZuF8IjqI/AAAAAAAAAKI/l8xkCQP0XE8/s72-c/fire+in+city.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-8244703177516089936</id><published>2009-08-08T01:32:00.000-07:00</published><updated>2009-08-08T01:36:44.011-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविताएं</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sn04N90jX0I/AAAAAAAAAJg/Tb0jhARWQSM/s1600-h/mountain.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 101px; HEIGHT: 146px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5367508143479938882" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sn04N90jX0I/AAAAAAAAAJg/Tb0jhARWQSM/s200/mountain.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कविता&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;अपने-अपने रास्ते&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोड़ कर सीधे-सरल रास्ते&lt;br /&gt;वह उतरा घाटियों में&lt;br /&gt;चढ़ा पर्वतों पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सीधे-सरल रास्तों ने&lt;br /&gt;बहुत लुभाया उसे&lt;br /&gt;पर उसने चुनीं&lt;br /&gt;चुनौती भरी राहें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्गम घाटियों में उतर कर&lt;br /&gt;वह सुनता रहा उनका संगीत&lt;br /&gt;और खोजता रहा&lt;br /&gt;गहराइयों का सच।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न जाने किस गहरे दु:ख में&lt;br /&gt;ख़ामोश खड़े थे पहाड़&lt;br /&gt;वह ढूँढ़ता रहा&lt;br /&gt;उनकी ख़ामोशियों के अर्थ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्थरों-चट्टानों&lt;br /&gt;नदी, नालों और निर्झरों&lt;br /&gt;फूलों और कांटों को लांघता&lt;br /&gt;जब वह पहुँचा मंज़िल पर&lt;br /&gt;उसके पास थी&lt;br /&gt;ढेर सारे अनुभवों की पूंजी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर लोग तो वहाँ&lt;br /&gt;पहले से ही मौजूद थे&lt;br /&gt;जो सीधे-सरल रास्तों से हो कर आए थे&lt;br /&gt;और किए जा रहे थे पुरस्कृत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुश थे अपनी सफलता पर&lt;br /&gt;जिस समय&lt;br /&gt;पुरस्कृत हुए लोग&lt;br /&gt;वह बढ़ रहा था&lt;br /&gt;चुपचाप&lt;br /&gt;नई मंज़िल&lt;br /&gt;नई चुनौतियों की तलाश में।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;रोशनी की लकीर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में संग्रहित)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-8244703177516089936?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/8244703177516089936/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=8244703177516089936&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8244703177516089936'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8244703177516089936'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कविताएं'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sn04N90jX0I/AAAAAAAAAJg/Tb0jhARWQSM/s72-c/mountain.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-1416985253889571636</id><published>2009-07-24T05:58:00.001-07:00</published><updated>2009-07-24T06:08:07.252-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविताएं</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SmmwNwvzkfI/AAAAAAAAAJY/jPx2NQt9HBs/s1600-h/3319360121_0989f1b5d8.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 170px; HEIGHT: 147px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362010581831487986" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SmmwNwvzkfI/AAAAAAAAAJY/jPx2NQt9HBs/s200/3319360121_0989f1b5d8.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;‘&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;सृजन-यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;’ के पिछले अंक में मैंने अपनी कविता ‘&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;काम करता आदमी&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;’ पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत की थी। अंक में प्रस्तुत हैं– पेड़ से जुड़ीं मेरी दो छोटी-छोटी कविताएं …&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;दो कविताएं/ सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SmmwEJ5Ol1I/AAAAAAAAAJQ/aeUbjEI4-gg/s1600-h/trees.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 113px; HEIGHT: 150px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362010416783202130" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SmmwEJ5Ol1I/AAAAAAAAAJQ/aeUbjEI4-gg/s200/trees.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#009900;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;पेड़-1&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आँधी-पानी सहते हैं&lt;br /&gt;धूप में तपते हैं, झुलसते हैं&lt;br /&gt;तूफानों से करते हैं&lt;br /&gt;मल्लयुद्ध&lt;br /&gt;अपनी ज़मीन छोड़ कर&lt;br /&gt;कहीं नहीं जाते ये पेड़।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसीबतों से डरना&lt;br /&gt;और डर कर भागना&lt;br /&gt;आता नहीं इन्हें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने साहसी होते हैं ये पेड़&lt;br /&gt;आदमी के आस पास होते हुए भी&lt;br /&gt;आदमी की राजनीति से अछूते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी ज़मीन के प्रति&lt;br /&gt;कितने वफ़ादार होते हैं ये पेड़ !&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Smmv-5WDFtI/AAAAAAAAAJI/ohxXP0lXR2g/s1600-h/Tree1.jpg"&gt;&lt;img style="WIDTH: 110px; HEIGHT: 120px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5362010326441334482" border="0" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Smmv-5WDFtI/AAAAAAAAAJI/ohxXP0lXR2g/s200/Tree1.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span style="font-size:180%;"&gt;पेड़-2&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौसम ज़ुल्म ढाता है&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;चूसने लगता है जब&lt;br /&gt;हरापन&lt;br /&gt;दरख़्तों के चेहरे&lt;br /&gt;पीले पड़ जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपस में गुप्त&lt;br /&gt;फ़ैसला होता है तब&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;सब के सब&lt;br /&gt;दरख़्त&lt;br /&gt;एकाएक नंगई पर उतर आते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हार कर एक दिन&lt;br /&gt;मौसम अपने घुटने टेकता है&lt;br /&gt;और तब फिर से&lt;br /&gt;दरख़्तों पर&lt;br /&gt;हरापन फूटता है।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;रोशनी की लकीर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में संग्रहित)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-1416985253889571636?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/1416985253889571636/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=1416985253889571636&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1416985253889571636'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1416985253889571636'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/07/blog-post_24.html' title='कविताएं'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SmmwNwvzkfI/AAAAAAAAAJY/jPx2NQt9HBs/s72-c/3319360121_0989f1b5d8.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5784818418025567768</id><published>2009-07-06T00:25:00.000-07:00</published><updated>2009-07-06T00:35:03.326-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कविताएं</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SlGo6tqRNSI/AAAAAAAAAIw/aSa8Xa0rPX8/s1600-h/CAUPU5YF.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355247158562993442" style="WIDTH: 150px; CURSOR: hand; HEIGHT: 113px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SlGo6tqRNSI/AAAAAAAAAIw/aSa8Xa0rPX8/s200/CAUPU5YF.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लेखन की शुरूआत कविता से हुई। बाद में, गद्य की ओर मुड़ गया यानी कहानी-लघुकथा की ओर। लेकिन, कविता से रिश्ता निरंतर बना रहा, टूटा नहीं। अच्छी कविताएं और उर्दू-शायरी को खोज-खोज कर पढ़ना आज भी जारी है। अगर मैं यह कहूँ कि जब-जब मैंने जीवन में स्वयं को अकेला महसूस किया है, कविता को ही अपने बहुत करीब पाया है, तो गलत न होगा। कविताओं ने कभी जीवन की चुनौतियों का सामना करने की प्रेरणा दी, तो कभी हताशा-निराशा के अँधेरों में उम्मीद की किरण बन कर चमकीं। कविता ने गद्य की तरह मुझसे अधिक कुछ नहीं मांगा। बस, थोड़ा-सा वक्त, थोड़ा-सा प्रकाश, थोड़ी-सी स्याही, थोड़ा-सा काग़ज़(कभी-कभी तो बस की टिकट के पिछ्ले हिस्से से भी काम चलाया)। लेखन के शुरूआती दिनों में सन् 1979 में मित्र रूपसिंह चन्देल के साथ मिलकर एक छोटा-सा कविता संकलन छ्पा- ‘यत्किंचित’ शीर्षक से। फिर काफी अंतराल के बाद वर्ष 2003 में एकल कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” आया। “सृजन-यात्रा” में अपने कविता संग्रहों और संग्रहों से बाहर की कविताएं मैं समय-समय पर ‘नेट’ की दुनिया के पाठकों के सामने रखता रहूँगा। इस अंक में प्रस्तुत हैं –मेरी एक कविता –‘काम करता आदमी’…&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;कविता&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SlGnpTpqoTI/AAAAAAAAAIo/VxP22G9L2_k/s1600-h/Man+at+work2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355245760011739442" style="WIDTH: 128px; CURSOR: hand; HEIGHT: 77px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SlGnpTpqoTI/AAAAAAAAAIo/VxP22G9L2_k/s200/Man+at+work2.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#660000;"&gt;काम करता आदमी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना अच्छा लगता है&lt;br /&gt;काम करता आदमी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छा लगता है&lt;br /&gt;लोहा पीटता लुहार&lt;br /&gt;रंदा लगाता बढ़ई&lt;br /&gt;गोद में बच्चा लिए&lt;br /&gt;पत्थर तोड़ती औरत&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;सड़क बनाता मजदूर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना अच्छा लगता है&lt;br /&gt;मिट्टी के संग मिट्टी हुआ किसान&lt;br /&gt;अटेंशन की मुद्रा में&lt;br /&gt;चौकसी करता जवान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा लगता है&lt;br /&gt;फाइलों मे खोया बाबू&lt;br /&gt;पियानों की तरह&lt;br /&gt;टाइपराइटर बजाता टाइपिस्ट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत अच्छी लगती है&lt;br /&gt;धुआँते चूल्हे में फुंकनी मारती माँ&lt;br /&gt;तवे के आकाश पर&lt;br /&gt;चाँद-सी रोटी सेंकती बहन&lt;br /&gt;धुले-गीले कपड़ों को&lt;br /&gt;अलगनी पर सुखाती पत्नी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल&lt;br /&gt;काम करता आदमी&lt;br /&gt;प्रार्थनारत् होता है&lt;br /&gt;और&lt;br /&gt;प्रार्थनारत् आदमी&lt;br /&gt;किसे अच्छा नहीं लगता।&lt;br /&gt;0&lt;br /&gt;(कविता संग्रह “&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;रोशनी की लकीर&lt;/span&gt;” में संग्रहित) &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5784818418025567768?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5784818418025567768/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5784818418025567768&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5784818418025567768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5784818418025567768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='कविताएं'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SlGo6tqRNSI/AAAAAAAAAIw/aSa8Xa0rPX8/s72-c/CAUPU5YF.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5533417691893131830</id><published>2009-05-30T10:18:00.000-07:00</published><updated>2009-05-31T02:13:10.503-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं और मेरा जीवन (आत्मकथ्य)'/><title type='text'>मैं और मेरा जीवन (आत्मकथ्य)</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SiFqpUnO-PI/AAAAAAAAAH4/_MQ_5HhDdxU/s1600-h/makadzal4.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341667891178567922" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 195px; CURSOR: hand; HEIGHT: 146px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SiFqpUnO-PI/AAAAAAAAAH4/_MQ_5HhDdxU/s200/makadzal4.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;“&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;सृजन-यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” एक वर्ष का सफ़र तय कर चुका है। गत वर्ष मई 2008 में जब मैंने अपनी रचनाओं पर केन्द्रित ब्लॉग “&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;सृजन-यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” आरंभ किया था तो सोचा था कि पहले मैं इस पर अपनी अभी तक प्रकाशित सभी कहानियों को एक-एक करके पोस्ट करूँगा, फिर लघुकथाएं और उसके बाद कविताएं तथा अन्य साहित्य। “&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;सृजन-यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में अब तक  मेरी 17 कहानियाँ ही प्रकाशित हो सकी हैं और अभी लगभग इतनी ही कहानियाँ कतार में हैं। देश-विदेश में बैठे अनेक साहित्य प्रेमियों और मेरे लेखक मित्रों ने न केवल इन प्रकाशित कहानियों पर अपनी मूल्यवान राय दी बल्कि बहुतों की यह राय रही कि मैं कहानियों के साथ-साथ अपनी अन्य रचनाएं यथा- लघुकथा, कविता, बालकहानी आदि भी बीच-बीच में पाठकों के सम्मुख लाता रहूँ ताकि वे मेरे अन्य लेखन से भी साथ-साथ परिचित होते रहें। इस माह से मैं अपने मित्रों की राय पर अमल करने जा रहा हूँ। अब कहानियों के अतिरिक्त अन्य विधाओं में किए गए अपने लेखन को भी बीच-बीच में मैं “&lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;सृजन-यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” के माध्यम से पाठकों के सम्मुख रखता रहूँगा और चाहूँगा कि वे मेरी अन्य विधाओं की रचनाओं पर भी अपनी बेबाक टिप्पणियाँ देकर अपनी मूल्यवान राय से मुझे अवगत कराते रहेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस अंक में मैं अपना ‘आत्मकथ्य’ प्रकाशित कर रहा हूँ। इसका आंशिक रूप भाई रूपसिंह चन्देल ने अपने साहित्यिक ब्लॉग “&lt;span style="color:#000099;"&gt;&lt;strong&gt;वातायन&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” में “&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;मैं क्यों लिखता हूँ ?&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” शीर्षक के अन्तर्गत प्रकाशित किया था और यह आत्मकथ्य सम्पूर्ण रूप में मुम्बई से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका “&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;कथाबिंब&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;” के जनवरी-मार्च 2009 अंक में भी प्रकाशित हुआ है। भाई बलबीर माधोपुरी द्वारा किया गया इसका पंजाबी अनुवाद पंजाबी की चर्चित त्रैमासिक प्रत्रिका “&lt;span style="color:#ff6600;"&gt;&lt;strong&gt;शबद&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;”(संपादक – जिंदर) में शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#330033;"&gt;आत्मकथ्य&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लिखना मेरे लिए एक सामाजिक कार्य है&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;सुभाष नीरव&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ तो पाठक किसी लेखक को उसकी रचनाओं से ही जानते-समझते हैं, फिर भी उनके अंदर लेखक के ‘निज’ को भी जानने-समझने की एक ललक हुआ करती है, उसके निजी जीवन में झांकना उन्हें अच्छा लगता है। शायद यही कारण हैं कि लेखकों की आत्मकथाएं पाठकों द्वारा खूब पसंद की जाती हैं। मेरे परम मित्र रूपसिंह चन्देल और “कथाबिंब” के संपादक डा0 माधव सक्सेना ‘अरविंद’ पिछ्ले कुछ समय से मुझे निरंतर प्रेरित और स्पंदित करते रहे हैं कि मैं अपने जीवन और लेखन से जुड़े छुए-अनछुए पहलुओं को एक आत्मकथ्य के जरिये पाठकों के साथ साझा करूँ। पर न जाने क्यों मुझे यह भय निरंतर सताता रहा कि कहीं मेरा ‘आत्मकथ्य’ एक ‘आत्मालाप’ न बन जाए। अपनी दु:ख-तकलीफ़ों, जीवन-संघर्षों को अपनी रचनाओं के माध्यम से तो मैं व्यक्त करता रहा हूँ परन्तु, इन्हें सीधे-सीधे दूसरों को बतलाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा। न जाने लोग कैसे अपनी आत्मकथाएं लिख लेते हैं। लिखना अपने आप से लड़ना होता है, और आत्मकथा/आत्मकथ्य लिखना तो अपने आप को अपने ही हाथों से छीलने जैसा तकलीफ़देह काम है।&lt;br /&gt;मेरा जन्म एक बेहद गरीब पंजाबी परिवार में हुआ जो सन् 1947 के भारत-पाक विभाजन में अपना सब कुछ पाकिस्तान में गंवा कर, तन और मन पर गहरे जख़्म लेकर, आश्रय और रोजी रोटी की तलाश में पश्चिम उत्तर प्रदेश के एक बहुत छोटे से नगर – मुराद नगर- में आ बसा था। इस लुटे-पिटे परिवार में मेरी माँ, मेरे पिता, मेरे दादा, मेरी नानी और मेरे चाचा थे। उन दिनों मुराद नगर स्थित आर्डिनेंस फैक्टरी में लेबर की भर्ती हो रही थी और मेरे पिता को यहाँ एक लेबर के रूप में नौकरी मिल गई थी, साथ में रहने को छोटा-सा मकान भी। डेढ़- दो वर्ष बाद चाचा को भी इसी फैक्टरी में नौकरी मिल गई तो विवाह के बाद वह पिता से अलग रहने लगे। दौड़-धूप करने पर चाचा को हमारे मकान से सटा मकान रहने के लिए मिल गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रारंभ में लेखन के लिए बीज हमें हमारे जीवन की घटनाओं से ही मिलते हैं और उन्हें अंकुरित-पल्लवित करने में हमारे आसपास का परिवेश और स्थितियां सहायक बनती हैं, ऐसा मेरा मानना है। इसलिए यहाँ अपने जीवन की उन पारिवारिक स्थितियों-परिस्थितियों का उल्लेख कर लेना मुझे बेहद आवश्यक और प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है जिसकी वजह से मेरे अंदर लेखन के बीज पनपे और जिन्होंने मुझे कलम पकड़ने के लिए प्रेरित किया। मुझे अपने लेखन के बिलकुल शुरुआती दिन स्मरण हो आ रहे हैं। जब मैं अपने अतीत को खंगालने की कोशिश करता हूँ तो स्मृतियों-विस्मृतियों के बीच झूलते वे दिन मेरी आँखों के आगे आ जाते हैं जब मैं इंटर कर चुकने के बाद एक असहय अकेलेपन के साथ-साथ भीषण बेकारी के दंश को झेल रहा था और इस दंश से मुक्ति की राह मैं साहित्य में ढूँढा करता था। साहित्यिक पत्रिकाएं और पुस्तकें मुझे इस दंश से, भले ही कुछ देर के लिए, मुक्ति दिलाती थीं। कहानी, उपन्यासों के पात्र मेरे साथी बन जाते थे और कई बार कोई पात्र तो मुझे बिलकुल अपने सरीखा लगता था।&lt;br /&gt;मुझे लेखन विरासत में नहीं मिला। जिस गरीब मजदूर परिवार में मैं पला-बढ़ा, उसमें दूर-दूर तक न तो कोई साहित्यिक अभिरूचि वाला व्यक्ति था और न ही आसपास ऐसा कोई वातावरण था। पिता फैक्टरी में बारह घंटे लोहे से कुश्ती किया करते थे। फैक्टरी की ओर से रहने के लिए उन्हें जो मकान मिला हुआ था, वहां आसपास पूरे ब्लॉक में विभिन्न जातियों के बेहद गरीब मजदूर अपने परिवार के संग रहा करते थे, जिनमें पंजाबी, मेहतर, मुसलमान, पूरबिये, जुलाहे आदि प्रमुख थे। एक ब्लॉक में आगे-पीछे कुल 18 क्वार्टर होते थे- नौ आगे, नौ पीछे। दोनों तरफ ब्लॉक के बीचोंबीच एक सार्वजनिक नल होता था जहां सुबह-शाम पानी के लिए धमा-चौकड़ी मची रहती थी, झगड़े होते थे, एक दूसरे की बाल्टियाँ टकराती थीं। जहाँ औरतों में सुबह-शाम कभी पानी को लेकर, कभी बच्चों को लेकर झगड़े हुआ करते थे, हाथापाई तक हुआ करती थी। मेरे हाई स्कूल करने तक घरों में बिजली नाम की कोई चीज नहीं थी। बस, स्ट्रीट लाइट हुआ करती थी। ऊँचे-लम्बे लोहे के खम्भों पर लटकते बल्ब शाम होते ही सड़क पर पीली रोशनी फेंकने लगते थे। मुझे अपनी पढ़ाई-लिखाई मिट्टी के तेल के लैम्प की रोशनी में करनी पड़ती थी या फिर घर के पास सड़क के किनारेवाले किसी बिजली के खम्भे के नीचे चारपाई बिछाकर, उसकी पीली मद्धिम रोशनी में अपना होमवर्क पूरा करना पड़ता था।&lt;br /&gt;घर में तीन बहनें, तीन भाई, पिता, अम्मा के अलावा नानी भी थी। नानी के चूंकि कोई बेटा नहीं था, भारत-पाक विभाजन के बाद, वह आरंभ में तो बारी-बारी से अपने तीनों दामादों के पास रहा करती थीं, पर बाद में स्थायी तौर पर अपने सबसे छोटे दामाद यानी मेरे पिता के पास ही रहने लगी थीं। वह बाहर वाले छोटे कमरे जो रसोई का भी काम देता था, में रहा करती थीं। दरअसल, यह कमरा नहीं, छोटा-सा बरामदा था जो पाँच फीट ऊँची दीवार से ढ़का हुआ था। इसमें लकड़ी का जंगला था जो आने-जाने के लिए द्वार का काम करता था। ठंड के दिनों में दीवार के ऊपर की खाली जगह और जंगले को टाट-बोरियों से ढ़क दिया जाता था। यह बरामदा-नुमा कमरा बहुद्देशीय था। नानी का बिस्तर-चारपाई, रसोई का सामान, आलतू-फालतू सामान के लिए टांट आदि को अपने में समोये हुए तो था ही, अक्सर घर की स्त्रियाँ इसे गुसलखाने के रूप में भी इस्तेमाल किया करती थीं। नानी, माँ या बहनों को जब नहाना होता तो घर के पुरुष घर से बाहर निकल जाते और टाट और बोरियों के पर्दे गिरा कर वे जल्दी-जल्दी नहा लिया करतीं। जब तक नानी की देह में जान थी, हाथ-पैर चलते थे, वह फैक्टरी के साहबों के घरों में झाड़ू-पौचा, बर्तन मांजना, बच्चों की देखभाल आदि का काम किया करती थी और अपने गुजारे लायक कमा लेती थीं। बाद में, जब शरीर नाकारा होने लगा तो उन्होंने काम करना छोड़ दिया और वह पूरी तरह अपने दामाद और बेटी पर आश्रित हो गईं। दादा भी थे पर वह साथ वाले घर में हमारे चाचा के संग रहते थे। घर में मुझसे बड़ी एक बहन थी और मुझसे छोटी दो बहनें और दो भाई। उन सस्ती के दिनों में भी पिता अपनी सीमित आय में घर का बमुश्किल गुजारा कर पाते थे। उनकी स्थिति उन दिनों और अधिक पतली हो जाती जब फैक्टरी में 'ओवर टाइम' बन्द हो जाता। कई बार तो शाम को चूल्हा भी न जलता था। पिता घर से छह-सात मील दूर कस्बे की जिस लाला की दुकान से हर माह घर का राशन उधार में लेकर डाला करते थे, ऐसे दिनों में वह भी गेंहू-चावल देने से इन्कार कर दिया करता था। पिछले माह का उधार उसे पहले चुकाना पड़ता था, तब वह अगले माह के लिए राशन उधार देता था। ओवर टाइम बन्द हो जाने पर पिता पिछले माह का पूरा उधार चुकता करने की स्थिति में न होते, वे आधा उधार ही चुकता कर पाते थे। घर में कई बार शाम को चावल ही पकता और उसकी मांड़ निकाल कर रख ली जाती और कुछ न होने पर उसी ठंडी मांड़ में गुड़ की डली मिलाकर हम लोग पिया करते और अपनी क्षुधा को जबरन शांत करने का प्रयास किया करते थे। माँ, घर के बाहर बने बाड़े में से चौलाई का साग तोड़ लाती और उसमें दो आलू काटकर सब्जी बनाती। सन् 1962 में भारत -चीन युद्ध के दौरान जब गेंहू-चावल का भंयकर अकाल पड़ा तो हमने जौं- बाजरे की बिना चुपड़ी रोटियाँ भी खाईं जिन्हें गरम-गरम ही खाया जा सकता था, ठंडी हो जाने पर वे पत्थर -सी सख्त हो जातीं और उन्हें चबाते-चबाते हमारे मुँह दुखने लगते।&lt;br /&gt;ऐसे में पिता जो पूरे परिवार की गाड़ी किसी प्रकार खींच रहे थे, की नज़रें मुझ पर टिक गई थीं। वे चाहते थे कि मैं हाई-स्कूल करने के बाद कोई काम-धंधा या नौकरी देखूं ताकि उन्हें कुछ सहारा मिल सके। उधर उन्हें जवान होती बेटियों के विवाह की चिंता भी खाये जा रही थी। वे चाहते थे कि किसी तरह सबसे बड़ी बेटी की शादी कर दें। एक दिन बड़ी बहन को लेकर घर में जबरदस्त हंगामा हुआ। पिता पागलों की भांति चीखने-चिल्लाने लगे। अगले रोज उन्होंने उसकी पढ़ाई छुड़वा दी। तुरत-फुरत लड़का देखा और कर्ज़ा उठाकर उसका ब्याह कर दिया। बड़ी बेटी का विवाह कर वह कर्जे में इतना दब गए कि उनकी हालत दिन-ब-दिन खराब होती चली गई। अंदर-बाहर से टूटते पिता शरीर से कमज़ोर होते चले गए। पिता की दयनीय हालत पर मुझे बेहद तरस आता और मैं सोचता कि पढ़ाई में क्या रखा है, मैं भी किसी फैक्टरी, कारखाने में लग जाऊँ और कुछ कमा कर पिता के सिर का बोझ हल्का करूँ।&lt;br /&gt;लेकिन मुझे किताबों से बहुत प्रेम था। भले ही वे पाठ्यक्रम की पुस्तकें थीं। नई किताबों के वर्कों से उठती महक मुझे दीवाना बना देती थी। हाई स्कूल की बोर्ड की परीक्षा देने के बाद मैं एक दिन घर से भाग निकला और अपनी बड़ी बहन जो दिल्ली में ब्याही थी और मोहम्मद पुर गांव में एक किराये के मकान में रहती थी, के पास जा पहुँचा। मेरे जीजा ठेकेदार थे और सरकारी इमारतों की मरम्मत, सफेदी आदि के छोटे-मोटे ठेके लिया करते थे। मुझे अकस्मात् अकेले आया देख वे हतप्रभ थे। पिता चूंकि मुझे आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने जीजा से कहा कि वह मुझे कहीं भी छोटे-मोटे काम पर लगवा दें, भले ही मजदूर के रूप में अपने पास ही रख लें। मुझे पूरी उम्मीद थी कि मैं बोर्ड की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाऊँगा क्योंकि मेरे पेपर्स अच्छे गए थे। मैं चाहता था कि जब परीक्षा परिणाम निकले तो मेरे पास कम से कम इतने पैसे अवश्य हों कि मैं आगे दाखिला ले सकूं। मेरे जीजा ने मुझे नार्थ ब्लॉक में कह-सुनकर डेलीवेजर के रूप में लगवा दिया- साढ़े तीन रुपये दिहाड़ी पर। सन् 1970 की गर्मियों के दिन थे। मुझे डेजर्ट कूलरों में पानी भरने पर लगा दिया गया था। उन दिनों वहां पाइप से कूलरों में पानी नहीं भरा जाता था। हर डेलीवेजर को दो-दो बाल्टियाँ इशू होती थीं। उन्हें नल से भरकर हमें कूलरों में सुबह-शाम पानी भरना पड़ता था। बीच के वक्त हमसे दूसरा काम लिया जाता जैसे कमरों की साफ-सफाई का, सामान इधर-उधर करने का, चपरासीगिरी का। कभी-कभी किसी साहब के घर का काम करने के लिए भी भेज दिया जाता। साहबों की बीवियाँ हम पर इस तरह रौब झाड़तीं जैसे हम उनके ज़रखरीद गुलाम हों। वे हमसे लैट्रीन-बाथरूम साफ करवातीं, पूरे घर में पौचा लगवातीं और बर्तन मंजवातीं। हम जानते थे कि विरोध करने का अर्थ है- अस्थायी नौकरी से हाथ धोना। इस सबके बावज़ूद छुट्टी के दिन हम लोग ड्यूटी लगवा लेते थे ताकि कुछ पैसे और बन सकें। मैंने वहां दो-ढ़ाई माह काम किया। माह के अंत में जो रुपये मुझे मिलते, मैं उन्हें बहन को दे दिया करता। आने-जाने का किराया वही दिया करती थीं। जीजा प्राय: साइकिल से काम पर जाया करते थे। मैं बस पकड़कर आता-जाता था। उन दिनों दिल्ली में डी टी यू की बसें चला करती थीं और किराया होता था- पाँच, दस, पंद्रह और बीस पैसे। जिस दिन शाम की बस पकड़ने के लिए मेरे पास पैसे न होते, मैं पैदल ही केन्द्रीय सचिवालय से मोहम्मद पुर जाया करता। आरम्भ में मुझे शॉर्टकट रास्ता मालूम न था। मैं पैदल उधर-उधर से घर जाता जिधर-जिधर से बस होकर जाया करती थी। जब मैं घर पहुँचता तो मेरे पांव दर्द से बिलबिलाने लगते। कभी-कभी तो सूज भी जाते। पर मैं बहन और जीजा को कुछ न बतलाता और ऑफिस में काम ज्यादा होने का बहाना बनाकर सो जाता।&lt;br /&gt;जब दसवीं की बोर्ड की परीक्षा का परिणाम अखबार में निकला, मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं गुड सेकेंड डिवीजन से पास हो गया था। मैंने आगे काम करने से इंकार कर दिया और बहन से अपने रुपये लेकर सीधा मोदी इंटर कालेज, मोदी नगर में दाखिला लेने चला गया। मेरा दाखिला भी हो गया। घर में सब खुश थे पर पिता खुश नहीं थे। बाद में लोगों के समझाने-बुझाने पर वह मान गए। इंटर करने तक के वे दो साल बड़े कष्टप्रद रहे। मैं रेल का मासिक स्टुडेंट पास बनवाकर अपने कुछ मित्रों के संग कालेज जाया करता था। कई बार ट्रेन छूट जाती, मेरे पास बस से जाने के पैसे न होते और उस दिन मेरी छुट्टी हो जाती। अगले रोज़ कालेज में सजा मिलती। प्रिंसीपल बहुत सख़्त था, कुछ सुनता ही नहीं था। कालेज से नाम काट देने की धमकी देता था। दोपहर में साढ़े बारह बजे कालेज से छुट्टी होती। इसी समय की एक ट्रेन थी जिसे बहुत मुश्किल से हम पकड़ पाते। कालेज रेलवे लाइन की बगल में स्टेशन से दसेक मिनट की दूरी पर था। प्राय: ट्रेन दस-पन्द्रह मिनट लेट हुआ करती थी, इसलिए मिल जाया करती थी। लेकिन जिस दिन सही समय पर आती, हमें अपने कालेज से ही दौड़ लगानी पड़ती। स्टेशन पहुँचते-पहुँचते हमारी साँसें फूल जातीं, शरीर पसीने से लथपथ हो जाता। कभी चलती ट्रेन में चढ़ने में कामयाब हो जाते, कभी वह छूट जाती। इसके बाद चार बजे की ट्रेन थी जो प्राय: लेट होती और उससे घर पहुँचते-पहुँचते शाम हो जाती। मित्र तो बस पकड़कर चले जाते, पर पैसे न होने के कारण मुझे वहीं स्टेशन पर समय बिताना पड़ता। मैं माल गोदाम में पड़े सामान के गट्ठरों पर बैठ कर अपना होम वर्क करता और पढ़ा करता। कभी-कभी सुबह जल्दी में लंच बॉक्स छूट जाता तो दोपहर में भूख के मारे बुरा हाल हो जाता। मित्र कभी अपना लंच शेयर करवाते, कभी नहीं। ऐसी स्थिति में यदि मेरे पास एक-दो रुपये हुआ करते तो मैं पचास पैसे के मिर्च वाले लाल चने लेकर खाया करता और ढ़ेर सारा पानी पीकर अपनी भूख को शांत करने की झूठी कोशिश किया करता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन् 1972 में इंटर की परीक्षा पास की तो पिता ने हाथ खड़े कर दिए। वह आगे पढ़ाने के लिए अब कतई तैयार नहीं थे। वे चाहते थे कि अब मैं कोई न कोई कामधंधा या नौकरी देखूं। इंटर में मेरे पास फिजिक्स, केमेस्ट्री और बॉयलोजी सबजेक्ट्स थे। मेरे कुछ मित्रों ने पी एम टी के फार्म भरे तो मैंने भी भर दिया, यह सोचकर कि पास तो होना नहीं है। अगर हो गया तो भी डॉक्टरी न कर पाऊँगा क्योंकि मेरे पिता के पास इतने पैसे ही नहीं हैं। वे तो पहले ही कर्ज से दबे पड़े हैं और छोटी दो जवान होती बेटियों के विवाह की चिंता उन्हें रात-रात भर सोने नहीं देती। लेकिन मैं मेरठ पी एम टी में पास हो गया, मेरे मित्र भी पास हो गए थे। उन्होंने कालेज ज्वाइन भी कर लिया था। मगर मेरे परिवार की गरीबी और अभावों भरी मारक स्थितियों ने मेरे डॉक्टर बनने के स्वप्न का क़त्ल कर दिया। कई दिनों तक मैं इस पीड़ा से उबर नहीं पाया और फिर इसे नियति का फैसला मानकर सब्र कर लिया। पिता और मेरा परिवार भी क्या करता। अगर उनके पास पूंजी होती तो क्या वे भी अपने बेटे को डॉक्टर बनता देख खुश न होते ? पर वे लाचार और विवश थे। कोई उनकी मदद करने वाला नहीं था। रिश्तेदारी में क्या और बाहर क्या ! वे दिन बड़े भयावह और संत्रास भरे थे। मेरे पास नौकरी के लिए आवेदन करने लायक पैसे नहीं होते थे। पिता की स्थिति बड़ी दयनीय थी। तनख्वाह का सारा पैसा उधारी चुकाने में चला जाता था। घर में कभी-कभी फाके जैसी हालत होती। मैंने आसपास की फैक्टरियों में काम तलाशने की बहुत कोशिश की, पर कामयाब नहीं हो पाया। बगैर सिफारिश के कोई रखता नहीं था। उन दिनों मैं बेकारी के भीषण दंश को झेल रहा था। मैं सारा-सारा दिन घर में पड़ा रहता। खाने-पीने को मन न करता। स्वयं को बेहद अकेला, असहाय और उदास महसूस करता। कई बार घर से भाग जाने की इच्छा होती। रात-रात भर नींद नहीं आती थी। किसी से बात करने को मन नहीं करता था। मेरा स्वभाव रूखा और चिड़चिड़ा हो गया था।&lt;br /&gt;पिता घर को चलाने में आर्थिक मोर्चे पर लगातार परास्त होते जा रहे थे। उन्हें अब समझ में आने लगा था कि उनकी इस बदहाली का एक प्रमुख कारण उनका बड़ा परिवार है। छह बच्चों की जगह दो या तीन हुए होते तो ऐसी तंगी और बदहाली शायद न होती। वे कभी-कभी जब माँ से लड़ते-झगड़ते तो अपने आप को कोसने लगते कि उन्होंने इस ओर क्यों ध्यान नहीं दिया। इन दिनों उन्होंने अपनी तंगी को पाटने के लिए एक रास्ता खोज निकाला। अब वे फैक्टरी में लंच के समय बीड़ी, सिगरेट, माचिस, तम्बाकू, नमकीन और मूंगफली के पैकेट बेचने लगे थे। शुरू में उन्हें कुछ दिक्कत हुई, बाद में लोग खुद आ आकर उनसे सामान खरीदने लगे। मोहल्ले में जब आस पड़ोस वालों को मालूम हुआ तो लोग घर पर भी आने लगे। कभी माचिस, कभी बीड़ी का बंडल, कभी नमकीन आदि खरीदने। घर पर पिता न होते तो माँ या बहनें ये सामान दिया करतीं। मुझे, फैक्टरी में पिता द्वारा ये सब बेचने में कोई बुराई नज़र नहीं आती थी, पर इसका घर में भी शुरू हो जाना, मुझे बिलकुल पसंद न था। कोई भी अड़ोसी-पड़ोसी जिसमें मर्द और मोहल्ले के छोकरे अधिक हुआ करते, जब मन होता, मुँह उठाये सीधे हमारे घर में घुसे चले आते। मैं घर पर होता तो मुझे बेहद कोफ्त होती। मैं उठकर कभी सामान न देता और “नहीं है” कह कर अक्सर उन्हें भगा दिया करता।&lt;br /&gt;इंटर करते समय कालेज की लायब्रेरी में मुझे हिंदी पत्रिकायें जैसे- धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, सारिका, सरिता, मुक्ता आदि पढ़ने को मिल जाती थीं। लेकिन मुराद नगर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। खरीद कर मैं पढ़ नहीं सकता था। अखबार पढ़ने के लिए घर से डेढ़-दो मील किसी चायवाले या पानवाले की दुकान पर जाना पड़ता। तभी मेरे एक मित्र ने मुझे आर्डिनेंस फैक्टरी की एक छोटी-सी लायब्रेरी जो नई-नई खुली थी, का सदस्य बनवा दिया। वहाँ से साहित्यिक पुस्तकें इशू करवा कर मैं पढ़ने लगा था। हिंदी के नये पुराने कई लेखकों के उपन्यास, कहानी संग्रह, कविता संग्रह जो भी उस पुस्तकालय में उपलब्ध होते, मैंने पढ़ने आरंभ कर दिए थे। ये किताबें मुझे सुकून देती थीं। मैं इनमें खो जाता था। अपना अकेलापन, अपना दुख, अपनी पीड़ा, बेकारी का दंश भूल जाता था। यहीं मैंने प्रेमचंद को पूरा पढ़ा।&lt;br /&gt;इन्हीं दिनों मैंने अनुभव किया कि मैं कवि होता जा रहा हूँ। मैं अपने अकेलेपन के संत्रास को तुकबंदियों में उतारने लगा। ऐसा करने पर मुझे लगता कि मेरा दुख कुछ कम हो गया हो जैसे। उन अधपक्की, अधकचरी कविताओं का रचयिता और पाठक मैं स्वयं ही था। मेरा बहुत मन होता कि कोई मेरी कविता सुने या पढ़े। इधर फैक्टरी में ओवर टाइम लगना आरंभ हो गया था और पिता ने मुझे जेब खर्च के लिए कुछ पैसे देने प्रारंभ कर दिए थे। उन पैसों से मैं नौकरी के लिए आवेदन पोस्ट करने लग पड़ा था। ढेरों इंटरव्यू और लिखित परीक्षाएं दीं, पर सफल नहीं हुआ। एक दिन मेरी किस्मत का बंद दरवाजा खुला। मेरा मेरठ कचेहरी में क्लर्क के पद के लिए चयन हो गया, पर मुझे पैनल में डाल दिया गया था। लगभग आठ-नौ महीने के बाद मेरी नियुक्ति गाजियाबाद सिविल कोर्ट में हुई। मेरे ही नहीं, घर के सभी सदस्यों के पैर धरती पर नहीं पड़ रहे थे। पिता की आंखों में चमक आ गई थी। माँ ने घर में कीर्तन रखवा लिया था।&lt;br /&gt;गाजियाबाद मैं रेल से आता-जाता था। शाम को लौटते वक्त गाजियाबाद स्टेशन पर बुक स्टालों पर मैं पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा था। मैं अब पत्रिकाओं के पते नोट करता और अपनी कच्ची-पक्की कविताओं को संपादकों को भेजा करता। फिर कई-कई दिन संपादकों के उत्तर की बेसब्री से प्रतीक्षा किया करता। पर मेरी हर रचना सखेद लौट आती थी। मन बेहद दुखी होता। लेकिन रचनाएं भेजना मैंने बन्द नहीं किया। एक दिन दिल्ली प्रेस की पत्रिका ''मुक्ता'' से मुझे जब स्वीकृति पत्र मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं चाहता था कि मैं अपनी इस खुशी को किसी के संग शेयर करुँ। एक दो मित्रों से बात की पर उन्होंने कोई खुशी जाहिर नहीं की। धीरे-धीरे मेरी कविताएं ‘सरिता’ ‘मुक्ता’ में नियमित रूप से छपने लगीं। ये बड़ी रोमानी किस्म की कविताएं होती थीं। कलर पृष्ठों पर छपती थीं। मैं अपनी छपी हुई कविताओं को और उन कविताओं के साथ छपे युवतियों के रंगीन चित्र को देखकर मुग्ध होता रहता। मुझे लगता जैसे मैं देश का एक बड़ा कवि हो गया होऊँ। ‘सरिता’, ‘मुक्ता’ में छपने वाली रचनाओं का पारिश्रमिक भी मुझे मिलता था। उस पारिश्रमिक से मैं पत्र-पत्रिकाएं खरीदा करता। मुराद नगर के स्थानीय कवि जो मंचों पर कविताएं पढ़ा करते थे, अब मुझे जानने लगे थे। इनमें वेद प्रकाश ‘सुमन’ और जगदीश चंद्र शर्मा ‘मंयक’ प्रमुख थे। वे अक्सर मुझसे मिलते। अब मैं उनकी काव्य गोष्ठियों में जाने लगा था और अपनी कविताएं सुनाने लगा था। वे मेरी कविताओं की तारीफ़ किया करते। मुराद नगर में हर साल फैक्टरी की ओर से एक विशाल कवि सम्मेलन भी हुआ करता था और उसमें देश के नामी-गिरामी कवि और स्थानीय कवि मंच पर कविता पढ़ा करते थे। कवियों को बुलाने और मंच संचालन का जिम्मा सुमन जी के हाथों में होता। मैं मंच व्यवस्था करने में उनकी मदद किया करता, कुर्सियाँ लगवाता, दरियाँ बिछवाता। वे मुझे कहते कि मैं अपनी एक अच्छी-सी कविता तैयार रखूँ मंच पर पढ़ने के लिए। मैं खोज-खोज कर अपनी कविताएं हाथ से लिखता, उन्हें कंठस्थ करता। आरंभ में वे एक-एक करके स्थानीय कवियों को पढ़वाते, जब कोई कवि कविता पढ़कर हटता मुझे लगता सुमन जी अब मेरे नाम की घोषणा करेंगे। मैं साँस रोक कर बेसब्री से प्रतीक्षा करता रहता, पर मेरा नाम न पुकारा जाता। मुझे बड़ी कोफ्त और पीड़ा होती। गुस्सा भी आता। फिर मैंने उनकी काव्य गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में जाना ही छोड़ दिया।&lt;br /&gt;उन्हीं दिनों हम कुछ युवाओं ने मिलकर मुराद नगर में अपनी एक अलग संस्था बनाई- “विविधा” नाम से। इसमें मेरे अलावा सुधीर गौतम, रूपसिंह चन्देल, सुधीर अज्ञात, संत राज सिंह और प्रेमचंद गर्ग प्रमुख थे। हम ‘विविधा’ की मासिक गोष्ठियाँ करते जिसमें हम अपनी नई लिखी रचनाओं को सुनाते। ‘विविधा’ के अंतर्गत हमने ‘सारिका’ के कई महत्वपूर्ण अंकों पर भी गोष्ठियाँ कीं। एक बड़े पैमाने पर कविता गोष्ठी का आयोजन भी किया जिसमें नागार्जुन भी आए थे। उन्हें दिल्ली से मुराद नगर लाने का दायित्व मुझ पर था। मैं बहुत उत्साहित था। इतने बड़े कवि का सानिध्य मिल रहा था। जिस रविवार यह कार्यक्रम था, उसी रविवार को नवभारत टाइम्स के रविवासरीय अंक में युवा जगत के अंतर्गत मेरे द्वारा आयोजित आधे पृष्ठ की एक परिचर्चा प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था –“युवा पीढ़ी और आत्म घुटन”। मित्रों-दोस्तों में इसे लेकर चर्चा थी और वे मेरी प्रशंसा कर रहे थे। प्रशंसा सुन मैं जैसे हवा में उड़ने लगा था। मेरी इस हवा को शाम के वक्त निकाला- नागार्जुन जी ने। बड़े रूखे और कड़वे शब्दों में बोले- “ये क्या है? इन सब ढ़कोसलों से तुम लेखक/कवि न बन पाओगे। कुछ मौलिक और अच्छा लिखने का प्रयास करो। अच्छा साहित्य पढ़ो।” मैं जैसे आकाश से धरती पर आ गिरा था- परकटे पक्षी की तरह। यह बात नागार्जुन जी ने मुझे अकेले में कही होती तो कोई बात नहीं थी। तीस-चालीस स्थानीय लोगों की भीड़ में उन्होंने कहा था। मैने अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया। उस रात और उससे अगले कई रोज़ मैं ठीक से सो नहीं पाया। लेकिन जल्द ही मुझे उनकी सलाह बहुत कीमती जान पड़ी। ये सन 76 या 77 के दिन रहे होंगे।&lt;br /&gt;उन्हीं दिनों मैंने केन्द्र सरकार में लिपिकों की भर्ती से संबंधित अखिल भारतीय स्तर पर होने वाली परीक्षा दी थी जिसमें मैं उत्तीर्ण हो गया था और मेरी नियुक्ति भारत सरकार के दिल्ली स्थित नौवहन व परिवहन मंत्रालय में हो गई थी। मैंने कोर्ट की नौकरी से त्यागपत्र दिया और दिल्ली आने-जाने लगा। दिल्ली मैं रेल से ही आया-जाया करता था। यहाँ आकर मैं दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी का सदस्य बन गया। अब पढ़ने को मेरे पास एक से एक किताब होती। नये पुराने हिंदी-पंजाबी के लेखकों-कवियों की पुस्तकों को मैं अपने रेल के दो घंटे के सफ़र में पढ़ने लगा था। अच्छे और श्रेष्ठ साहित्य ने मेरे अंदर नई समझ और नई दृष्टि प्रदान की। यहाँ मैं अपने मित्र रूपसिंह चन्देल के साथ कई बड़े लेखकों से मिला। यही वो दिन थे जब मुझे अपने अब तक के लिखे से ही वितृष्णा होने लगी। धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा था कि यह सब नकली लेखन है। मेरी आँखों के सामने लाचार, विवश मेरी बूढ़ी नानी आने लगी थी, थके-हारे पराजित से पिता की कातर नज़रें मेरा पीछा करने लगी थीं, माँ का बुझा-बुझा-सा रहने वाला चेहरा और छोटी बहनों की आँखों में बनते-टूटते सपने मुझे तंग-परेशान करने लगे थे। मैं अपने आप से प्रश्न करता कि जो कुछ मैं अब तक लिखता रहा हूँ, उसमें ये लोग कहाँ हैं ? कहाँ हैं इनकी दुख-तकलीफों का चित्रण, जीवन का सच क्या है ? मैं अपने आसपास के यथार्थ से मुँह क्यों मोड़ता रहा हूँ ? मेरे अंदर ऐसे विचारों का प्रस्फुटन ठीक तब से होने लगा जब से मैं गंभीर साहित्य पढ़ने लगा था। सारिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान की कहानियां मुझे जब से उद्वेलित करने लगी थीं। इन कहानियों के पात्र मुझे भीतर तक कुरेदने लगे थे और मुझे अपने लेखन को जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों, कड़वे यथार्थ की ओर उन्मुख करने को प्रेरित करने लगे थे।&lt;br /&gt;अच्छा साहित्य न केवल मनुष्य को एक बेहतर मनुष्य बनाता है बल्कि एक लेखक को बेहतर लेखक भी बनाता है। मैंने अपने दादा-नानी के दु:ख-दर्दों को बहुत करीब से देखा था। पिता को परिवार के लिए हाड़-मांस गलाते देखा था। माँ को परिवार की रोटी-पानी की चिंता में हर समय घुलते देखा था। अपने परिवार के साथ-साथ अपने पड़ोस में रहते बूढ़ों की दुगर्ति मैंने देखी थी। बुढापे में लाठी का सहारा कहे जाने वाले बेटों की घोर उपेक्षा में बूढ़ों को तिल-तिल मरते देखा था। यह एक सामाजिक यथार्थ था मेरी आँखों के सामने, इस यथार्थ की छवियाँ, इनका चित्रण कथा-कहानियों में देखता तो मैं भी अपने आप से प्रश्न करता- मैं भी ऐसा क्यों नहीं लिखता जिसमें इन लोगों की बात हो। ये जीवित पात्र मुझे अब बार-बार उकसाने लगे थे। बदलते समय ने मेरे सरोकार और मेरे लेखक होने के कारण को बदलने में मदद की। मैंने पहली कहानी लिखी- ''अब और नहीं।'' यह एक रिटायर्ड वृद्ध की व्यथा-कथा थी जिसे मैंने अपने ढंग से लिखने की कोशिश की। बूढ़े-बुजुर्ग लोग मेरी संवेदना को झकझोरते रहे हैं और मैं समय-समय पर इनको केन्द्र में रखकर कहानियाँ लिखता रहा हूँ। ''बूढ़ी आँखों का आकाश'', ''लुटे हुए लोग'', '' इतने बुरे दिन'', ''तिड़के घड़े'', ''उसकी भागीदारी'', ''आख़िरी पड़ाव का दु:ख'', ''जीवन का ताप'', ''कमरा'' मेरी ऐसी ही कहानियाँ/लघुकथाएं हैं।&lt;br /&gt;बेकारी के दंश को अभिव्यक्त करती मेरी कहानी ''दैत्य'' हो अथवा ''अंतत:'' दोनों के पीछे मेरे अपने बेकारी के दिन भले ही रहे हों, पर ये कहानियां व्यापक रूप में भारत के हजारों-लाखों बेकार युवकों के संताप को ही व्यक्त करती हैं।&lt;br /&gt;मेरे लेखन के पीछे जो मुख्य कारण व कारक सक्रिय रहा, वह था मेरा अपना परिवार। अभावों, दु:खों-तकलीफों में जीता परिवार। पिता के और मेरे अपने संघर्ष। धीरे-धीरे उसमें आस पास का समाज भी जुड़ता चला गया। ज़रूरी नहीं कि एक समय में लिखने का जो कारण रहा हो, दूसरे समय में भी वही रहे। समय के साथ-साथ ये कारण बदलते रहते हैं। जैसे-जैसे लेखक अपने समय और समाज से गहरे जुड़ता जाता है, उसके सरोकार और लिखने के कारण भी उसी प्रकार बनते-परिवर्तित होते रहते हैं। अगर मैं यहाँ यह कहूँ कि ‘प्रेम’ भी मेरे लिखने का एक कारण रहा है तो गलत न होगा। प्रेम भी हमारी सृजनात्मकता को उर्वर बनाता है और उसमें गति लाता है। जब आप प्रेम में होते हैं, तो सृजन के बहुत करीब होते हैं, ऐसा मेरा अनुभव और मानना है। एक समय, मोहल्ले की एक लड़की जो हमारे घर के सामने रहा करती थी, से हुए मेरे इकतरफा प्रेम ने भी मुझसे बहुत कुछ लिखवाया। ढेरों प्रेम कविताएं, कई प्रेम कहानियाँ। इनमें से कुछ ही सुरक्षित रह सकीं, बहुतों को मुझे नष्ट करना पड़ा। इस सन्दर्भ में मुझे एक प्रसंग याद आ रहा है। जिस लड़की से मुझे इकतरफा प्रेम था, मैं उसे अपने लेखकीय गुण से इंप्रैस करना चाहता था। मैं अपने को लेखक होने के नाते एक विशिष्ट व्यक्ति मानता था और चाहता था कि मेरे इस गुण के वशीभूत वह मुझसे प्रेम करने लगे। मैंने मालूम किया कि उस लड़की के घर कौन-सा हिंदी का अखबार आता है। फिर मैंने एक कहानी लिखी और उसी अखबार में छपने के लिए भेज दी। उस अखबार में कहानी के साथ लेखक की फोटो भी छपा करती थी। एक रविवार कहानी छप गई। मेरी फोटो सहित। लेकिन विडम्बना देखें कि उस दिन उसके घर में वह अखबार नहीं आया, हॉकर उसके बदले में दूसरा अखबार डाल गया। मेरी हसरत पर मानो तुषारापात हो गया।&lt;br /&gt;इस घटना के बाद यह अलग बात है कि उस लड़की से मेरा प्रेम चला। पर इसके पीछे मेरा लेखन कोई कारण नहीं बना। उस लड़की ने मुझे मेरे लेखक होने के नाते प्रेम नहीं किया। धीरे-धीरे हमारा यह प्रेम ऊँची पींगें लेने लगा। हम अकेले में मिलते, सिनेमा देखने जाते, पार्कों में मिलते और बीच-बीच में पत्रों का आदान-प्रदान भी होता। पुराना किला, चिड़ियाघर, मदरसा, कुतुब, इंडिया गेट, प्रगति मैदान, कनॉट प्लेस ऐसी कोई जगह नहीं थी दिल्ली की जहाँ हम न मिला करते। लेकिन फिर वही हुआ जैसा कि एक भारतीय समाज में होता है। उसके माँ-बाप ने अपनी बिरादरी में उसका विवाह तय कर दिया। उस समय मेरे दिल के कितने टुकड़े हुए, मैं ही जानता हूँ। चोट खाया मैं मजनूं-सा प्रेम कविताएं लिखता रहा और लिख-लिख कर फाड़ता रहा। फिर उसका विवाह हो गया। मुझे लगा, अब हम कभी नहीं मिल पाएंगे। मेरे माँ-बाप ने मेरा भी विवाह कर दिया।&lt;br /&gt;कई बरसों बाद सन् 1992 में इसी प्रेम के अहसास ने मुझसे ''चोट'' जैसी प्रेम कहानी लिखवाई जिसे पढ़कर मेरी पत्नी ने नाक-भौं सिकौड़ी थी और कहा था- “यह क्या कहानी है ?” उन दिनों मेरा भीषण एक्सीडेंट हुआ था और बायें पैर की पाँच हड्डियाँ टूट गई थीं। मैं लगभग तीन महीने बिस्तर पर पड़ा रहा था। घर पर मेरे लेखक मित्र मुझे मिलने आया करते थे। रूप सिंह चन्देल तो प्राय: मेरा हाल-चाल जानने आया करते। चन्देल ने वह कहानी पढ़कर तारीफ़ की और कहा कि इसे तुरत बलराम को दे दो। बलराम उन दिनों 'नवभारत टाइम्स' का रविवासरीय देखा करते थे। बलराम ने कहानी छापी, संग में फोटो और उसके साथ मेरे दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की सूचना भी। वर्ष 2006 में लिखी ''लौटना'' कहानी में भी असफल प्रेम के उसी अहसास को एक दूसरे कोण से अभिव्यक्त करने की कोशिश की गई है।&lt;br /&gt;लेखक अपने समय और समाज से कट कर कदापि नहीं रह सकता। ''वेलफेयर बाबू'' ''औरत होने का गुनाह'' ''गोष्ठी'' कहानियाँ मेरे अपने समय और समाज की कहानियाँ हैं और मैंने इन्हें लिख कर अपने सामाजिक सरोकार और लेखन के उद्देश्य को स्पष्ट करने की कोशिश की है।&lt;br /&gt;दिल्ली में मेरा परिचय रमेश बत्तरा से किसी पंजाबी कहानी के हिंदी अनुवाद को लेकर हुआ था। बेशक मैं पंजाबी परिवार में पैदा हुआ, पर हमारे घर पर पंजाबी नहीं बोली जाती। उत्तर प्रदेश के स्कूलों में जब संस्कृत के स्थान पर उर्दू, बांग्ला और पंजाबी में से कोई एक भाषा पढ़ाने का फार्मूला लागू हुआ, तब मैंने पंजाबी भाषा सीखना इसलिए स्वीकार किया ताकि मैं अपनी माँ-बोली से जुड़ा रह सकूँ। तीन वर्ष की उस स्कूली पढ़ाई ने मुझे बाद में बहुत लाभ पहुँचाया। मुराद नगर में तो न पंजाबी के अख़बार मिलते थे, न ही किताबें। मेरी यह हसरत दिल्ली में आकर पूरी हुई। हिंदी साहित्य की पुस्तकों के साथ-साथ मैंने पंजाबी साहित्य की पुस्तकें भी पढ़नी प्रारंभ कर दी थीं। मैंने पंजाबी की एक कहानी का हिंदी में अनुवाद किया था और इसी सिलसिले में मेरी मुलाकात दरियागंज स्थित “सारिका” के कार्यालय में रमेश बत्तरा से हुई थी। वह जितना गंभीर और अच्छा लेखक था उतना ही प्यारा दोस्त भी था। हम एक दूसरे के घर भी आते-जाते थे। साहित्य को लेकर बातें हुआ करती थीं। मुझे यहाँ यह स्वीकार कर लेने में कोई हिचक नहीं है कि अगर रमेश बत्तरा से मेरी दोस्ती न हुई होती तो मैं लघुकथा लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में कतई न आया होता। पंजाबी से हिंदी में अनुवाद और लघुकथा लिखने की शुरूआत रमेश बत्तरा ने ही करवाई। वह स्वयं हिंदी का एक प्रतिभा संपन्न कथाकार, लघुकथाकार और अनुवादक था। उसने मुझसे ‘सारिका’ के लिए पंजाबी कहानियों का अनुवाद करवाया। पंजाबी का अच्छा साहित्य पढ़ने के लिए किताबें उपलब्ध करवाईं। मैं कोई नई कहानी लिखता तो उसे लेकर शनिवार के दिन “सारिका” के ऑफिस पहुँच जाता। घंटों रमेश के पास बैठा रहता, पर कहानी देने की मैं हिम्मत न जुटा पाता। चलने लगता तो वह मेरे संग ऑफिस से बाहर तक आता। उसे पान खाने की आदत थी। बाहर आकर पहले वह चाय पिलवाता और फिर अपने लिए पान बनवाता। विदा होते समय मैं बड़े संकोच से उसे अपनी कहानी थमाता तो वह मुसकारते हुए कहता- “अरे वाह ! बधाई! पर तू इतनी देर से मेरे संग है, पहले क्यों नहीं दी?”&lt;br /&gt;कहानी पढ़कर वह अपनी निष्पक्ष राय देता। उसकी कमियों की ओर ध्यान खींचता और निराश न होने को कहता। एक दिन बोला- “सुभाष, तुम लघुकथाएं पढ़ते हो ? कैसी लगती हैं तुम्हें ?”&lt;br /&gt;मैंने कहा- “पढ़ता हूँ । अच्छी लगती हैं। पर अधिकांश मुझे निराश करती हैं।”&lt;br /&gt;“कहानियाँ भी तो सभी अच्छी नहीं होतीं। सौ में से नब्बे निराश करती हैं।”&lt;br /&gt;“कोई लघुकथा लिखी है ?”&lt;br /&gt;“अभी तक तो नहीं लिखी।”&lt;br /&gt;“तो कोशिश कर। दो-एक लिख पाओ तो मुझे देना।”&lt;br /&gt;मैंने उसके कहने पर दो लघु कथाएं लिखीं और बड़े संकोच से उसे दीं। उसके मुँह में उस समय पान था। उसने थूका और फिर मुसकरा कर कहा- “यह हुई न बात ! यार तू तो बढ़िया लघुकथा लिख लेता है।” उन दिनों “सारिका” का लघुकथा विशेषांक निकलने वाला था। मेरी पहली लघुकथा “कमरा” उसने विशेषांक में प्रकाशित की। अब तक न जाने कितनी बार इस लघुकथा का पुनर्प्रकाशन हो चुका है और कई भाषाओं में अनूदित हो चुकी है। उन दिनों हिंदी का हर लेखक “धर्मयुग” में छपने की लालसा रखता था। कहा जाता था कि अगर किसी नये लेखक की उसमें कहानी छप जाती थी तो वह रातोंरात कथाकार बन जाता था। “सारिका” में मेरी लघुकथाएं छपने के बाद जब एक दिन मुझे ‘धर्मयुग’ से पत्र मिला जिसमें मुझसे लघुकथाएं प्रकाशनार्थ मांगी गई थीं, तो मैं खुशी में जैसे झूम-सा उठा। मैंने लघुकथाएं भेजीं और वे ‘धर्मयुग’ में छपीं। रमेश बत्तरा ने मुझे बधाई दी और कहा – “सुभाष, अब तुम पक्के लघुकथा लेखक बन गए।” मेरी कई लघुकथाएं रमेश ने समय-समय पर प्रकाशित कीं। “सारिका” में दिहाड़ी” “रफ कॉपी”, नवभारत टाइम्स में “धूप” “रंग- परिवर्तन” “कबाड़”, संडे मेल में “जीना-मरना” “सफ़र में” आदि। उन दिनों लघुकथा की पत्रिकाएं जैसे “लघु आघात” “क्षितिज” ‘सनद” आदि को वही मुझे दिया करता था और उनमें लघुकथाएं भेजने को कहा करता। “बीमार” लघुकथा का शीर्षक रमेश ने ही सुझाया था। मैंने यह लघुकथा “मासूम सवाल” शीर्षक से उसके गाजियाबाद निवास पर उसकी पत्नी जया रमेश के सम्मुख सुनाई तो उसने कहा- “इतनी अच्छी लघुकथा को गलत शीर्षक देकर क्यों उसका सत्यानाश कर रहा है ? इस लघुकथा में पत्नी बीमार है, बच्ची एक फल खाने की हसरत में बीमार होना चाहती है, यह लघुकथा यहीं तक नहीं है। यह उस बीमार व्यवस्था की ओर भी संकेत करती है जिसके चलते हम अपने बच्चों को फल तक खिला पाने की हैसियत नहीं रखते।”&lt;br /&gt;रमेश बत्तरा लेखन में मेरे लिए पथ-प्रदर्शक की तरह रहा। अच्छी रचनाओं पर वह पीठ भी ठोंकता था और अपने मित्रों-यारों में उसका जिक्र भी करता था। लेकिन खराब रचना को खराब कहने में उसने दो सेकेंड नहीं लगाए। ऐसे मित्र का अभाव आज भी खलता है। दिल्ली में आज मेरे कई साहित्यिक मित्र हैं जिनसे साहित्य को लेकर तथा अन्य सामाजिक मुद्दों को लेकर अक्सर बहस होती रहती है। हम प्राय: अपनी रचनायें एक-दूसरे को सुनाते हैं। उन पर चर्चा करते हैं। इनमें रूपसिंह चन्देल, सुरेश यादव, राजेन्द्र गौतम, बलबीर माधोपुरी(पंजाबी कवि), बलविंदर सिंह बराड़(पंजाबी कथाकार), बलराम अग्रवाल, अलका सिन्हा और रामेश्वर काम्बोज ‘हिंमाशु’ आदि प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;मेरे तीन कहानी संग्रह –“दैत्य तथा अन्य कहानियाँ(1990)” “औरत होने का गुनाह(2003)” तथा “आख़िरी पड़ाव का दु:ख(2007)”, दो कविता संग्रह “यत्किंचित (1979)”, “रोशनी की लकीर(2003)”, एक बाल कहानी संग्रह-“मेहनत की रोटी”, एक लघुकथा संकलन –“कथाबिंदु” (सहयोगी कथाकार हीरा लाल नागर व रूपसिंह चन्देल) प्रकाशित हो चुके हैं। एक एकल लघुकथा संग्रह –“वाह मिट्टी” प्रकाशनाधीन है। इसके अतिरिक्त पंज़ाबी की लगभग डेढ़ दर्जन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद प्रकाशित हुआ है जिनमें “काला दौर”, “कथा पंजाब-2”, “कुलवंत सिंह विर्क की चुनिंदा कहानियाँ”, “तुम नहीं समझ सकते(जिंदर का कहानी संग्रह) और बलबीर माधोपुरी की आत्मकथा –“छांग्या-रुक्ख” प्रमुख हैं। नेट पर “सेतु साहित्य”, “वाटिका”, “साहित्य सृजन”, “गवाक्ष” और “सृजन यात्रा” मेरी ब्लॉग पत्रिकाएं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे हमेशा लगता रहा कि लेखन ही एक ऐसा माध्यम है जो मेरी निजता को सामाजिकता में बदल सकता है। जिनके लिए मैं कुछ नहीं कर पाया, मैं उनकी दुख-तकलीफों को अपने लेखन में रेखांकित कर सकता हूँ और उनके लिए 'कुछ न कर पाने' की अपनी पीड़ा को मैं लिखकर कम कर सकता हूँ।&lt;br /&gt;इसमें दो राय नहीं कि मेरे अब तक के लेखन के पीछे मेरे माता-पिता के संघर्ष और अभावों भरे दिन रहे हैं, मेरे अपने संघर्ष रहे हैं। लेकिन साथ ही साथ समय ने मुझे अपने समाज और परिवेश के प्रति भी जागरूक बनाया है। उस समाज में रह रहे हर गरीब, दुखी, असहाय, पीड़ित, दलित, शोषित व्यक्ति के प्रति संवेदनात्मक रिश्ता कायम किया है। अपनी कहानियों, लघुकथाओं में मैंने सदैव कोशिश की कि इन लोगों के यथार्थ को ईमानदारी से स्पर्श कर सकूं और तहों के नीचे छिपे 'सत्य' को उदघाटित कर सकूं। मुझे नहीं मालूम कि मैं इसमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, पर मुझे अपने लिखे पर संतोष है। मुझे यह मुगालता कभी नहीं रहा कि मेरे लेखन से समाज में कोई परिवर्तन हो सकता है। कहानी, लघुकथा और कविता लिखते समय मैं अपने समय और समाज के प्रति जागरुक और ईमानदार रहूँ, ऐसी मेरी कोशिश और मंशा रहती है। आलोचक समीक्षक मेरी रचनाओं को लेकर क्या कहते हैं या क्या कहेंगे, इसकी तरफ़ मैं अधिक ध्यान नहीं देता। लिखना मेरा एक सामाजिक कार्य है और मैं इसे अपनी तरफ से आज 55 वर्ष की आयु में भी पूरी ईमानदारी से करते रहना चाहता हूँ। यदि मेरी कोई रचना किसी की संवेदना को जगा पाती है अथवा उसे हल्का-सा भी स्पर्श करती है तो यह भी कोई कम उपलब्धि नहीं है मेरे लिए।&lt;br /&gt;00&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5533417691893131830?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5533417691893131830/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5533417691893131830&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5533417691893131830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5533417691893131830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/05/blog-post_30.html' title='मैं और मेरा जीवन (आत्मकथ्य)'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SiFqpUnO-PI/AAAAAAAAAH4/_MQ_5HhDdxU/s72-c/makadzal4.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-5650478705730164067</id><published>2009-05-15T20:23:00.000-07:00</published><updated>2009-05-15T20:28:45.719-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानियाँ'/><title type='text'>कहानी-17</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sg4yOpBOjvI/AAAAAAAAAHY/zzn8Gtgceno/s1600-h/untitled1.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5336257835591175922" style="WIDTH: 100px; CURSOR: hand; HEIGHT: 100px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sg4yOpBOjvI/AAAAAAAAAHY/zzn8Gtgceno/s200/untitled1.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;चोट&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सफदरजंग एअरपोर्ट के बस-स्टॉप से कुछ हटकर मोटरसाइकिल के समीप खड़े लड़के ने लड़की को अपने निकट आते देख कहा, “आज कितनी देर कर दी तुमने।”&lt;br /&gt;            “हाँ, थोड़ी देर हो गई। सॉरी। बस ही देर से मिली।”&lt;br /&gt;            “थोड़ी देर ?... पूरे एक घंटे से खड़ा हूँ।” लड़का गुस्से में था, “घर से ही देर से निकली होगी। किदवई नगर से एअरपोर्ट के लिए हर एक सेकेंड पर बस है।” हेल्मिट पहन मोटरसाइकिल स्टार्ट कर लड़का बोला।&lt;br /&gt;            लड़की ने एक बार इधर-उधर देखा और फिर उचक कर लड़के के पीछे बैठ गई।&lt;br /&gt;            “कहाँ चलना है ?” मोटरसाइकिल के आगे सरकते ही लड़के ने पूछा।&lt;br /&gt;            “कहीं भी, पर यहाँ से निकलो।” लड़की ने दायाँ हाथ लड़के के कंधे पर रख आगे सरकते हुए कहा।&lt;br /&gt;            “प्रगति मैदान या पुराना किला चलें ?”&lt;br /&gt;            “कहीं भी, जहाँ तुम चाहो।”&lt;br /&gt;            हवा से बचने के लिए लड़की ने हाथ लड़के के विनचेस्टर की जेबों में ठूँस लिए थे और अपनी छाती को लड़के की पीठ से चिपका लिया था। लड़की का ऐसा करना लड़के को अच्छा लगा। उसका गुस्सा जाता रहा।&lt;br /&gt;            “सुनो...” लड़की ने लड़के के दायें कान की ओर मुँह करके कहा, “हम लोग एअरपोर्ट वाले बस-स्टॉप पर नहीं मिला करेंगे।”&lt;br /&gt;            “क्यों ?”&lt;br /&gt;            “इस बस-स्टॉप से ऑफिस के कई लोग बस चेंज करते हैं।”&lt;br /&gt;            सामने रेड-लाइट आ गई थी। रुकना पड़ा। लड़के ने मुँह घुमाकर लड़की की ओर देखा। उसकी आँखों में चमक और होंठों पर मुस्कराहट थी। उसने पूछा, “फिर कहाँ मिला करूँ ?”&lt;br /&gt;            “ऊँ...” लड़की ने होंठों को गोल करते हुए कुछ देर सोचा और बोली, “मदरसे के बस-स्टॉप... पर तुम स्टॉप से कुछ दूर हटकर खड़े हुआ करो।”&lt;br /&gt;            हरी बत्ती होते ही लड़के ने बाइक गियर में लेकर एक्सीलेटर दबाया और वाहनों के बीच से लहराते हुए बाइक को निकालने लगा।&lt;br /&gt;            “क्या करते हो ?... ठीक से चलाओ।”&lt;br /&gt;            लड़का मस्ती में था। उसने बाइक और तेज कर दी। इस पर लड़की ने उसकी पीठ में चुकोटी काटी और बोली, “बहुत मस्ती आ रही है ?... हैं !”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुराने किले के बाहर पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर वे दोनों झील के साथ वाले पॉर्क की ओर बढ़ गए।&lt;br /&gt;            झील का पानी सर्दियों की सुनहरी खिली धूप में चमक रहा था और उसमें बोटिंग करते लोगों से झील जैसे जीवंत हो उठी थी। वे झील के किनारे ढलान पर एक झाड़ी की ओट में बैठ गए। उनके बैठते ही बत्तखों का एक झुण्ड जाने किधर से आया और उनके इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगा। लड़की लड़के को भूलकर बत्तखों से खेलने लगी। अब लड़की अपने आसपास की घास तोड़कर बत्तखों पर फेंक रही थी और हाथ बढ़ाकर उन्हें अपने पास बुला रही थी। जब कोई बत्तख उसके बहुत निकट आ जाती, वह डर कर उठ खड़ी होती। लड़की का जब यह खेल लम्बा खिंचने लगा तो लड़का उखड़ गया।&lt;br /&gt;            “छोड़ो भी अब...।”&lt;br /&gt;            लड़की लड़के की रुखाई देख हँस दी और तोड़ी हुई घास की बरखा लड़के पर करने लगी। लड़का फिर झुंझलाया, “क्या करती हो ?” और अपने कपड़े झाड़ने लगा। लड़की उसके समीप बैठते हुए बोली, “गुस्से में तुम अधिक सुंदर लगते हो।”&lt;br /&gt;            लड़के ने लड़की की बाईं हथेली पर अपनी दाईं हथेली रख दी। लड़की ने इधर-उधर देखा और लड़के की फैली हुई टांगों को सिरहाना बनाकर अधलेटी हो गई। अब लड़का रोमांचित हो रहा था। उसने घास के तिनके तोड़े और उन्हें लड़की के कान, नाक, गाल और गले पर फिराने लगा। लड़की को गुदगुदी होती तो वह हँसती हुई दोहरी हो जाती।&lt;br /&gt;            ढलान के ऊपर पटरी पर लोग आ-जा रहे थे। आरंभ में आते-जाते लोगों से लड़का-लड़की घबरा उठते थे और प्यार-भरी हरकतें करना बन्द कर देते थे। अब ऐसा नहीं करते। बस, लड़की चौकन्ना रहती है। कहीं आते-जाते लोगों में कोई परिचित चेहरा न निकल आए।&lt;br /&gt;            “चलो, किले के अंदर चलते हैं। बहुत दिन हो गए उधर गए।” लड़के ने एकाएक कहा। लड़की समझ गई, लड़के का आशय। एकांत वह भी चाहती थी। वह तुरन्त खड़ी हो गई।&lt;br /&gt;            किले के अंदर अपनी पुरानी जगह पर वे बैठ गए- एक टूटी दीवार से पीठ टिका कर। उनकी आँखों के ठीक सामने एक लम्बा लॉन था जिसकी मखमल-सी घास धूप में चमक रही थी। एक मालगाड़ी धीमी गति से निजामुद्दीन की ओर से आ रही थी, तिलक ब्रिज की ओर। लड़की ने कुछ देर गाड़ी के डिब्बे गिनने की कोशिश की, किन्तु ना-कामयाब रही।&lt;br /&gt;            “तुमने बताया नहीं, आज तुम देर से क्यों आई ?” लड़के ने लड़की की गोद में सिर छिपाते हुए पूछा। लड़की ने झुक कर लड़के का माथा चूमा और बोली, “बस, यूँ ही देर हो गई। दरअसल...।”&lt;br /&gt;            “दरअसल क्या ?”&lt;br /&gt;            “डिस्पेंसरी गई थी।”&lt;br /&gt;            “डिस्पेंसरी ?...” लड़का चौंका, “क्यों ?  कौन बीमार है ? घर पर सब ठीक तो है ?” लड़के ने एक साथ कई सवाल कर डाले।&lt;br /&gt;            “सब ठीक है।”&lt;br /&gt;            “फिर, डिस्पेंसरी क्यों गई थीं ?”&lt;br /&gt;            “अपनी दवा लेने।”&lt;br /&gt;            “क्यों, क्या हुआ तुम्हें ?”&lt;br /&gt;            “कुछ नहीं।”&lt;br /&gt;            “यह ‘कुछ नहीं’ कौन-सा रोग है ?” लड़के ने लड़की का दायां हाथ अपने सीने पर रख लिया।&lt;br /&gt;            “है...तुम्हें नहीं मालूम ?” लड़की ने शरारत में उसकी नाक को पकड़ कर खींचा।&lt;br /&gt;            “ठीक-ठीक बताओ। मुझे तो चिंता हो रही है।”&lt;br /&gt;            “अच्छा !” लड़की आश्चर्य में मुस्कराई।&lt;br /&gt;            “बताओ न, क्या हुआ है तुम्हें ?”&lt;br /&gt;            “कहा न, कुछ नहीं। वो मेरा बॉस है न, कह रहा था कि तुम आए दिन गोल हो जाती हो। कल ऑफिस जाऊँगी तो पूछेगा- क्यों, क्या हुआ मैडम ?... उसे डिस्पेंसरी की स्लिप दिखाऊँगी और कहूँगी- तबीयत खराब थी इसलिए नहीं आई। और एप्लीकेशन दे दूँगी।” पर्स खोल कर उसने पर्ची दिखाई और दवा भी, “डिस्पेंसरी में क्या है, कुछ भी जाकर कह दो, चक्कर आ रहे हैं... पेट में दर्द है या फिर रात में बुखार हो गया था, बस।”&lt;br /&gt;            लड़का लड़की की चालाकी पर मुस्कराया और उठ कर बैठ गया। “तो तुम बीमार हो...” कहते हुए उसने लड़की के होंठ चूम लिए। लड़की का चेहरा रक्तिम हो उठा।&lt;br /&gt;            सहसा, कहकहों और हँसी के फव्वारों ने उन दोनों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींचा। कुछ युवा जोड़े बाई ओर की इमारत की दीवारों पर अपना नाम गोद रहे थे। ‘आई लव यू’, ‘माई स्वीट हार्ट’, ‘लव इज़ गॉड’ जाने कितनी ही ऐसी उक्तियों से यहाँ की हर दीवार भरी पड़ी थी। लड़का-लड़की अपने अतीत में खो गए। उन्हें अपने वे प्रारंभिक दिन याद हो आए जब वे भी ऐसे ही, इमारतों की दीवारों पर, दरख़्तों के तनों पर अपने नाम गोदा करते थे।&lt;br /&gt;            लड़की को याद आया, लोदी गार्डन में यूकलिप्टस के तने पर लड़के ने उसके लिए एक कविता ही गोद डाली थी, उसका हेयर-पिन लेकर। वह कविता उसने लड़के की डायरी में भी देखी। डायरी का वह पन्ना ही उसने ले लिया था और कई दिनों तक उन पंक्तियों को एकांत में पढ़-पढ़कर अभिभूत होती रही थी।&lt;br /&gt;            लड़की ने कविता की पंक्तियाँ याद करने की कोशिश की। फिर सोचा, लड़के को अभी भी याद होंगी। उसका मन हुआ, वह लड़के को आज फिर से वे पंक्तियाँ दोहराने को कहे। उसने लड़के को प्यार भरी नज़रों से देखा। लड़का न जाने किन हसीन ख़यालों में खोया था, आँखें मूंदे, उसकी उँगलियों से खेलता हुआ। एकाएक लड़की को एक पंक्ति याद हो आई और धीरे-धीरे अन्य पंक्तियाँ भी। वह अंदर-ही-अंदर बुदबुदाने लगी- “कैसे बताऊँ, क्या है, मेरे लिए तुम्हारा नाम... मायूसियों के गहन अँधेरों में जैसे उम्मीद की कोई किरण... हाँ, वैसे तुम्हारा नाम।”  आगे की पंक्तियाँ ज़ेहन में गड्ड-मड्ड होने लगीं। थोड़ा जोर देने पर बीच की कुछ पंक्तियाँ पकड़ में आईं - “मेरा दिल, समुद्र-तट की रेत तो नहीं, कि जिस पर गोदा गया नाम, पानी की लहरें आएँ और मिटा कर चली जाएँ...।” इससे आगे की पंक्तियाँ स्मृति की पकड़ से बाहर थीं।&lt;br /&gt;            अब लड़का अधमुंदी आँखों से उसे निहार रहा था। चेहरे पर पड़ती सीधी धूप से लड़के का चेहरा लाल हो उठा था। लड़की का मन किया कि वह इस चेहरे पर प्यार की बरसात कर दे। तभी, कुछ सैलानी जिनमें कुछ विदेशी भी थे, गले में कैमरे लटकाए उधर से गुजरे तो लड़की ने अपने विचार को स्थगित कर दिया। उनके आगे बढ़ जाने पर लड़की ने अपना हेयर-क्लिप खोला और लड़के पर झुक गई। लड़की के रेशमी घने बालों में लड़के का चेहरा छिप गया था। तत्काल लड़की ने अपने स्थगित विचार को अंजाम दिया। लड़के को शायद इसकी उम्मीद नहीं थी। वह जैसे सुख के सरोवर में नहा रहा था।&lt;br /&gt;            पॉपकोर्न वाले की आवाज़ से लड़का-लड़की उठ बैठे। सामने एक बूढ़ा पॉपकोर्न के पैकेट्स हाथ में लिए उन्हीं की ओर हसरतभरी नज़रों से देख रहा था। लड़के ने इशारे से उसे पास बुलाया और दो पैकेट्स लिए। बूढ़ा खुश हो गया।&lt;br /&gt;            पॉपकोर्न खाते हुए वे वहाँ से उठे। दाईं ओर कुछ दूरी पर दीवार के पीछे चिडि़याघर था। वे उस ओर चल दिए। एकाएक, लड़के को जाने क्या सूझी, वह तेजी से दौड़ा और एक छोटी-सी दीवार पर चढ़ गया। लड़की ने भी उसी तरह चढ़ने की कोशिश की किन्तु सफल न हो सकी। लड़के ने लड़की का हाथ पकड़कर उसे ऊपर खींचा। हल्की-सी कोशिश में लड़की दीवार पर चढ़ने में सफल हो गई। इससे आगे एक बड़ी और ऊँची दीवार थी जिसके पीछे चिडि़याघर था। यहाँ कोई नहीं था। जहाँ वे खड़े थे, वहाँ बिलकुल एकांत था। लड़के को शरारत सूझी और लड़की को अपनी बांहों के घेरे में लेने को लपका। लड़की ऐसी जगहों पर सतर्क रहती है। वह बड़ी होशियारी से छिटक कर आगे बढ़ गई। लड़के ने गुस्से में मुँह बनाया और वहीं खड़ा रहा।&lt;br /&gt;            दीवार की खिड़की से लड़की ने चिडि़याघर की ओर झाँका।&lt;br /&gt;            एकाएक लड़की बच्चों की तरह चिहुँक उठी और खुशी में उछलती हुई-सी बोली, “इधर आओ... इधर आओ... वो देखो !”&lt;br /&gt;            लड़की के चेहरे पर अपार खुशी और उसके चहकने के ढंग को देखकर लड़का दंग था। लड़की बार-बार उचक-उचक कर खिड़की के बाहर देखती और हाथ से ठीक खिड़की के नीचे की ओर संकेत करती।&lt;br /&gt;            लड़के ने आगे बढ़कर नीचे झाँका। वहाँ कोई नव-विवाहित जोड़ा चिडि़याघर के लॉन में दीवार के पास टहल रहा था, हाथों में हाथ थामे। लड़की लाल गोटेवाली साड़ी पहने थी। उसकी गोरी-गोरी कलाइयों में गुलाबी और सफेद रंग का चूड़ा चमक रहा था। हथेलियों पर खूबसूरत मेंहदी रचाये लड़की बहुत सुंदर लग रही थी।&lt;br /&gt;            “देखो, इन्होंने शादी कर ली।” लड़की ने चहकते हुए कहा, “आखिर उसने प्रेमिका को पत्नी बना ही लिया।”&lt;br /&gt;            इस जोड़े को लड़का-लड़की पिछले दो सालों से देखते आ रहे थे- कभी कुतुब पर, कभी इंडिया गेट पर, कभी लोदी गार्डन, कभी मदरसा, कभी प्रगति मैदान, कभी तालकटोरा तो कभी यहीं पुराने किले में।&lt;br /&gt;            “शादी के बाद ये लोग कितने अच्छे लग रहे हैं...” लड़की ने बेहद उमंग में भरकर कहा। क्षणांश, वह भी खूबसूरत सपनों में खो गई। उसे लगा, विवाह के बाद वह भी घूम रही है, लाल जोड़ा पहने, कलाइयों में चूड़ा पहने, हाथों में मेंहदी रचाये... एकाएक, लड़की ने अपनी कलाइयों को हवा में लहराया, ऐसे जैसे वह पहने हुए चूड़े की खनक सुनना चाहती हो।&lt;br /&gt;            “बस, अब कुछ ही दिनों में इनका प्यार चुक जाएगा। शादी के बाद प्यार अधिक दिन नहीं रहता। देख लेना, छह-सात महीने या अधिक से अधिक सालभर बाद ये लोग इन जगहों पर यूँ हाथ में हाथ लिए घूमते हुए नहीं मिलेंगे।” लड़का बोल रहा था, लड़की की ओर देखे बिना।&lt;br /&gt;            “क्या कहते हो ?...” लड़की लड़के से सटकर खड़ी हो गई और उसके कंधे पर अपना सिर रखकर बोली, “प्रेमिका को उसने वाइफ बनाया है, अपनी जीवन-संगनि... अब तो और भी करीब हो जाएंगे। सुख-दुःख इकट्ठा फेस करेंगे। वाइफ बनकर यह लड़की प्रेम को लड़के की लाइफ में और प्रगाढ़, और सच्चा, और ऊष्मावान बना देगी।” लड़की की उमंग और उत्साह, दोनों देखने योग्य थे। उसकी आँखों में एक सपना झिलमिला रहा था। एक हसीन और खूबसूरत सपना...&lt;br /&gt;            “नहीं, तुम्हारा ऐसा सोचना गलत है। प्रेमिका जब पत्नी बनती है तो प्यार के सारे समीकरण ही बदल जाते हैं। शादी शब्द एक चाकू की तरह है जो गहराते प्यार को, उसके अहसास को छीलने लगता है और धीमे-धीमे यह प्यार, यह निकटता, यह सुखानुभूति लहूलुहान होकर दम तोड़ देती है। प्रेमी-प्रेमिका का विवाह उनके बीच प्रेम की बहती नदी को सूखने के लिए मज़बूर कर डालता है, ऐसा मेरा मानना है।”&lt;br /&gt;लड़का न जाने कैसी भाषा बोल रहा था। लड़की हतप्रभ थी। लड़के के कंधे पर से उसका सिर खुद-ब-खुद हट गया था। लड़की को लगा जैसे अकस्मात् उसके भीतर कुछ दरक गया है- बेआवाज़ ! उमंगित, उत्साहित, चहकता-खिलखिलाता उसका चेहरा एकाएक निस्तेज हो उठा। लड़की को वहाँ अधिक देर खड़ा होना तकलीफ़देह महसूस होने लगा। वह पीछे मुड़कर लौटने लगी। दीवार से कूदने की कोशिश में वह गिर पड़ी और बायां घुटना पकड़कर वहीं ज़मीन पर बैठ गई। दर्द से उसकी आँखें छलछला आई थीं और निचले होंठ को उसने दांतों तले दबा रखा था।&lt;br /&gt;            लड़का फुर्ती से आगे बढ़कर उसके पास बैठ गया और उसका घुटना सहलाने लगा। फिर उसने अपने कंधों का सहारा देकर लड़की को ऊपर उठाया और चलने के लिए कहा। लड़की कुछ देर उसका सहारा लेकर लंगड़ाती हुई-सी चली, फिर सहारा छोड़ अपने आप चलने लगी, गुमसुम-सी।&lt;br /&gt;            लड़की को लगा, जैसे अंदर बेहद कुछ टूट गया है। वह सोचने लगी- क्या वह बहुत ऊँचा उड़ रही थी कि उसे ज़मीन दिखाना ज़रूरी था ? लड़की सोच रही थी- लड़के ने उसके घुटने की चोट तो देखी, पर क्या वह उस चोट को भी देख पाया है जो अभी-अभी उसके भीतर लगी है ?&lt;br /&gt;            दोपहर अपनी ढलान पर थी और पेड़ों, दीवारों के साये लम्बे होते जा रहे थे। पुराने किले से बाहर निकलते समय लड़की बेहद चुप थी। लड़के ने एक-दो बार रास्ते में उसे छेड़ने की कोशिश की लेकिन लड़की ने कोई उत्साह नहीं दिखाया। वह जल्द-से-जल्द अब घर लौट जाना चाहती थी।&lt;br /&gt;            मोटरसाइकिल पर बैठते हुए लड़के ने कहा, “तुम्हें चोट लगी है, चलो तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ देता हूँ।”&lt;br /&gt;            “नहीं, मदरसा छोड़ दो। वहाँ से बस में ही जाऊँगी।” लड़की का स्वर कुछ इस प्रकार का था कि लड़का आगे कुछ न बोल सका और लड़की के बैठते ही मोटरसाइकिल उसने आगे बढ़ा दी।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;( &lt;span style="color:#000066;"&gt;मेधा बुक्स, दिल्ली से वर्ष 2003 में प्रकाशित कहानी संग्रह ''औरत होने का गुनाह'' में संग्रहित। यह कहानी प्रथम बार नवभारत टाइम्स के “रविवार्ता” में वर्ष 1992 प्रकाशित हुई थी और इसके बाद अन्य कई पत्रिकाओं में इसका पुनर्प्रकाशन हुआ और अन्य भाषाओं में अनूदित भी हुई। इस वर्ष फरवरी माह में यह कहानी वेब पत्रिका “अभिव्यक्ति” पर भी प्रकाशित हुई है।&lt;/span&gt;)&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-5650478705730164067?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/5650478705730164067/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=5650478705730164067&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5650478705730164067'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/5650478705730164067'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/05/17.html' title='कहानी-17'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/Sg4yOpBOjvI/AAAAAAAAAHY/zzn8Gtgceno/s72-c/untitled1.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-130483472831100301</id><published>2009-04-07T01:54:00.000-07:00</published><updated>2009-04-07T02:28:28.959-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानियाँ'/><title type='text'>कहानी-16</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SdsaGTYW2YI/AAAAAAAAAGg/idz0Zl0K9fo/s1600-h/Avdesh+Mishra+4.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5321876080252344706" style="WIDTH: 110px; CURSOR: hand; HEIGHT: 110px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SdsaGTYW2YI/AAAAAAAAAGg/idz0Zl0K9fo/s200/Avdesh+Mishra+4.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;सूराख़&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;चित्र : अवधेश मिश्र&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''तुम भी मिस्टर जोशी...''&lt;br /&gt;मि. जोशी की सलाह सुन कर मंत्री महोदय ने बुरा-सा मुँह बनाया। मुखमुद्रा से लगा कि उन्हें मि. जोशी की सलाह बेहद कड़वी लगी है।&lt;br /&gt;मि. जोशी आगे कुछ न बोल सके और शांत-से खड़े रहे, जस का तस।&lt;br /&gt;मंत्री महोदय भीतर तक अस्थिर हो गए थे और अपनी इस अस्थिरता को कम करने के लिए वह कमरे में इधर-उधर टहलने लग पड़े। टहलते हुए वह सोच रहे थे कि अब उनके हितैषी भी वही भाषा बोलने लगे हैं जो आजकल उनके विरोधी बोल रहे हैं। मि. जोशी को अपना सच्चा हितैषी मानते थे वह। एक बेहद अंतरंग मित्र, एक अच्छा सलाहकार... सदैव उनके हित की सोचने वाला। और वह भी...।&lt;br /&gt;मि. जोशी एक सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी थे और सेवामुक्त होने के बाद से वही उनका अधिकांश काम देख रहे थे- बिना किसी पद पर रहकर। सरकारी, गैर-सरकारी, देशी-विदेशी मामलों में वह मि. जोशी की महत्त्वपूर्ण सलाह लेते रहे हैं। इसके अतिरिक्त भी मि. जोशी बहुत से काम करते रहे हैं उनके- घरेलू काम से लेकर बहुत ही सीक्रेट किस्म के काम। मि. जोशी पर मंत्री महोदय के कई अहसान थे। असम से केन्द्र में वही लाए थे उन्हें। मि. जोशी का बेटा और बेटी अमेरिका में उन्हीं की बदौलत आज उच्च पदों पर कार्यरत है। मिसेज जोशी एक अंतर्राष्ट्रीय महिला संगठन की दिल्ली शाखा का कार्य देख रही हैं।&lt;br /&gt;मि. जोशी ने उन्हें कुछ स्थिर और शांत पाकर कहा, ''सर, आप यह सोचना छोड़ें और थोड़ा आराम कर लें। इतना तनाव सेहत के लिए ठीक नहीं है। इस विषय पर फिर विचार किया जा सकता है।''&lt;br /&gt;उन्हें मि. जोशी की यह सलाह अच्छी लगी। निश्चय ही उन्हें कुछ देर यह सोचना-विचारना छोड़ कर आराम करना चाहिए। उन्होंने जोशी को जाने के लिए कहा और स्वयं सोफे पर अधलेटे होकर आँखें मूँद सोने का उपक्रम करने लगे। पर ऐसे में क्या उन्हें नींद आ सकती है ? जब पाँव तले आग के अँगारे बिछे हों तो कोई आराम से कैसे सो सकता है ?&lt;br /&gt;पिछले बीसेक बरस के उनके राजनीतिक जीवन में ऐसे संकट कई बार आए थे। वे कई बार विचलित हुए हैं। किंतु कभी ऐसे संकटों में उन्होंने धैर्य और साहस नहीं छोड़ा।&lt;br /&gt;यह उनका पाँचवा मंत्री पद था। इस बार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप तब से लगने प्रारंभ हो गए थे जब मंत्री बने उन्हें चार-पाँच माह ही हुए थे। गत दो वर्षों में ये आरोप और तीखे हो गए थे और उनकी रातों की नींद उड़ाने लगे थे। उनके घोटालों को जग-जाहिर करने में प्रेस ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन, सिवाय तिलमिलाने और भीतर-ही-भीतर संपादकों-पत्रकारों को कोसने के वह कुछ नहीं कर पाए थे। ऐसा भी नहीं कि वे हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहे। अपने तईं तो उन्होंने इनका मुँह बन्द करने और सबक सिखाने के बेहद प्रयत्न किए किंतु अपने इरादों में वह सफल न हो सके।&lt;br /&gt;गत वर्ष के मानसून सत्र में जब सदन में विरोधी दलों ने उनको लेकर खूब हो-हल्ला मचाया और सदन की कार्रवाई कई दिनों तक नहीं चलने दी, तब विवश होकर उन्होंने घोषणा की कि यदि वे भ्रष्ट हैं तो सरकार एक जाँच कमेटी नियुक्त करके इसकी जाँच करवा सकती है।&lt;br /&gt;बस, यहीं वह गलती कर बैठे।&lt;br /&gt;विरोधी दलों के हमले से बचने के लिए सरकार ने एक जाँच कमेटी बिठा दी थी। उन्होंने सोचा था, जब तक जाँच कमेटी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी, तब तक अगले चुनाव आ जाएँगे। और, इन जाँच कमेटियों को भी वे भली-भाँति जानते थे। कहीं भीतर से आश्वस्त भी थे कि कमेटी की रिपोर्ट अपने विरुद्ध नहीं जाने देंगे। ऐसा प्रभाव व दबाव वे परोक्ष रूप से कमेटी पर डाल भी चुके थे। किंतु कमेटी ने निर्धारित समय में ही अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी। वह दंग रहे गए थे यह जान कर कि उनके प्रभाव व दबाव का कोई असर नहीं पड़ा था। उनके विरुद्ध लगाए गए भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों को रिपोर्ट में सही बताया गया था।&lt;br /&gt;रिपोर्ट के पेश होते ही जैसे भूचाल आ गया। विरोधी दलों ने ही नहीं, उनकी अपनी पार्टी के उन सभी सदस्यों ने भी खूब हो-हल्ला मचाया जो अभी मंत्री पद पर सुशोभित नहीं हो पाए थे। मंत्री पद से उन्हें तुरंत बर्खास्त करने की आवाज़ें हर ओर से गूँजने लगी थीं। अब प्रेस और अधिक आक्रामक नज़र आ रहा था उनके मामले में।&lt;br /&gt;उन्हें इस बात से भी हैरानी हुई थी कि उन्हीं के साथी मंत्री ने जिसका नाम भी रिपोर्ट में यत्र-तत्र आया था, रिपोर्ट के पेश होने के कुछ दिन बाद ही इस्तीफा दे दिया था। इससे उन पर मंत्री पद छोड़ने का दबाव और बढ़ गया।&lt;br /&gt;लेकिन वह इतनी जल्दी हार मान लेने वालों में से नहीं थे। अपने इस पद को इस हो-हल्ले के कारण वे छोड़ दें, यह उनके अहं को स्वीकार नहीं था। उन्होंने चुप रहकर कुछ दिनों तक स्थिति का जायज़ा लिया और फिर जहाँ से, जिस तरह से हो सकता था, अपने ऊपर लगे आरोपों का दृढ़ता से खंडन किया। साथ ही साथ, वह प्रधानमंत्री के संकेत की प्रतीक्षा करते रहे। जब कई दिनों तक प्रधानमंत्री की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला तो वह निश्चिंत हो गए। वह सोचने लगे- ऐसे हो-हल्ले तो मचते ही रहते हैं... सत्ता में रहकर ऐसे संकटों से क्या घबराना ? घबराए तो गए।&lt;br /&gt;इन्हीं दिनों एक गैर-सरकारी टी.वी. समाचार एजेंसी ने अपने 'दृष्टिकोण' कार्यक्रम के लिए उनका इंटरव्यू लेना चाहा। उन्हें लगा, यह एक स्वर्णिम अवसर है उनके लिए, अपनी बात को टी.वी. जैसे माध्यम द्वारा लोगों के समक्ष रखने का। उन्हें विश्वास था, वह स्वयं को ईमानदार और पाक-साफ सिद्ध कर ही देंगे अपने शब्दजाल से। इस कला में अगर एक राजनीतिज्ञ माहिर न हो तो वह कैसा नेता ? उन्हें स्वयं पर अटूट भरोसा था। उन्होंने इंटरव्यू की अनुमति दे दी।&lt;br /&gt;इंटरव्यू से पूर्व उन्होंने अपने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को आदेश दिया कि वे इस संबंध में उन्हें ब्रीफ करें। अधिकारियों ने कल शाम ही उन्हें ब्रीफ कर दिया था। ब्रीफिंग के दौरान सभी संभावित प्रश्नों के उत्तर उन्हें बताए गए थे। मंत्रालय में उनके द्वारा किए गए महत्वपूर्ण कार्यों और उपलब्धियों की जानकारी भी दी गई।&lt;br /&gt;इस ब्रीफिंग के बाद रात देर तक वह मि. जोशी से भी इस विषय में सलाह लेते रहे। मि. जोशी ने कई नए संभावित प्रश्नों की ओर संकेत किया था जो घोटालों और भ्रष्टाचार को लेकर, जाँच कमेटी की रिपोर्ट को लेकर और उनके द्वारा अब तक इस्तीफा न दिए जाने को लेकर हो सकते थे। मि. जोशी ने यह भी सलाह दी थी कि उन्हें इंटरव्यू के दौरान बेहद शालीनता, संयम और धैर्य के साथ प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। किसी भी तीखे और कड़वे प्रश्न पर वह उत्तेजित न हों बल्कि संयम का परिचय देते हुए उसके उत्तर को घुमा दें।&lt;br /&gt;पर क्या वह मि. जोशी की सलाह पर कायम रह सके ? क्या ऐसा उनके लिए संभव था ? प्रश्नकर्ता तीर सरीखे प्रश्नों की बौछार किए जा रहा था और उनकी अब तक की राजनैतिक छवि को छिन्न-भिन्न करते हुए उन्हें एक भ्रष्ट नेता सिद्ध करने पर तुला हुआ था। उनकी दलीलें, उनका शब्दजाल सब धूल-धूसरित हो रहे थे। ऐसे में, वह उत्तेजित कैसे न होते ? क्यों न उसे अहसास दिलाते कि जितनी उसकी उम्र है, उससे कहीं अधिक का उनका पोलीटिकल कैरियर रहा है। क्यों न वह कहते अगर लोग मुझे भ्रष्ट सिद्ध करने पर तुले हुए हैं तो वे भी कहाँ पाक-साफ हैं। वे अपने अपने गिरेबाँ में पहले क्यों नहीं झाँकते ? क्यों न वह यह कह सकने को विवश होते कि अगर मैं भ्रष्ट हूँ तो माननीय पी.एम. ने मुझे अब तक बर्खास्त क्यों नहीं किया?&lt;br /&gt;उस समय वह अंदर ही अंदर बुदबुदाये थे- कल का छोकरा, मुझे मेरी नैतिक जिम्मेदारी समझाने चला है। और यहीं गड़बड़ हो गई थी। वह अपने गुस्से पर नियंत्रण न रख सके। बौखलाहट में प्रश्नकर्ता को उसकी औकात समझाने लगे। वह भूल गए कि वह एक इंटरव्यू दे रहे हैं। वह भी एक गैर-सरकारी एजेंसी को। उनके उत्तरों में खीझ और बौखलाहट थी। उनकी भाषा तीखी और नुकीली ही नहीं, बीच बीच में आपत्तिजनक भी हो गई थी।&lt;br /&gt;इंटरव्यू के बाद भी वह काफी समय तक अशांत रहे। मि. जोशी ने उनसे कहा, ''सर, जिस बात का मुझे भय था, वही हो गई। आपका यह इंटरव्यू जब टेलीकास्ट होगा तो और अधिक हड़कंप मचेगा। और यदि यह इंटरव्यू पी.एम. साहब ने...।''&lt;br /&gt;वह एकाएक चेते। यह क्या कर डाला उन्होंने ? इस ओर तो उन्होंने सोचा ही नहीं।&lt;br /&gt;''तो फिर...'' उन्होंने मि. जोशी की ओर इस प्रकार देखा जैसे वे ही इस समस्या से उन्हें उबार सकते हैं।&lt;br /&gt;''सर... आप घबराएं नहीं। सर ! मैं देखता हूँ, क्या हो सकता है...'' मि. जोशी ने अपने स्वर को धीमा रखते हुए कहा, ''मैं अभी एजेंसी को फोन करता हूँ।''&lt;br /&gt;वह चुपचाप मि. जोशी की ओर देखते रहे। मि. जोशी ने पास रखे टेलीफोन पर एजेंसी का नंबर घुमाया और मि. शेखर से बात कराने को कहा। कुछ ही क्षणों में मि. शेखर लाइन पर थे।&lt;br /&gt;''मंत्री जी ने अभी एक घंटा पूर्व आपके 'दृष्टिकोण' कार्यक्रम के लिए अपना इंटरव्यू दिया है। मंत्री जी कैसेट को अभी देखना चाहते हैं।''&lt;br /&gt;''कैसेट अभी तक हमारे कार्यालय में नहीं पहुँची है। पहुँचते ही आपके पास भिजवाता हूँ।'' उधर से मि. शेखर का उत्तर था।&lt;br /&gt;एक घंटा बीत जाने पर भी जब कैसेट नहीं पहुँची तो उन्होंने मि. जोशी की ओर प्रश्नसूचक नज़रों से देखा। मि. जोशी ने पुन: फोन लगाया। मि. शेखर का स्वर अब बदला हुआ था, ''सॉरी सर, इंटरव्यू लेने के बाद हम कैसेट तब तक किसी को नहीं देते, जब तक वह हमारे कार्यक्रम में टेलीकास्ट न हो जाए।''&lt;br /&gt;मि. जोशी उसे डपटना चाहते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह प्रेस से उलझने का अर्थ समझते थे। उन्होंने अपने स्वर को संयत करते हुए कहा, ''ऐसा करें, इंटरव्यू में से आपत्तिजनक हिस्सों को हटा दें। मंत्री जी नहीं चाहते कि...।''&lt;br /&gt;''देखें सर, इंटरव्यू में से क्या एडिट करना है, क्या नहीं, यह हमारा काम है। हमारे कार्यक्रम एक्जीक्यूटिव इस इंटरव्यू में से कुछ भी हटाना उचित नहीं समझते।''&lt;br /&gt;मि. शेखर का दो-टूक उत्तर सुनकर मि. जोशी अवाक् रह गए।&lt;br /&gt;मि. जोशी ने जब मंत्री महोदय को वस्तुस्थिति से अवगत कराया तो वह एक भद्दी गाली के साथ लगभग चीख ही उठे। मि. जोशी को स्वयं एजेंसी जाकर बात करने को कहा। मि. जोशी ऐसे कामों में पारंगत थे। वे जानते थे कि ऐसे मामलों में थोड़ा-सा लालच दिखलाकर अथवा सौदेबाजी करके सफलता प्राप्त की जा सकती है। अगर इससे भी काम न चले तो डरा-धमका कर काम बन जाता है। लेकिन, मि. जोशी का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ। वह वहाँ से निराश लौट आए।&lt;br /&gt;''किसी भी तरह इस कैसेट को प्राप्त नहीं किया जा सकता क्या ?'' जब चिंतित स्वर ने उन्होंने मि. जोशी से पूछा तो मि. जोशी बोले, ''सर, अब तक तो कई प्रिंट भी लिए जा चुके होंगे।''&lt;br /&gt;''ऐसा करो, सूचना और प्रसारण मंत्री को फोन लगाओ। मैं बात करता हूँ।''&lt;br /&gt;''जी...'' मि. जोशी ने तुरंत फोन लगाया और उन्हें थमा दिया।&lt;br /&gt;लगभग दसेक मिनट फोन पर बात हुई। फोन रखने के बाद उनका चेहरा और अधिक मुरझा गया। चिंता और घबराहट के चिह्न उनके चेहरे पर अंकित थे। मि. जोशी ने पूछा, ''क्या हुआ, सर ?''&lt;br /&gt;एक क्षण उन्होंने मि. जोशी की ओर अपलक देखा और सोफे पर पसरते हुए बोले, ''कह रहे थे- दृष्टिकोण एक गैर-सरकारी चैनल का कार्यक्रम है इसलिए रोक पाना मुश्किल है।''&lt;br /&gt;कुछ देर की चुप्पी के बाद वे बोले, ''जोशी, इंटरव्यू किसी भी तरह टेलीकास्ट होने से रोकना है।''&lt;br /&gt;''पर कैसे सर ?''&lt;br /&gt;''के.के. की सेवाएँ कब काम आएँगी। उसे बुलाओ।''&lt;br /&gt;मि. जोशी के.के. का नाम सुनते ही चौंक उठे। तो क्या मंत्री जी अब के.के. का सहारा लेंगे ? के.के. के लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं है। राजनीति में यह सब चलता है। जब सीधी उंगली से घी नहीं निकलता तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है।&lt;br /&gt;''सर, मेरी मानें तो ऐसा कुछ न करें। इससे और बदनामी होगी। कहीं आप और संकट में न फँस जाएँ। आप ठंडे दिमाग से सोचें... बेहतर यही होगा कि आप पी.एम. से मिल लें और अपना इस्तीफा दे दें, कार्यक्रम टेलीकास्ट होने से पहले। तब यह इंटरव्यू खुद-ब-खुद अप्रासंगिक हो जाएगा।''&lt;br /&gt;मि. जोशी की इसी सलाह पर वह उखड़ गए थे। उन्होंने जोशी से ऐसी उम्मीद नहीं की थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर रात तक उन्हें नींद नहीं आई। विवश होकर नींद की गोलियाँ खानी पड़ीं।&lt;br /&gt;सुबह उठे तो मन शांत था। वह कोठी के पीछे वाले लॉन में चले गए। कुछ देर हरी घास पर टहलते रहे। फिर लॉन में पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गए और सर्दियों की गुनगुनी धूप का आनंद लेने लगे। सामने टेबल पर आज के अख़बार पड़े थे। मन किया कि अख़बार उठाकर ख़बरों पर एक नज़र घुमा लें लेकिन, तभी उन्होंने अपने इस विचार को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। दरअसल, वह सुबह-सुबह अपने मुँह का स्वाद कसैला नहीं करना चाहते थे।&lt;br /&gt;तभी, बद्री ने आकर बताया कि जोशी और अयंगर साब आए हैं। अयंगर उनका निजी सचिव था। वह उठकर कोठी के दाईं ओर बने अपने छोटे-से ऑफिस में चले गए। जोशी और अयंगर उन्हें देखते ही उठ खड़े हुए तो उन्होंने उन दोनों को बैठने का संकेत किया और स्वयं रिवाल्विंग चेयर में धँस गए।&lt;br /&gt;सहसा, सामने दीवार के साथ रखे खूबसूरत एक्वेरियम पर उनकी दृष्टि पड़ी। यह एक्वेरियम एक विदेशी कंपनी ने उन्हें भेंट किया था। इसके जल में रंग-बिरंगी छोटी-छोटी मछलियाँ तैर रही थीं। एक छोटी-सी बोट भी बैटरी की मदद से इसमें गोल-गोल घूमा करती थी। आज वह पानी में डूबी पड़ी थी। डूबी हुई नाव को देखकर वह चौंक उठे और घंटी बजाकर बद्री को बुलाया।&lt;br /&gt;बद्री ने एक्वेरियम का ऊपरी ढक्कन खोला और नाव को बाहर निकालकर उसे उलट-पुलट कर देखने लगा। मि. जोशी, अयंगर और उनकी स्वयं की निगाहें उधर ही लगी हुई थीं। एकाएक बद्री बोल उठा, ''यह देखिए साहब, इसकी तली में सूराख़ हो गया है। तभी डूब गई...।''&lt;br /&gt;सहसा, वह कहीं खो-से गए। अब न उन्हें बद्री दिख रहा था, न एक्वेरियम। न मि. जोशी, न अयंगर। दिख रही थी तो बस एक नाव, एक नहीं अनेक सूराख़ों वाली नाव... नाव कि जिसके ऊपर वह सवार थे... और जिसे बहाव के विरुद्ध खेते जाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे।&lt;br /&gt;वह जैसे अर्धनिद्रा से जगे। उन्होंने देखा, बद्री नाव लेकर जा चुका था और जोशी व अयंगर उन्हीं की ओर एकटक देख रहे थे। अकस्मात्, वह मुस्करा उठे। अयंगर से बोले, ''अयंगर, पी.एम. ऑफिस फोन करके टाइम लो। हम आज ही पी.एम. साहब से मिलेंगे।''&lt;br /&gt;''जी, सर।''&lt;br /&gt;''और जोशी, तुम मेरा इस्तीफा तैयार करो, अभी।'' इस पर जब मि. जोशी ने उनकी ओर फटी आँखों से देखा तो वह बोले, ''हमारी नाव में भी सूराख़ हो गए हैं, जोशी। इससे पहले कि नाव डूबे, हमें किनारे लग जाना चाहिए।''&lt;br /&gt;(&lt;span style="color:#3333ff;"&gt; &lt;strong&gt;मेधा बुक्स, दिल्ली&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; से वर्ष 2003 में प्रकाशित कहानी संग्रह &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;''औरत होने का गुनाह''&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में संग्रहित )&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-130483472831100301?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/130483472831100301/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=130483472831100301&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/130483472831100301'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/130483472831100301'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/04/16.html' title='कहानी-16'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail 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/&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#003300;"&gt;चित्र : अवधेश मिश्र&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;होश में आने पर मैंने स्वयं को अस्पताल के एक छोटे-से कमरे में पाया। गर्दन के नीचे के मेरे शरीर को एक जाली से ढ़का हुआ था। इधर मेरी चेतना लौटी, उधर मेरे शरीर में दर्द के असंख्य कीड़ों ने कुलबुलाना शुरू कर दिया। जलन की तीव्र और असहनीय पीड़ा के मैं कराह उठी। ऐसा लग रहा था मानो बिस्तर के नीचे भट्ठी दहक रही हो।&lt;br /&gt;      कमरे का दरवाजा खोल कर कोई अंदर आया है। मैंने धीमे से गर्दन घुमा कर देखा- नर्स थी। उसने बैड के सिरहाने टंगे कागजों को पहले उलटा-पुलटा है, फिर उन पर कुछ लिखा है।&lt;br /&gt;      अपनी पूरी ताकत बटोर कर मैं सिर्फ़ फुसफुसा भर सकी हूँ।&lt;br /&gt;      ''सि...स्...ट...र ।''&lt;br /&gt;      नर्स ने शायद मेरी फुसफुसाहट को सुन लिया है। करीब आकर प्यार से बोली, ''बहोत दर्द होता ?... अंय...? होगा, सिक्सटी परसेंट से ज्यादा जल गया तुम। गॉड को याद करो, प्रार्थना करो, वही मदद करेगा।'' फिर कलाई पर बंधी घड़ी देखकर उसने कहा है, ''तुम्हारी दवा का टाइम होता... अब्भी तुमको दवा देगा।'' यह कहकर वह कमरे से बाहर चली गई है।&lt;br /&gt;      कुछ ही देर बाद वह लौट आई है। दवा देकर लौटने लगी तो मैं पुन: फुसफुसाई हूँ- ''सिस्टर, मुझे यहाँ कौन लाया ?''&lt;br /&gt;      ''पुलीस लाई तुमको यहाँ।''&lt;br /&gt;      ''कोई आया था क्या मुझसे मिलने ?''&lt;br /&gt;      ''इंस्पेक्टर आया, साथ में एक अखबारवाला... तुम्हारा बियान लेना माँगता.. पर तुम होश में नहीं था, बोला- फिर आएगा।''&lt;br /&gt;      ''और कोई ?''&lt;br /&gt;      ''देखा नहीं किसी को। बाहर शहर में कर्फ्यू लगा है, कौन आएगा भला ?... आया भी तो कमरे में नहीं आ सकता। उधर, शीशे से देख सकता, बस।'' उसने ठीक मेरे मुख के सामने वाली काँच की खिड़की की ओर संकेत किया।&lt;br /&gt;      खिड़की के उस पार कोई नहीं था।&lt;br /&gt;      मैं अपने आप से प्रश्न करती हूँ। किसकी उम्मीद किए बैठी हूँ ?...कौन आएगा ?... पिता ?... छोटे भाई ?... भाभियाँ ?... मालूम होने पर भी क्या वे आएंगे ?... नहीं। पर जावेद तो आ सकता है। वह मुझे खोजता हुआ ज़रूर आया होगा। शायद, उसे कमरे में नहीं आने दिया गया होगा। वह बाहर खिड़की से ही देखकर लौट गया होगा।&lt;br /&gt;      दवा के असर से दर्द के कीड़े धीरे-धीरे शान्त हो रहे हैं। मैं इधर-उधर देखती हूँ। कमरा है, दीवारें हैं, छत है, खिड़की है, सन्नाटा है, बिस्तर पर आधी से ज्यादा जली मेरी देह है। और... और मेरे जेहन में मेरे कड़वे अतीत की पुस्तक के फड़फड़ाते पृष्ठ हैं। चलचित्र की भाँति मेरे अतीत का एक-एक दृश्य मेरी आँखों के सामने आ रहा है...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      वे घोर अवसाद से भरे दिन थे मेरे और मैं गहरी मानसिक पीड़ा से गुजर रही थी। तीन बरस के वैवाहिक जीवन का नरक भोग कर एक दिन मैं अपने मायके लौट आई थी। बेरहमी से क़त्ल हुए अपने सपनों की लाश उठाये, भीतर तक टूटी, क्षत-विक्षत ! पर मायके में आकर क्या मैं अपनी मानसिक पीड़ा से मुक्त हो सकी ? नहीं। ससुराल से कहीं अधिक मानसिक पीड़ा तो मुझे अपने मायके में झेलनी पड़ी। पिता, भाई, भाभियाँ कोई भी मेरी गुहार सुनने को तैयार नहीं था। मेरे द्वारा लिए गए निर्णय का तीखा विरोध हुआ था। पति से न बनने का सारा दोष मेरे माथे पर मढ़ा जा रहा था। भाभियों ने उठते-बैठते मुझे कौंचने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।&lt;br /&gt;      ''हुंह ! चली आई मुँह उठाए... कहती है, छोड़ आई हूँ उस घर को हमेशा के लिए। कहीं ऐसा भी होता है ? ब्याही लड़की अपने पति के घर ही अच्छी लगती है, माँ-बाप के घर में नहीं।''&lt;br /&gt;      ये सब लोग मुझे फिर उसी यातनागृह में लौट जाने की सीख दे रहे थे।&lt;br /&gt;      ''आदमी लाख बुरा हो, पर अपना आदमी अपना होता है। उस घर से कदम बाहर निकालकर तुमने बहुत बड़ी भूल की है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। तुम्हें लौट जाना चाहिए।''&lt;br /&gt;      उन दिनों पिता का घर साधु-संतों और स्थानीय नेताओं का डेरा बना हुआ था। पिता और दोनों भाई उनकी आवभगत में और उनके निर्देशों के अनुपालन में दिनभर व्यस्त रहते थे। मेरा दु:ख उनके लिए कोई मायने नहीं रखता था।&lt;br /&gt;      एक दिन पिता ने आदेशात्मक स्वर में मुझसे कहा, ''मैंने प्रकाश से बात कर ली है। कुछेक दिन में वह आ रहा है तुम्हें लेने। चुपचाप उसके संग चली जाना। बखेड़ा खड़ा करने की ज़रूरत नहीं, समझीं!''&lt;br /&gt;      ये वे दिन थे जब अपने काले अतीत को कंधों पर उठाए मैं पीड़ादायक वर्तमान से जूझ रही थी और भविष्य मुझे पूरी तरह अंधकारमय दीखता था। कहीं रोशनी की कोई किरण नज़र नहीं आती थी। न खाने को मन करता था, न पीने को। न सोने को, न जागने को। न मुझसे कोई प्यार से बोलकर राजी था, न मैं किसी से बात करके अपने दु:ख को बढ़ाना चाहती थी। जीवन नीरस और अर्थहीन लगने लगा था। और जब प्रकाश के आने से पहले मुझे नौकरी का नियुक्ति पत्र मिला, मैंने मायका छोड़ दिया और किराये पर एक छोटा-सा मकान लेकर अलग रहने लग पड़ी।&lt;br /&gt;      ऐसे में अगर कोई था जो मेरी पीड़ा को समझ रहा था, मेरे हर छोटे-बड़े काम में मददगार साबित हो रहा था तो वह था- जावेद। जावेद से मेरा परिचय एक नौकरी के इंटरव्यू के समय हुआ था। वह स्वयं भी इंटरव्यू देने आया था। छोटी-सी हमारी बातचीत धीरे-धीरे प्रगाढ़ मित्रता में बदल गई थी। जावेद का पलभर का साथ मेरी तकलीफों पर मरहम के फाहे लगा देता। कुछ पल को ही सही, मैं अपना दु:ख भूल जाती।&lt;br /&gt;      जावेद की मदद से ही मैंने तलाक की अर्जी लगा दी थी। तीन साल के बाद कहीं जाकर तलाक मंजूर हुआ। इस बीच, जावेद की भी नौकरी लग गई थी। अब जावेद मेरे घर पर भी आने-जाने लगा था। इस पर अड़ोस-पड़ोस में खुसुर-फुसुर भी शुरू हो गई थी। लोग अजीब सी नज़रों से देखते थे। मुँह भी बनाते थे। पीठ पीछे बातें भी करते होंगे शायद। लेकिन हम दोनों बेफिक्र थे, अपने में खोये। अपनी ही दुनिया में गुम। जावेद का अधिक से अधिक साथ मुझे अच्छा लगता था। प्यार क्या होता है, मैं नहीं जानती थी। प्रकाश, मेरे पति ने कभी मुझे प्यार किया ही नहीं था। सिर्फ भोगा था मुझे। जावेद के प्यार ने मुझमें जीने की उमंग जगा दी थी। मैं उसके प्यार में सराबोर हो उठती थी, भीग-भीग जाती थी। एक-दो रोज वह न मिलता तो अजीब-सी बेचैनी मुझे घेरने लगती। कुछ भी अच्छा नहीं लगता मुझे।&lt;br /&gt;      और एक दिन हम दोनों ने शादी करने का निर्णय लिया। जावेद के घरवाले इस फैसले से खुश नहीं थे, यह जावेद ने मुझे बता दिया था। मुझे अपने परिवारवालों की चिन्ता नहीं थी। उनके लिए तो मैं मर चुकी थी। जब से मैं उनसे अलग हुई थी, उनमें से कोई मेरी खैर-खबर लेने नहीं आया था।&lt;br /&gt;      हमने कोर्ट में शादी करने का निर्णय लिया। जिस दिन हमने कोर्ट में शादी के लिए अर्जी लगाई, उस दिन हम खूब घूमे। एक अच्छी-सी फिल्म देखी, रेस्तरां में उम्दा खाना खाया, बाज़ार में खूब शॉपिंग की और शाम को टहलते हुए हम घर लौटे। जावेद और मेरे हाथों में शॉपिंग का सामान था। हमारे चेहरों पर रौनक थी। हम बेहद खुश थे।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;जावेद को गए अभी पाँच मिनट भी नहीं हुए थे कि बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला। सामने खड़े थे मेरे बूढ़े पिता पंडित के.पी. शास्त्री, मुझसे छोटे दो भाई- रमेश और सुरेश शास्त्री और दोनों भाभियाँ। उन्हें अचानक अपने सामने पाकर मुझे कोई खुशी नहीं हुई थी। अचरज ही हुआ था। भीतर कहीं घृणा का भाव भी था। ये लोग मुझे समझाने-बुझाने आए थे। एक बार फिर मेरे फैसले पर अपना विरोध दर्ज क़रने।&lt;br /&gt;      ''तुम्हारे इस फैसले से जानती हो, बिरादरी में कितनी थू-थू होगी।'' शुरूआत छोटे भाई सुरेश की बीवी ने की थी।&lt;br /&gt;      ''प्रकाश से तुम्हारी निभी नहीं। तुम उससे अलग रहने लगी। जावेद के साथ तुमने संबंध बनाए, सब बर्दाश्त किया। पर अब तुम जावेद के संग शादी करने जा रही हो, गैर जात, गैर धर्म में !'' लगता था, तैयार होकर बड़ी वाली भी आई थी।&lt;br /&gt;      ''अरी, अपनी जात, अपने धर्म में तुझे कोई भी न मिला ?... मिला भी तो एक कटल्ला ! पूरे खानदान की नाक कटा कर रख दी इस कुलक्षणी ने !'' पिता का स्वर बेहद रूखा था- क्रोध और घृणा से भरा हुआ। थोड़ा-सा बोलते ही वह हाँफने लगे थे। उन्हें अपनी इज्ज़त तार-तार होती और रसातल में जाती प्रतीत हो रही थी।&lt;br /&gt;      दोनों भाई आँखें तरेरे बैठे थे। छोटी ने फिर कमान संभाली, ''जानती हो, वे कैसे लोग हैं ?... बहुत खतरनाक हैं वे ! जावेद के घरवाले इस शादी से नाखुश हैं, इसलिए कुछ भी कर सकते हैं।''&lt;br /&gt;      मैं हत्प्रभ थी। इन्हें न केवल मेरी एक-एक गतिविधि की खबर थी, बल्कि ये लोग जावेद के घरवालों की भी खबर रखते थे जिन्हें मैंने आज तक नहीं देखा था।&lt;br /&gt;      मैं शांतचित्त सुन रही थी उनकी तीखी बातें, झेल रही थी उनका तीखा विरोध। जब विरोध असहनीय हो उठा तो मैं चुप न रह सकी, बोल ही उठी, ''आप लोग मेरी चिंता छोड़ दें। मैंने और जावेद ने खूब सोच-समझकर ही फैसला लिया है। आप लोग तो पिछले चार सालों से मुझसे सारे संबंध खत्म किए हुए हैं। मैं तो आपके लिए कब की मर चुकी हूँ। पिता ने बेटी को, भाइयों ने बहन को मरा समझ कर इन चार वर्षों में एक बार भी सुध नहीं ली। फिर आज ये मृत संबंध एकाएक कैसे जीवित हो उठे ?... जावेद और मैं शादी करके रहेंगे। ऐसा करने से हमें कोई नहीं रोक सकता।''&lt;br /&gt;      ''पगला गई है ये ! मति भ्रष्ट हो गई है इसकी !... बूढ़े बाप की इज्जत की परवाह नहीं है इसे ! शहर में आँख उठाकर चलना दूभर हो गया है।'' पिता फिर चीखने लगे थे, ''पैदा होते ही मर जाती करमजली तो ये दिन देखना नसीब न होता।''&lt;br /&gt;      मैं मन ही मन हँस दी थी पिता की बात पर। इच्छा हुई थी कि कहूँ - पिता जी, मार तो आप मुझे माँ की कोख में ही देना चाहते थे। बेटियाँ आपको प्यारी ही कब थीं। लेकिन मैं शान्त रही।&lt;br /&gt;      ''देखो दीदी, पहले ही बहुत मिट्टी पलीद हो चुकी है हमारी। तुम अपना फैसला बदल लो वरना...।'' यह चेतावनी भरा स्वर था छोटे भाई सुरेश का।&lt;br /&gt;      ''वरना ?...'' मैंने प्रश्नसूचक दृष्टि सुरेश के चेहरे पर गड़ा दी।&lt;br /&gt;      ''यह नहीं मानेगी। उस जावेद के बच्चे का ही कुछ करना होगा।'' रमेश ने सुरेश की धमकी को स्पष्ट कर दिया।&lt;br /&gt;      मुझे लगा कि अब बर्दाश्त की सारी सीमाएँ खत्म हो चुकी हैं। मैं लगभग चीख ही उठी थी, ''आप लोगों को जो करना हो, कर लीजिए और यहाँ से चले जाइए।''&lt;br /&gt;      वे गुस्से में बड़बड़ाते चले गए थे और मैं न जाने कितनी देर तक संज्ञाविहीन-सी बैठी रही थी। दिनभर एक बेचैनी-सी छाई रही थी। किसी भी काम में मन नहीं लगा था। एक उथल-पुथल सी मची थी मेरे भीतर। सोच रही थी कि जब स्त्री का एक स्वतंत्र फैसला तक बर्दाश्त नहीं होता तो किस स्त्री-स्वतंत्रता का ढोल पीटा जाता है ? स्त्री के जन्म का विरोध, उसकी इच्छा का विरोध !  उसके स्वतंत्र फैसले का विरोध ! औरत तो जीती ही विरोधों के बीच है- जन्म से लेकर मृत्यु तक। उसके स्वतंत्र अस्तित्व को कहाँ स्वीकार किया जाता है ? माँ बताया करती थी हमें अपने पास लिटा कर, अकेले में - हम अनचाही बेटियों के जन्म को लेकर अनेक बातें। तब मैं बहुत छोटी थी, माँ की बातें मेरी समझ में न आती थीं। बड़ी होने पर मौसी से जाना था उन बातों को और जाना था माँ के दर्द को, उसकी पीड़ा को।&lt;br /&gt;      दो लड़कियों के बाद माँ जब फिर से उम्मीद से हुई तो दादी से लेकर पिता तक का स्वर था- ''इस बार हमें लड़की नहीं, लड़का चाहिए। समझीं !'' यह एक हुक्म था एक औरत के लिए। मानो यह सब औरत के वश में हो। आदमी चाहे तो उसकी इच्छापूर्ति के लिए वह अपने गर्भ में लड़के के बीज ही ग्रहण करे। जैसे यह औरत के हाथ में हो कि वह गर्भ में आकार लेती लड़की को हटाकर वहाँ लड़के को प्रत्यारोपित कर दे।&lt;br /&gt;      मेरे जन्म पर घर में शोक जैसी स्थिति थी। चूँकि मैंने जन्म लेकर उनकी इच्छाओं पर कुठाराघात किया था, अत: कोई मेरी सूरत देखने को तैयार न था। गोद में उठाकर प्यार करना तो दूर की बात थी। माँ ही थी जिसने मुझे अपनी छाती से लगाए रखा, अपना दूध पिलाती रही, चूमती और प्यार करती रही।&lt;br /&gt;      मैं अभी साल भर की भी नहीं हुई थी कि माँ को फिर उसी यंत्रणा से गुजरना पड़ा। माँ जैसे एक मशीन थी- जब तक इन लोगों की इच्छापूर्ति न हो जाती, जब तक उन्हें कुल का दीपक न मिल जाता, उसे वे इस यंत्रणा से कैसे मुक्त कर सकते थे। माँ ने इस बार भी लड़की को जन्म दिया था किंतु मरी हुई लड़की को। पिता और दादी ने राहत की साँस ली थी।&lt;br /&gt;      फिर, माँ ने एक के बाद एक दो बेटे जने। दूसरे बेटे के जन्म के बाद माँ को न जाने क्या हुआ कि वह सूखकर पिंजर हो गई और एक दिन उसने सदैव के लिए आँखें मूंद लीं।&lt;br /&gt;      माँ की मौत पर घर में किसी को कोई विशेष दु:ख नहीं हुआ था सिवाय हम बहनों के। माँ ने हमें कभी दूसरी नज़र से नहीं देखा था। मगर माँ के निधन के बाद हमने महसूस किया कि भाइयों के आगमन के बाद हमारी घोर उपेक्षा होनी शुरू हो गई थी।&lt;br /&gt;      ''लड़कियों को पढ़ा-लिखा कर क्या करना है ? इनसे क्या हमें नौकरी करवानी है ?'' वाली मानसिकता के तहत हमें स्कूल भी नहीं भेजा गया था। हम तो घर के कामकाज के लिए ही जन्मी थीं। इसी में हमें निपुण होना था ताकि शादी के बाद ससुराल में चौका-बर्तन, झाड़ू-बुहार से लेकर सुई-धागे तक के घर के सारे काम हम बखूबी निभा सकें। हमें इस घेरे में से बाहर नहीं निकलना था चूँकि हम लड़कियाँ थीं। औरत होना एक गुनाह ही तो है जिसकी सजा हमें बचपन से ही मिलनी प्रारंभ हो जाती है ताकि हम उसकी अभ्यस्त हो सकें।&lt;br /&gt;      बड़ी बहन शांता सात बरस की हुई कि उसे मियादी बुखार ने घेर लिया। दवा-दारू ठीक से न हो सकने के कारण वह चल बसी। अब इतने बरसों बाद लगता है, शायद जानबूझ कर ही उसकी सही दवा-दारू नहीं की गई थी। तीन अनचाही लड़कियाँ उस घर में साँस ले रही थीं। एक मर भी गई तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था। मुझसे बड़ी रूपा छह बरस की थी- दुबली, पतली। शांता के न रहने पर घर का सारा कामकाज हम दोनों बहनों पर आ पड़ा। दूध तो हमें कभी नसीब ही नहीं हुआ था। दूध दोनों भाई पीते थे या पिता। दादी का विचार था कि मर्दों को दूध-घी ठीक से मिलना चाहिए क्योंकि सारे घर का बोझ उन्हीं के कंधों पर रहता है।&lt;br /&gt;      एक दिन मौसा हमारे घर आए। उनकी शादी हुए कई बरस बीत गए थे लेकिन अभी तक संतान न हुई थी। मौसा ने जब मुझे गोद लेने का प्रस्ताव रखा तो किसी को ऐतराज न हुआ। मैं मौसा के घर आ गई। मौसा के घर रहकर ही मैंने हाई स्कूल किया, फिर इंटर। बीच-बीच में मैं राखी, दशहरा और दीपावली पर कुछेक दिनों के लिए पिता के घर भी जाती रही।&lt;br /&gt;      इसी बीच, रूपा की शादी कर दी गई एक गाँव में। शादी के एक वर्ष के बाद जब रूपा मुझे मिली तो फूट-फूट कर रो पड़ी, ''तू अच्छी रही सुनीता। मैं तो जैसी यहाँ थी, वैसी ही वहाँ हूँ।'' वह बहुत कुछ कहना चाहती थी, अपने दु:ख बताना चाहती थी लेकिन सिसकियों और आँखों से बहते अविरल आँसुओं ने उसे कुछ न कहने दिया, सब कुछ स्वयं ही कह दिया।&lt;br /&gt;      विपदाएँ कभी बताकर नहीं आतीं। मैं बी.ए. में दाखिला लेने ही जा रही थी कि मुझ पर वज्रपात हुआ। एक सड़क दुर्घटना में मौसा-मौसी दोनों की मृत्यु हो गई। विवश होकर मुझे फिर पिता के घर लौटना पड़ा। उस समय दोनों छोटे भाई- रमेश और सुरेश क्रमश: दसवीं और नौवीं कक्षा में थे। लेकिन मुझे आगे पढ़ने से रोक दिया गया। रूपा के जाने के बाद घर का चौका-बर्तन दादी के कंधों पर आन पड़ा था। मेरे लौट आने पर सबसे अधिक खुशी दादी को हुई। पहले दिन से ही घर का सारा कामकाज उसने मुझे सौंप दिया।&lt;br /&gt;      और फिर हुआ मेरा विवाह !&lt;br /&gt;      मुझे ससुराल भेजकर पिता तो गंगा नहा लिए लेकिन मेरी यातनाओं का दौर शुरू हो गया। पति ने पहले दिन से ही मुझे अपने पाँव की जूती समझा। मैं किसी के संग बात नहीं कर सकती थी, अपनी इच्छा से कहीं उठ-बैठ नहीं सकती थी। जो पति कहता, मुझे करना पड़ता। अपनी इच्छा-अनिच्छा को भूलकर उसकी हर इच्छा की पूर्ति मुझे तत्काल करनी पड़ती। ज़रा-सी कोताही होते ही न सिर्फ़ गंदी गालियों की बौछार आरंभ हो जाती, उसके हाथ-पैर भी चलने लगते। उसे खाने को उम्दा भोजन चाहिए था, पीने को शराब और भोगने को औरत का जिस्म ! विरोध करने का हक कहाँ था ? विवाह का लाइसेंस लेकर वह दिन-रात पत्नी से बलात्कार करने को स्वतंत्र था।&lt;br /&gt;      ससुराल में घर के अन्य सदस्यों को मुझसे कोई सहानुभूति नहीं थी। सास और ननदें थीं जो औरत होकर औरत पर होते अत्याचार से दु:खी प्रतीत न होती थीं। उल्टा मुझे ही सीख दी जाती-&lt;br /&gt;      ''अब भई, तेरा खसम है। कमाता है, घर चलाता है, पूरे घर का स्वामी है जैसा कहेगा, करना तो पड़ेगा। जिस हाल में रखेगा, रहना पड़ेगा। औरत की खुशी आदमी की खुशी में ही होती है।''&lt;br /&gt;      दिनभर के कामकाज से थकी मेरी देह रात को घड़ीभर आराम चाहती मगर आराम कहाँ था। रात होते ही पति हिंस्र पशु का रूप धार लेता। रातभर मेरी देह नोंचता-रौंदता रहता। मेरी पीड़ा, मेरी तकलीफ़ का उसे तनिक भी ख़याल न था। बल्कि मुझे उत्पीड़ित करके देह-सुख भोगने में उसे कुछ अधिक ही मजा आता। एक दिन किया था विरोध तो देह पर गहरे नील उभार दिए थे उसने !&lt;br /&gt;      यह था मेरा काला अतीत - कड़वा, घिनौना और दु:खभरा। इस अतीत को याद करके मैं उस रात सो न सकी। अपने इस कड़वे अतीत से मैं कट जाना चाहती थी, जीना चाहती थी अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से, अपनी इच्छानुसार। लेकिन स्त्री-विरोधी इस समाज में क्या ऐसा संभव था ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंच का समय था। चपरासी ने आकर बताया, ''आपसे मिलने कोई लड़की आई है। रिसेप्शन पर बैठी है।'' लड़की ?... कौन हो सकती है ? इसी उधेड़बुन में मैं जब रिसेप्शन पर पहुँची तो वहाँ छरहरे बदन की एक खूबसूरत-सी अनजानी लड़की को बैठा पाया। मुझे देखते ही वह उठ खड़ी हुई।&lt;br /&gt;      ''आप सुनीता ?''&lt;br /&gt;      ''हाँ, पर...''&lt;br /&gt;      ''मैं शहनाज... जावेद की बहन।''&lt;br /&gt;      मैं शहनाज से पहली बार मिल रही थी। मैं उसे लेकर कैंटीन में आ गई। एक कोने में खाली पड़ी कुर्सियों पर हम बैठ गए। मैंने चाय का ऑर्डर दिया। शहनाज के चेहरे पर अपनी दृष्टि स्थिर करते हुए मैंने पूछा, ''कहो शहनाज, कैसे आना हुआ ?''&lt;br /&gt;      ''मैं आपको भाभीजान कह सकती हूँ ?''&lt;br /&gt;      मैं मुस्करा दी, ''तुम्हारी मर्जी। पर पहले यह बताओ, तुम्हें मेरा पता किसने दिया ?''&lt;br /&gt;      ''जावेद भाई आपसे शादी करने की जिद्द ठाने बैठे हैं। घर में अक्सर आपको लेकर बातें होती हैं। आप कहाँ रहती हैं, कहाँ काम करती हैं, आपके माँ-बाप कौन हैं, कहाँ रहते हैं, आपकी अपने पति से क्यूँ नहीं बनीं... सब बताया है जावेद भाई ने। वह तो अम्मी-अब्बू को आपसे मिलाना भी चाहते थे कि एकाएक यह हादसा हो गया।''&lt;br /&gt;      ''हादसा ?''&lt;br /&gt;      ''आपको मालूम है जावेद भाई पर किसी ने क़ातिलाना हमला करने की कोशिश की ?''&lt;br /&gt;      ''जावेद पर हमला ?'' मैं घबरा उठी, ''कब ? कहाँ ? कैसा है जावेद ?'' मैं एक साँस में पूछ गई।&lt;br /&gt;      ''पिछले शनिवार रात नौ बजे जब वह ख़लासी मुहल्ले के पास से गुजर रहे थे, कुछ लोगों ने उन्हें घेर कर मारने की कोशिश की। मगर जावेद भाई किसी तरह वहाँ से भागने में कामयाब हो गए। पीछे से फेंका गया चाकू उनकी दाईं बाजू को छीलता हुआ निकल गया। घबराने की बात नहीं है। हल्का-सा जख्म है। घर पर आराम फरमा रहे हैं।''&lt;br /&gt;      पिछले तीन-चार दिन से जावेद का मुझसे न मिलने का कारण मेरी समझ में अब आया।&lt;br /&gt;      ''तुम मुझे जावेद से मिला सकती हो ?''&lt;br /&gt;      ''अभी नहीं। आपको थोड़ा इंतज़ार करना होगा। घर में कोहराम मचा है। भाईजान को बाहर निकलने की सख्त मनाही है।''&lt;br /&gt;      कुछ देर रुक कर शहनाज ने फिर कहना प्रारंभ किया, ''घरवालों को राजी न होता देख जावेद भाई ने घर में ऐलान कर दिया था कि वह आपसे कोर्ट में शादी करने जा रहे हैं। अम्मी-अब्बू तो हल्के से विरोध के बाद शायद मान भी जाते मगर...''&lt;br /&gt;      ''मगर क्या ?''&lt;br /&gt;      ''दादूजान और चचाजान बहुत गुस्से में हैं। बेहद बौखलाये हुए हैं। जब से जावेद पर हमला हुआ है, मामूजान भी उनके साथ हो गए हैं। वे इस शादी के सख्त खिलाफ हैं। इसे वे अपनी तौहीन समझ रहे हैं। उनका मानना है कि जो उनकी मस्जिद नेस्तोनाबूद कर दें, जो उनके दुश्मन हों, उन काफ़िरों की बेटी को वे अपनी बहू बनाएँ, ऐसा हरगिज नहीं हो सकता। दादूजान ने तो साफ कहा कि अगर...।''&lt;br /&gt;      ''अगर क्या ?''&lt;br /&gt;      इस बीच चाय आ गई थी। चाय पीते हुए शहनाज धीमे स्वर में बोली, ''भाभीजान, आप कुछ रोज के लिए यह शहर छोड़ दें। भाईजान से न मिलें, इसी में भलाई है।'' उसकी आवाज़ बेहद घबराई हुई थी। मैंने देखा, उसकी आँखें गीली हो उठी थीं।&lt;br /&gt;      ''शहनाज, यह मशविरा तुम दे रही हो या किसी ने... ?''&lt;br /&gt;      ''यह मशविरा मेरा और अम्मीजान का है।''&lt;br /&gt;      कुछ देर बाद शहनाज चली गई। इसके बाद ऑफिस के काम में मेरा मन नहीं लगा। एक अजब-सी बेचैनी हो रही थी। शाम को घर लौटकर भी चैन नहीं पड़ा। कुछ पकाने, खाने को भी दिल नहीं किया। जावेद को लेकर परेशान रही। शहनाज का चेहरा, उसकी डबडबाई आँखें, उसका मशविरा याद आता रहा।&lt;br /&gt;      मुझे अधिक इंतज़ार नहीं करना पड़ा था। दो दिन बाद ही जावेद मुझसे मिला, मेरे ऑफिस के बाहर, शाम पाँच बजे। एक रेस्तराँ में बैठकर हमने बातें कीं। जावेद बोला, ''बाहर चला गया था इसलिए मिलना नहीं हुआ।''&lt;br /&gt;      ''तुम्हारी बाजू का घाव कैसा है ?'' मैंने उसके झूठ को नज़रअंदाज करते हुए पूछा।&lt;br /&gt;      ''कैसा घाव ?'' उसने अचकचा कर पूछा।&lt;br /&gt;      ''जावेद, कौन थे वे लोग ?'' जावेद और बनने की कोशिश करता कि मैंने कहा, ''जावेद, शहनाज ने मुझे सब बता दिया है।''&lt;br /&gt;      ''कब मिली थी वह तुमसे ?''&lt;br /&gt;      ''तीनेक दिन हुए, ऑफिस में आई थी।''&lt;br /&gt;      जावेद चुप हो गया।&lt;br /&gt;      ''तुमने बताया नहीं, कौन लोग थे वे ?''&lt;br /&gt;      ''जानता नहीं। होंगे कोई गुंडे-बदमाश। अकेला पाकर लूटना चाहते होंगे।''&lt;br /&gt;      ''तुम कुछ छिपा रहे हो।'' मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।&lt;br /&gt;      ''नहीं, नहीं। छिपाना क्या।'' फिर बात का रुख बदलते हुए बोला, ''चाय-कॉफी में ही टरकाना चाहती हो या कुछ खिलाओगी भी। बहुत भूख लगी है, कुछ खाना चाहता हूँ।''&lt;br /&gt;      मैंने जावेद को अधिक कुरेदना ठीक नहीं समझा। टेबल थपथपाते हुए उसके हाथों को अपने हाथों से ढकते हुए मैंने स्वर में मिठास लाकर पूछा, ''अच्छा बताओ, क्या खाओगे ?''&lt;br /&gt;      ''तुम्हें !'' उसने अपना मुँह मेरी ओर बढ़ाया।&lt;br /&gt;      ''धत्...।'' मैंने झटके से अपना चेहरा पीछे करते हुए उसके सिर पर हल्की-सी चपत लगाई और बोली, ''रेस्तराँ में बैठकर खाओगे ?...भूखे कहीं के।''&lt;br /&gt;      रेस्तराँ से निकले तो अंधेरा गाढ़ा हो चुका था। जावेद मुझे गली के मोड़ तक छोड़कर चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिसम्बर माह की ठंड थी। सुबह जल्दी उठने को मन नहीं करता था। उस दिन वैसे भी छुट्टी थी। मैं देर से उठी, पानी गरम करके नहाई और गीले बालों को तौलिए से लपेटकर अपने लिए नाश्ता बनाने की सोच ही रही थी कि जावेद आ गया। वह बेहद घबराया हुआ-सा लग रहा था। मैं कुर्सी खींचकर उसके सामने बैठ गई।&lt;br /&gt;      ''क्या बात है जावेद, बहुत घबराए हुए से हो ?''&lt;br /&gt;      ''न जाने क्या होने वाला है, सुनीता। शहर के हालात ठीक नहीं लगते।''&lt;br /&gt;      जब से एक सम्प्रदाय के कछ जुनूनी लोगों द्वारा अयोध्या में एक प्राचीन इमारत ढहा दी गई थी, तब से ही पूरा शहर एक अजीब-से तनाव की गिरफ्त में साँस ले रहा था। हिंदू-मुसलमान की लगभग बराबर-सी आबादी वाले इस छोटे-से शहर में एकाएक हर तरफ हरे और केसरिया झंडों की बाढ-सी आ गई थी। एक हिस्सा खुश था, आह्लादित था, नाच रहा था तो दूसरा हिस्सा खामोश था, भीतर ही भीतर तड़प रहा था, उबल रहा था।&lt;br /&gt;      मैंने जावेद के सिर में प्यार से उँगलियाँ फिराते हुए कहा, ''कुछ नहीं होगा। कुछेक दिन का ज्वार है, खुद-ब-खुद शांत हो जाएगा।''&lt;br /&gt;      ''मुझे डर है, कुछ दिन का यह ज्वार अपने पीछे तबाही के मंजर न छोड़ जाए।''&lt;br /&gt;      मैं उठकर नाश्ता बना लाई। चाय पीते हुए जावेद ने कहा, ''सुनीता, मेरी एक बात मानोगी ?''&lt;br /&gt;      ''क्या ?'' मुँह में ब्रेड ठूँसते हुए मैंने पूछा।&lt;br /&gt;      ''सबसे पहले तुम दरवाजे पर टँगी अपनी नेम-प्लेट हटाओ।''&lt;br /&gt;      मैं हँस पड़ी, ''जावेद, इससे क्या होगा ? चलो, सुनीता शास्त्री के स्थान पर सुनीता खान कर देती हूँ।''&lt;br /&gt;      ''खतरा फिर भी रहेगा।'' इस बार जावेद ने अपनी आँखें मेरी आँखों में लगभग गाड़ ही दी थीं, ''तुम समझती नहीं हो। खतरा दोनों ओर से है। सिरफिरे असामाजिक लोग दोनों ओर हैं और कुछ भी...।''&lt;br /&gt;      मैं जावेद की घबराहट को समझ रही थी। कुछ रोज पहले जावेद पर हुआ हमला और मुझे मिलने वाली धमकियाँ इस घबराहट की पुष्टि के लिए पर्याप्त थीं।&lt;br /&gt;      ''सुनीता, चलो कुछ दिनों के लिए हम यह शहर छोड़कर कहीं और चले चलते हैं। हालात ठीक होने पर लौट आएंगे।''&lt;br /&gt;      ''पर क्या गारंटी है, जहाँ जाएँगे वहाँ भी यह सब नहीं होगा।'' जावेद के हाथों को अपने हाथों में लेकर मैंने कहा, ''विकट परिस्थितियों से घबराकर भागना कोई हल नहीं है। जावेद, हम यहीं रहेंगे और स्थितियों का सामना करेंगे।''&lt;br /&gt;      जावेद चुप हो गया। कुछ न बोला।&lt;br /&gt;      मैंने आगे बढ़कर उसकी आँखों में झाँका और शरारत भरी मुद्रा में बोली, ''घबराहट में भी तुम इतने सुंदर लगोगे, मैं नहीं जानती थी।'' और एकाएक मैंने उसके चेहरे पर चुम्बनों की बौछार कर दी थी, फिर कसकर अपनी छाती से लगा लिया था- उसका सुर्ख हो उठा चेहरा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एकाएक शहर में वारदातें होने लगी थीं। बाजार बंद होने लगे थे। स्कूल-कॉलेजों में सन्नाटा था, सड़कें सुनसान दीखती थीं। हरे और केसरिया झंडे सक्रिय हो उठे थे। जाने क्या होने वाला था। कौन-सी कयामत आने वाली थी। पिछले दो दिन से जावेद भी मुझसे नहीं मिला था।&lt;br /&gt;      रात के आठ बजे थे। मैं बिस्तर में लेटी कोई किताब पढ़ रही थी लेकिन मेरा ध्यान बार-बार शहर में हो रही वारदातों की ओर चला जाता था और जावेद को लेकर मैं परेशान हो उठती थी। एकाएक, बाहर गली में हल्का-सा शोर हुआ। उठकर खिड़की से झाँका, कुछ लोगों का हुजूम दिखाई दिया। कौन लोग थे वे, अँधेरा होने के कारण पहचान पाना कठिन था। तभी, एक पत्थर खिड़की का काँच तोड़ता हुआ ठीक मेरे पास गिरा। मैं घबराकर पीछे हट गई। तुरंत खिड़की दरवाजे ठीक से बंद किए और बिस्तर में आ बैठी।&lt;br /&gt;      कुछ देर बाद शोर थम गया-सा लगा। मैंने राहत की साँस ली। लेकिन, अधिक देर नहीं हुई जब मैंने कुछ पदचापों को अपनी ओर बढ़ता महसूस किया। धीरे-धीरे शोर मुखर हो उठा। अब वे मेरे घर का दरवाजा पीट रहे थे। मैं भयभीत हो उठी। साँसें तेज-तेज चलने लगी थीं।&lt;br /&gt;      बगल की खिड़की से मुहल्ले पर नज़र दौड़ाई। वहाँ अँधेरा और सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग घरों में होकर भी घरों में नहीं थे जैसे। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था- क्या करूँ ? क्या न करूँ ? ये लोग क्या करना चाहते हैं ? क्या इरादा है इनका ? खिड़की से कूद कर भाग जाऊँ या सामना करूँ ? इसी ऊहापोह में थी कि वे लोग दरवाजा तोड़ने में कामयाब हो गए। एक दीर्घ चीख मेरे मुख से निकली। वे मेरी ओर इस प्रकार झपटे जैसे छिपे हुए शिकार पर भूखे शिकारी झपटते हैं। उनके हाथ मेरे जिस्म की ओर बढ़ रहे थे। देखते ही देखते, उन्होंने मेरे वस्त्र तार-तार कर दिए। घर का सारा सामान उलट-पलट दिया। मेरी चीखें तेज हो उठी थीं पर मेरी चीख-पुकार का उन पर कोई असर नहीं हो रहा था। मैं रो रही थी, चीख रही थी, खुद को बेहद निरीह और असहाय पा रही थी।&lt;br /&gt;      अचानक मेरा बदन चिपचिपे तरल पदार्थ से भीग उठा। मिट्टी के तेल की दुर्गन्ध जब मेरे नथुनों में घुसी, मैं पूरी ताकत से चीख उठी। यह चीख मेरी अब तक की चीखों से तेज और लंबी थी। मौत मेरे सामने खड़ी थी- जलती हुई तीली के रूप में। वे हँस रहे थे, उन्मादित हो रहे थे अपनी बर्बरता पर। तभी, जलती हुई तीली मेरी ओर उछली और मेरा जिस्म धू-धू कर जलने लगा। आग की लपटों के बीच न जाने कब तक मैं तड़पती रही, छटपटाती रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दवा का असर कम होते ही दर्द के कीड़े फिर से कुलबुलाने लगे हैं। मैं सामने काँच की खिड़की के पार देखती हूँ। शायद कोई अंदर झांक रहा है। कौन हो सकता है ?... जावेद ?... तभी धीमे से दरवाजा खुलता है। मेरी गर्दन हौले से दरवाजे की ओर घूम जाती है। एक वर्दीधारी व्यक्ति नमूदार होता है। उसके पीछे-पीछे एक और व्यक्ति गले में कैमरा लटकाए प्रवेश करता है। दोनों मेरी ओर बढ़ते हैं कैमरेवाला व्यक्ति कई कोणों से मेरा चित्र खींचता है। वर्दीधारी व्यक्ति मुझसे प्रश्न करता है। मैं जवाब देना चाहती हूँ, पर आवाज़ मेरा साथ नहीं देती। मुझे ख़ामोश देखकर वह खीझ उठता है। फिर एक फोटो मेरी आँखों के ऐन सामने लाकर पूछता है, ''इसे पहचानती हो ?''&lt;br /&gt;      यह तो जावेद का फोटो है। भीतर की सारी ताकत बटोर कर मैं फुसफुसाती हूँ, ''क्या हुआ इसे ?''&lt;br /&gt;      ''कल रात यह तुम्हारे घर की ओर जा रहा था, तभी कुछ पागल लोगों की भीड़ के हमले का शिकार हो गया। जान से मार डाला इसे।”&lt;br /&gt;      मुझे लगा, धरती डोल रही है। वर्दीधारी व्यक्ति न जाने क्या-क्या पूछे जा रहा है। वह क्या पूछ रहा है, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। मुझे सिर्फ़ उसके होंठ हिलते दिखाई देते हैं। धीरे-धीरे वे दोनों धुँधली आकृतियों में बदलते जा रहे हैं। धुँधली आकृतियाँ भी गायब होती जा रही हैं। मेरी आँखों के आगे गाढ़ा काला अँधेरा छाता जा रहा है। मेरी साँसों की नैया डूब रही है। दर्द के महासागर में चंद साँसों की छोटी-सी किश्ती अपने आपको डूबने से आखिर बचा भी कब तक सकती है !&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;( &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;मेधा बुक्स, दिल्ली&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; से वर्ष 2003 में प्रकाशित कहानी संग्रह &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;''औरत होने का गुनाह&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;'' में संग्रहित )&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-8582722120560664341?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/8582722120560664341/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=8582722120560664341&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8582722120560664341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/8582722120560664341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/02/15.html' title='कहानी-15'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;लुटे हुए लोग&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#3333ff;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;किसी फैसले पर पहुँचने की ऊहापोह में आधी रात जाग कर गुजारने के बावजूद सुबह उनकी आँख कुछ जल्दी ही खुल गई। रात में लिए गए निर्णय का ख़याल आते ही वह तत्काल उठ खड़े हुए।&lt;br /&gt;     एक्सीडेंट के बाद जब से पत्नी चारपाई से लगी है, घर के सभी छोटे-बड़े काम वही किया करते हैं। झाडू-पौचा, घर की साफ़-सफाई, बर्तन माँजने और कपड़े आदि धोने से लेकर खाना बनाने तक का काम।&lt;br /&gt;     कॉलोनी में पानी की किल्लत बारहों मास रहती है। ग्रीष्म में कुछ अधिक ही। केवल सुबह के वक्त ही पानी आता है। वह भी बहुत कम समय के लिए। ऊपर से प्रैशर इतना कम कि लोगों के बहुत-से पानी वाले काम रह ही जाते हैं। फिर अगर बहुत ज़रूरी हो तो बारह नंबर ब्लॉक के पॉर्क में लगे इकलौते हैंड-पम्प से पानी भरकर लाओ।&lt;br /&gt;     अन्य लोगों की तरह उनकी भी सुबह उठते ही सबसे पहली चिंता दिन भर के लिए पानी स्टोर कर लेने की हुआ करती है। बुढ़ापे के कारण हैंड पम्प से पानी खींचना और भरी हुई बाल्टियों को आधा किलोमीटर दूर से ढोकर लाना अब उनके बस में नहीं।&lt;br /&gt;     उठकर उन्होंने सबसे पहले नल खोला। पानी अभी आया नहीं था। नल के नीचे बाल्टी रख वह बाहर गली में आ गए। ताजी हवा का झोंका उन्हें अच्छा लगा। सोचा, गली में थोड़ा आगे तक घूम आएँ। तभी उन्हें लगा, नल सूँ-सूँ कर रहा है। उन्होंने घूमने के विचार को वहीं छोड़ा और गुसलखाने की ओर बढ़े। कुछ ही देर में नल से पानी टपकने लगा।&lt;br /&gt;     आज भी सर्वप्रथम उन्होंने बाल्टियों से एक ड्रम भरा, पाँच लीटर की कैनी भरी और दोनों बाल्टियों को भर लेने के पश्चात् ही उन्होंने रात के जूठे पड़े बर्तन माँजकर धोए। पानी का क्या भरोसा, कब बीच में बन्द हो जाए ! दो तीन जोड़े कपड़े उनके और पत्नी के उतरे रखे थे। उन्हें भी फाटाफट धोया और फिर लगे हाथ नहा भी लिए।&lt;br /&gt;     तब तक पत्नी भी जाग गई थी। उन्होंने उसे सहारा देकर उठाया और नित्य-कर्म से फारिग कराकर, मंजनादि कराया आर पुन: चारपाई पर लाकर लिटा दिया। इसके बाद स्टोव जलाकर पत्नी के लिए दोपहर का भोजन तैयार करने लगे।&lt;br /&gt;     आड़ी-तिरछी रोटियाँ सेंकते हुए उनके जेहन में अतीत की किताब के पन्नों ने खुद-ब-खुद उलटना-पलटना आरंभ कर दिया ...&lt;br /&gt;     ... न जाने कितने देवी-देवताओं, पीरों-मजारों के सम्मुख माथा टेकने और मनौतियाँ माँगने के बाद सुरेश पैदा हुआ था। तीन लड़कियों के बाद एक बेटा! सुरेश के बचपन से जुड़ी अनेक बातें चलचित्र की भाँति उनकी आँखों के आगे विचरने लगीं।&lt;br /&gt;     अकस्मात्, उन्हें लोहड़ी के दिन याद हो आए।&lt;br /&gt;     लोहड़ी के अगले दिन, एक रस्म के अनुसार जब वे सुरेश को मूली के साथ तिल लगाकर चखने के लिए कहते तो वह तुरंत खुशी-खुशी तैयार हो जाया करता। मूली के साथ तिलों को लगाकर चखने से पूर्व जब वह पूछता- ''तिल मूली चक्खाँ ?'' तो पति-पत्नी की खुशी का ठिकाना न रहता और वे भावविभोर-सा होकर उत्तर देते, ''चख !''  फिर पुन: मूली में तिल लगाकर मुँह में डालने से पहले वह पूछता, ''माँ-पिऊ रक्खाँ ?'' तो वे भीतर तक एक अव्यक्त सुख से सराबोर होकर मुस्कराते हुए कहते, ''रख !'' यह प्रक्रिया तीन बार दोहराई जाती और वे सुरेश को देख-देखकर निहाल होते रहते।&lt;br /&gt;     बचपन में माँ-बाप को संग रखने की बात पूछने वाला बेटा आज उनसे अलग रहता है। दिल्ली शहर में अपनी पत्नी और बच्चों के संग। सरकारी फैक्टरी में मामूली-से वर्कर के तौर पर भट्ठियों में लोहा गलाते-गलाते, अपने बच्चों के लिए उन्होंने अपना जीवन भी गला डाला था। एक के बाद एक तीन लड़कियों की शादी कर वे इतना टूट गए थे कि सुरेश की शादी के लिए कुछ भी पल्ले न बचा था। लेकिन सुरेश का सरकारी नौकरी पर लगना, उनके मृतप्राय: से उत्साह को पुनर्जीवित कर गया था। उन्हें लगने लगा था कि अब उनके दिन भी फिरेंगे। ईश्वर ने उनकी भी सुन ली। अब बेटा कमाएगा और वे बूढ़ा-बूढ़ी बैठकर खाएंगे। पर आदमी जैसा सोचता है, क्या वैसा उसे मिल भी जाता है ?&lt;br /&gt;     तवे पर जलती रोटी को उठाते हुए उनकी उँगलियों की पोरें जल उठीं। एक गहरा नि:श्वास लेकर वे बुदबुदाये, ''जो भाग्य में लिखा है, वही तो होना है !''&lt;br /&gt;     बनी हुई दाल और रोटियों को ढक कर एक ओर रखने के बाद उन्होंने कुछ ब्रेड सेंकीं और चाय का पानी स्टोव पर चढ़ा दिया। वहाँ से उठने से पूर्व उन्होंने स्टोव मद्धम किया और रसोई से निकलकर कमरे में आ गए। खड़े-खड़े आले में रखी अलार्म-घड़ी पर उन्होंने नज़र डाली। समय जानने के लिए उन्हें कुछ आगे बढ़ना पड़ा क्योंकि घड़ी का डॉयल पीला पड़ चुका था और उस पर खुदे हुए नंबर भी धुँधले पड़ गए थे। इस पुरानी अलार्म घड़ी से भी अनेक यादें जुड़ी हुई थीं। उन्होंने ठीक से याद करने की कोशिश की कि सुरेश तब कौन-सी कक्षा में था, जब वह उसके लिए न जाने कितनी ज़रूरतों का गला घोंट कर बचाए गए पैसों से अलार्म घड़ी खरीद कर लाए थे। शायद छठी या सातवीं कक्षा में रहा होगा वह। घड़ी के बिना सुरेश को सुबह उठने में दिक्कत होती थी और वह अक्सर ही स्कूल पहुँचने में लेट हो जाता था। अलार्म घड़ी आ जाने पर सबसे अधिक खुशी सुरेश को ही हुई थी। रात को सोने से पहले वह उसमें सुबह पाँच बजे का अलार्म लगा दिया करता।&lt;br /&gt;     वे फिर से पुरानी यादों की गिरफ्त में फँसते जा रहे थे, अत: उन्होंने खुद को संभाला और तैयार होने लगे। उन्हें तैयार होता देख चारपाई पर लेटी पत्नी ने प्लास्टर चढ़ी अपनी दाहिनी बाजू को अपने बायें हाथ का सहारा देते हुए बेहद सावधानीपूर्वक ऊपर उठाया और उठकर बैठ गईं। कुछेक पल उनकी ओर देखने के बाद पूछा, ''सुरेश के यहाँ जा रहे हो ?''&lt;br /&gt;     पत्नी के प्रश्न को सुनकर उन्होंने उत्तर देने में कोई जल्दी नहीं मचाई। निवार वाले पुराने पलंग के नीचे से अपने बूट ढूँढ़े, उन्हें झाड़ा-पोंछा और पत्नी के पास बैठकर पहनने लगे। बूटों के तस्में बाँधते हुए बोले, ''बच्चों की दो महीने के छुट्टियाँ भी खत्म होने को आईं, आया ही नहीं बच्चों को लेकर।'' वेदनापूर्ण स्वर में गहरी उदासी भी मिली हुई थी।&lt;br /&gt;     ''हाँ, महीनों हो जाते हैं, पोते-पोतियों का मुँह देखे। उनके आने से घर में रौनक आ जाती है। मेरा भी मिलने को बहुत मन करता है, पर...'' कहते-कहते पत्नी रुक गई और अपनी प्लास्टर चढ़ी बाँह को निहारने लगी, ''और नहीं तो चारपाई पर पड़ी अपनी माँ को ही मिलने आ जाता।''&lt;br /&gt;     उन्होंने पत्नी की उदास और गीली हो आई आँखों की ओर देखा और कहा, ''शनि-इतवार की छुट्टी में से एक दिन तो आ ही सकता है, बहू-बच्चों को लेकर।''&lt;br /&gt;     ''शायद दफ्तर में काम का जोर रहा होगा। पिछली बार आया था तो कह रहा था- माँ, छुट्टी नहीं मिलती। शनि-इतवार को भी दफ्तर में बुला लेते हैं।'' फिर एक गहरा नि:श्वास लेकर बोली, ''चलो, राजी रहे। नौकरी पहले है।''&lt;br /&gt;     इसके बाद कुछेक पल चुप्पी छाई रही। न वह कुछ बोले, न पत्नी ही। चुप्पी जब लम्बी और सघन होने लगी तो पत्नी ने ही उसे तोड़ा, ''नाश्ता तो कर जाते। सुरेश के घर पहुँचते-पहुँचते दुपहर हो जाती है।''&lt;br /&gt;     ''ब्रेड सेंकी हैं, तुम भी ले लो। दाल और फुलके रखे हैं। दोपहर को खा लेना। शाम को तो लौट ही आऊँगा।'' स्टोव पर रखे पानी में चीनी, चायपत्ती डालते हुए वह बोले।&lt;br /&gt;     ''किराये के लिए पैसे तो है न ? महीने के आखिरी दिन हैं।'' पत्नी ने पूछा।&lt;br /&gt;     पत्नी के इस प्रश्न ने एक बार फिर उन्हें उसी उधेड़बुन में डाल दिया जो कल रात से उन्हें परेशान किए हुए थी। बच्चों को देखने का मोह उनके भीतर इतना तीव्र था कि महीने के आखिरी दिनों में पैसों की तंगी भी उन्हें रोक नहीं पायी थी। और कल रात उन्होंने बेटे के घर जाने का फैसला कर लिया था।&lt;br /&gt;     ''हाँ, पच्चीस रुपये हैं। बहुत हैं। परसों तो पेंशन मिल ही जानी है।'' चाय दो कपों में उँडेल वह फिर पत्नी के पास आ बैठे।&lt;br /&gt;     चाय का घूँट भर पत्नी बोली, ''गाड़ी और बसों में जरा ध्यान से आया-जाया करो। तुम जल्दी बहुत मचाते हो। अब तुम्हें दीखता भी कम है। अँधेरा होने से पहले लौटने की करना।''&lt;br /&gt;     वह चुपचाप पत्नी की हिदायतें सुनते रहे और चाय में ब्रेड भिगो-भिगो कर खाते रहे।&lt;br /&gt;     ''कहीं ऐसा न हो, तुम उधर पहुँचो और वे इधर...'' पत्नी ने उनके मुँह की बात छीन ली थी। दरअसल, वह भी इस क्षण यही बात सोच रहे थे।&lt;br /&gt;     ''ऐसा सोचते-सोचते तो सारी छुट्टियाँ बिता दीं। आज हो ही आता हूँ। बच्चों को देखने को बहुत मन तरसता है।'' उन्होंने कहा और खाली कप उठाकर रसोई में रख आए।&lt;br /&gt;     ''तुम्हारी दवा है कि खत्म हो गई ?'' चलते-चलते उन्होंने पत्नी से पूछा।&lt;br /&gt;     ''अभी है, दो दिन की। तुम जाओ। जरा ध्यान से आना-जाना।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से स्टेशन तक की दूरी को पैदल ही तय करना उन्होंने बेहतर समझा। रिक्शा वाला यूँ ही चार-पाँच रुपये झटक लेता है। जाएगा भी घुमाकर, लम्बे रास्ते से। जब तक रिक्शावाला स्टेशन पहुँचेगा, उससे कम समय में तो वह कॉलोनी के बीच के कच्चे रास्ते से होते हुए स्टेशन भी पहुँच जाएंगे।&lt;br /&gt;     सुरेश के घर पहुँचने का उनका अपना तरीका है। यहाँ से ई.एम.यू. या कोई भी ट्रेन पकड़ेंगे, शाहदरा पहुँचेंगे। वहाँ उतरकर बस-स्टैंड के लिए फिर लगभग एक किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करेंगे। बस भी वही पकड़ेंगे जो सीधी सुरेश के घर पहुँचाए। इस सब में समय भले ही कुछ अधिक लगे किन्तु कम पैसों में वह सुरेश के घर पहुँच जाते हैं। दो बसें बदलकर इससे आधे समय में वह सुरेश के घर पहुँच सकते हैं लेकिन इस प्रकार पैसे अधिक लगते हैं। लिहाजा वह अपने तरीके पर ही अडिग रहते हैं। आज भी उन्होंने ऐसा ही किया। जब शाहदरा बस-स्टैंड पर पहुँचे तो मालूम हुआ, एक बस उनके पहुँचने से दो मिनट पहले ही निकल चुकी थी। दूसरी बस कम से कम चालीस मिनट बाद आनी थी। अत: उसका इंतजार करने को वह विवश थे।&lt;br /&gt;     धूप में अब तेजी आ गई थी। गरमी के कारण पसीना भी चुहचुहाने लगा था। दूसरी बस आकर लगी तो उन्होंने राहत की साँस ली। टिकट लेने के बाद सीट पर बैठ उन्होंने मन ही मन हिसाब लगाया- ट्रेन से आने-जाने के आठ रुपये, बस से सुरेश के घर आने-जाने के छह रुपये, कुल हुए चौदह रुपये... बाकी बचे ग्यारह। काफी हैं, कल का दिन निकल ही जाएगा जैसे-तैसे!&lt;br /&gt;     उसी समय, बस में केले वाला चढ़ा।&lt;br /&gt;     सहसा, उन्हें ख़याल आया, बच्चों के घर जा रहा हूँ। केले ही ले लेता।...खाली हाथ तो...और उन्होंने केलेवाले से पूछा, ''कैसे दिए भाई केले?''&lt;br /&gt;     ''बारह रुपये दर्जन। कितने दूँ ? केले बहुत अच्छे हैं।''&lt;br /&gt;     वह सोच में पड़ गए। तीन बच्चे हैं। एक दर्जन तो लेने ही पड़ेंगे। लेकिन बारह रुपये ?... नहीं, नहीं। वह खिड़की के बाहर देखने लगे।&lt;br /&gt;     ''चलो, ग्यारह लगा दिए। एक दर्जन दूँ।'' केलेवाला हटा नहीं था।&lt;br /&gt;     एक बार फिर उन्होंने अंदर ही अंदर हिसाब लगाया और बोले, ''दस लगाने हैं तो दे दो एक दर्जन।''&lt;br /&gt;     ''चलो, निकालो पैसे। आप भी क्या याद करेंगे शाह जी !'' केलेवाले ने गिनकर केले पकड़ा दिए। 'शाह' शब्द पर वह थोड़ा मुस्कराये और जेब से दस का नोट निकालकर थमाते हुए बुदबुदाये, 'कहाँ के शाह यार ?... यहाँ तो...'&lt;br /&gt;     सुरेश के घर पहुँचे तो शिखर दुपहरी हो चुकी थी। भूख-प्यास भी लग आई थी। जीने से ऊपर चढ़ते वक्त वह भीतर से बहुत उत्साहित थे। बच्चे देखते ही उनसे लिपट जाएंगे- 'दादा जी आ गए, दादा जी आ गए' कहते हुए। लेकिन जिस उत्साह से सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचे थे, वह सारा उत्साह ऊपर पहुँचते ही एकदम ठंडा पड़ गया। द्वार पर लगा ताला देख वह जड़ से हो गए। बहुत देर असमंजस की स्थिति में खड़े रहे। अब क्या करें ?... कुछ समझ में नहीं आया। कहाँ गए होंगे ? कहीं ये सब उधर तो नहीं पहुँच गए?... अभी वह यह सब सोच ही रहे थे कि एकाएक बगल के मकान से पड़ोसी निकला। उसी ने बताया, ''पिकनिक पर बड़खल गए हैं, बच्चों को लेकर। रात को ही लौटेंगे।''&lt;br /&gt;     सुनकर अधिक देर खड़ा रहना उन्होंने उचित नहीं समझा। लौटने लगे तो हाथ में पकड़े केलों का ध्यान हो आया।&lt;br /&gt;     ''ये केले दे देना। बच्चों के लिए लाया था। कहना, बच्चों के दादा आए थे।'' मन में आया, यह भी कहें, ‘सुरेश से कहिएगा, बीमार माँ बहुत याद करती है तुझे। कभी मिल आ उसे।’ लेकिन कह नहीं पाए यह सब।&lt;br /&gt;     मायूस होकर लौट पड़े।&lt;br /&gt;     बस-स्टॉप पर पहुँचे तो भूख और प्यास ने फिर सिर उठाया। मन हुआ, पानी वाले से पानी के दो गिलास लेकर पी लें। परंतु जेब का ख़याल आते ही उन्होंने अपने इस विचार को स्थगित कर दिया।&lt;br /&gt;     शाहदरा स्टेशन पहुँचते-पहुँचते थकावट, भूख और प्यास के मारे वे बेदम-से हो गए थे। स्टेशन पहुँचकर देखा, प्लेटफॉर्म पर एक ट्रेन खड़ी थी। तैयार। उन्होंने टिकट खिड़की पर पूछा, ''गाड़ी मेल तो नहीं ?''&lt;br /&gt;     ''नहीं, पैसेंजर है।''&lt;br /&gt;     उनकी जान में जान आई। जेब में पड़ा इकलौता पाँच का नोट निकालकर उन्होंने टिकट लिया और एक रुपया वापस ले प्लेटफॉर्म की ओर लपके। ट्रेन में भीड़ थी। सिगनल हो चुका था। वह जैसे-तैसे एक डिब्बे में चढ़ गए। उनका चढ़ना था कि ट्रेन आगे सरकने लगी।&lt;br /&gt;     भीड़ में से जगह बनाते हुए वह खिड़की के पास खड़े हो गए। खिड़की से आती हवा के कारण गरमी से थोड़ा राहत मिली।&lt;br /&gt;     ट्रेन अभी आउटर सिगनल ही पार हुई थी कि एकाएक डिब्बे में शोर हुआ। उन्होंने शोर की दिशा में उचक कर देखा। एक अधेड़-सा व्यक्ति रो-चीख रहा था- ''हाय... मैं तो लुट गया... बरबाद हो गया... हाय... मेरी जेब किसी ने काट ली...।''&lt;br /&gt;     सुनते ही उनका अपना दायाँ हाथ अकस्मात् ऊपर की जेब पर चला गया। तुरंत ही उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। जेब में था ही क्या जिसके लुटने का डर उन्हें हो आया ?... वहाँ तो एकमात्र एक रुपये का सिक्का मुँह चिढ़ा रहा था। उन्हें अपनी इस हरकत पर शर्म-सी महसूस हुई। जेब तक गया हाथ अब आहिस्ता-आहिस्ता नीचे आ गया था, अपनी जगह पर।&lt;br /&gt;     और अब वह अपनी शर्म और झेंप मिटाने के लिए खिड़की के बाहर पीछे की ओर तेजी से भागती चीजों को देख रहे थे।&lt;br /&gt;( &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;मेधा बुक्स, दिल्ली&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; से वर्ष 2003 में प्रकाशित कहानी संग्रह &lt;strong&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;''औरत होने का गुनाह&lt;/span&gt;&lt;span style="color:#3333ff;"&gt;'' &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;में संग्रहित )&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-1113086547121896513?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/1113086547121896513/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=1113086547121896513&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1113086547121896513'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/1113086547121896513'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2009/01/14.html' title='कहानी-14'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SYHZE1ZNdgI/AAAAAAAAAGA/VZTf3qMBvJ0/s72-c/6e017b6781e73450.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3083653920912210863.post-6900931163229414199</id><published>2008-12-27T02:46:00.001-08:00</published><updated>2008-12-27T03:01:28.604-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानियाँ'/><title type='text'>कहानी-13</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYH4NiD5-I/AAAAAAAAAFQ/bj3NfEgA4B8/s1600-h/2867657252_5ceb214620_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284419875052447714" style="WIDTH: 149px; CURSOR: hand; HEIGHT: 109px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYH4NiD5-I/AAAAAAAAAFQ/bj3NfEgA4B8/s200/2867657252_5ceb214620_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;  &lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:180%;color:#ff0000;"&gt;गोष्ठी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#009900;"&gt;सुभाष नीरव&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;वह चाहकर भी उसे मना नहीं कर सके। जबकि मदन के आने से पूर्व वह दृढ़ मन से यह तय कर चुके थे कि इस काम के लिए साफ़-साफ़ हाथ जोड़ लेंगे। कह देंगे- मदन, यह काम उनसे न होगा। उन्हें क्षमा करो। वैसे वह गोष्ठी में उपस्थित हो जाएंगे। ज़रूरत होगी तो चर्चा में हिस्सा भी लेंगे। पर पर्चा लिख पाना उनके लिए संभव न होगा। और... वह कोई आलोचक या समीक्षक भी तो नहीं हैं...&lt;br /&gt;क्या इतना ही सब कुछ था उनके भीतर ?&lt;br /&gt;भीतर से उठे इस प्रश्न से वह बच नहीं पाए। उन्हें अपने आपको टटोलना पड़ा। हाँ, केवल यही बातें ज़हन में नहीं थीं। कुछ और भी था। एक अहं भी। लब्ध-प्रतिष्ठित कथाकार करुणाकर को हिंदी साहित्य में कौन नहीं जानता ? दो सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैं उन्होंने। दस कहानी संग्रह और छह उपन्यास छप चुके हैं उनके अब तक ! उन जैसा वरिष्ठ लेखक एक नवोदित लेखक की कहानियों पर गोष्ठी में पढ़ने के लिए पर्चा लिखे ! यही काम रह गया है क्या ? इससे अधिक तकलीफ़ उन्हें गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे शख्स यानी डॉ. भुवन से थी। डॉ. भुवन के पिछले इतिहास को करुणाकर बखूबी जानते थे। डॉ. भुवन की साहित्य में देन ही क्या है ? अवसरवादिता उनमें कूट कूटकर भरी है। चाटुकारिता और तिकड़मों के बल पर यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग के हैड और कुछेक पुरस्कार और सलाहकार समितियों के सदस्य बने बैठें हैं। उस पर दंभ यह कि उनसे बड़ा साहित्यकार, विद्वान कोई है ही नहीं।... वह ऐसे व्यक्ति की अध्यक्षता में एक नए लेखक की पुस्तक पर पर्चा पढ़ेंगे ?... नहीं... लोगों को कहने का अवसर मिलेगा कि करुणाकर चुक गया है इसलिए अब आलेख पाठों पर उतर आया है।&lt;br /&gt;गोष्ठियों में जाना वह वैसे भी पसंद नहीं करते अब। पिछले दो-तीन बरसों से तो गोष्ठियों में आना-जाना छोड़ ही रखा है। तीन दशकों की अपनी साहित्यिक यात्रा में उन्होंने इन गोष्ठियों को बहुत करीब से देखा है। पूर्वाग्रहयुक्त चर्चा होती है वहाँ या फिर उखाड़ने-जमाने की राजनीति ! अधिकांश वक्ता तो लेखक की पूरी पुस्तक पढ़ कर ही नहीं आते और बोलते ऐसे है जैसे उनसे बड़ा विद्वान या साहित्य पारखी है ही नहीं। एक गुट का लेखक दूसरे गुट के लेखक को नीचा दिखलाने की कोशिश में रहता है। रचना पर बात न होकर, रचनाकार पर बातें होने लगती हैं। रचना पीछे छूट जाती है और रचनाकार आगे आ जाता है।&lt;br /&gt;ये तमाम बातें थीं जो उनके दिमाग में घूम रही थीं- चक्करघिन्नी-सी। पत्नी को भी वह अपना निर्णय बता चुके थे। पत्नी की राय इस पर भिन्न थी। उनका मत था कि अगर वह मदन की पुस्तक पर पर्चा नहीं लिखना चाहते हैं तो वह कोई बहाना बना दें। कह दें कि वह बहुत व्यस्त हैं। गोष्ठी में नहीं पहुँच सकते। या फिर कह दें कि उन्हें कहीं और जाना है उस दिन।&lt;br /&gt;वह पत्नी की राय से सहमत नहीं हुए। बोले, ''बहाना क्यों बनाऊँ ? स्पष्ट कह देने में क्या हर्ज़ है ?... पर्चा लिखने के लिए मैं ही रह गया हूँ क्या ?... बहुत मिल जाएंगे जो खुशी-खुशी पर्चा लिखने को राजी हो जाएंगे।''&lt;br /&gt;लेकिन क्या वह स्पष्ट मना कर पाए ?... नहीं। वह ऐसा चाहकर भी नहीं कर पाए। मदन आया। आते ही उसने चरण-स्पर्श किए। उनके ही नहीं, उनकी पत्नी के भी। बैठने के पश्चात् झोले में से निमंत्रण पत्र का 'प्रूफ' निकालते हुए वह बोला, ''भाई साहब, मैंने आपका नाम साधिकार आलेख पाठ में दे दिया है। यह देखिए।'' और निमंत्रण-पत्र का प्रूफ उनकी ओर बढ़ा दिया।&lt;br /&gt;''लेकिन, मदन...'' वह अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाए थे कि मदन बीच में ही बोल उठा, ''देखिए भाई साहब ! एक ही जनपद के होने के नाते मुझ छोटे भाई को इतना अधिकार तो आप देंगे ही, मुझे पूरा विश्वास है। आप तो जानते ही हैं, गोष्ठियों में लोग किस पूर्वाग्रह से बोलते हैं। नए लोगों को तो बढ़ते देख ही नहीं सकते। एक आप ही हैं जो कृति को पूरा पढ़कर बोलते हैं। नए लोगों के प्रति आपके हृदय में जो स्नेह है, जो भावना है, वह आज कितने अग्रज और वरिष्ठ लेखकों में है ? कहिए...''&lt;br /&gt;करुणाकर इस पर निरुत्तर हो गए।&lt;br /&gt;थोड़ा रुककर मदन उनकी पत्नी की ओर देखते हुए बोला, ''भाभी जी, हम तो भाई साहब को ही अपना गुरू माने हैं। कॉलेज टाइम से ही इनकी कहानियों के फैन रहे हैं हम। एक कथाकार जो गत तीन दशकों से निरंतर लिख रहा है, वह नए लेखक की कहानियों पर कुछ लिखे, यह तो नए लेखक को अपना सौभाग्य ही समझना चाहिए न ! क्यों भाभी जी ?'' बात की पुष्टि के लिए मदन ने उनकी पत्नी के चेहरे पर अपनी दृष्टि कुछेक पल के लिए स्थिर कर दी। लेकिन प्रत्युत्तर में जब वह चुप रहीं, कुछ बोली नहीं तो उसने अपनी नज़रें वहाँ से हटा लीं।&lt;br /&gt;मदन के आने से पूर्व उसके भीतर क्या कुछ उमड़-घुमड़ रहा था। लेकिन अब मौन धारण किए बैठे थे वह। मदन ही बोले जा रहा था और वह सुन रहे थे चुपचाप।&lt;br /&gt;''अब देखिए न, यह जो संस्था है न, जो मेरी पुस्तक पर गोष्ठी करवा रही है, उसके सचिव महोदय निमंत्रण-पत्र का मसौदा देखकर बोले कि भाई इसमें से कुछ नाम हटा दो।... तो भाई साहब, हमने भी स्पष्ट कर दिया कि चाहे कोई नाम उड़ा दो, पर करुणाकर जी का नाम नहीं हटने देंगे। चाहे गोष्ठी हो, चाहे न हो।''&lt;br /&gt;इस बीच उनकी पत्नी उठकर रसोईघर में चली गईं- चाय का पानी रखने। वह चाय बनाकर लाईं तो मदन फिर शुरू हो गया, ''भाई साहब, गाड़ी का भी इंतज़ाम हो गया है। आपको ले भी जाएगी और छोड़ भी जाएगी।''&lt;br /&gt;''अरे, नहीं मदन। मैं आ जाऊँगा...।'' बहुत देर की चुप्पी के बाद वह बोल पाए।&lt;br /&gt;''नहीं भाई साहब ! गाड़ी का इंतज़ाम तो मैंने कर लिया है। बस, आप तैयार रहिएगा। कहाँ बसों में धक्के खाइएगा आप ?''&lt;br /&gt;कुछ देर बाद, मदन हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ जाने के लिए। सहसा, उसे कुछ स्मरण हो आया। रुककर बोला, ''गोष्ठी के पश्चात् अपना आलेख मुझे दे दीजिएगा। 'साहित्य सरोकार' में छपने के लिए सुरेंद्र को दे दूँगा।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात का खाना खाने के बाद वह मदन की पुस्तक लेकर बैठ गए। पुस्तक दो-तीन दिन पहले ही मिल गई थी, इस सूचना के साथ कि इस पर उन्हें आलेख पाठ करना है। लेकिन, सिवाय उलट-पलटकर देखने के वह एक भी कहानी नहीं पढ़ पाए थे। अब तो पर्चा लिखना था !&lt;br /&gt;पुस्तक पढ़कर करुणाकर बेहद निराश हुए। दो-एक कहानियों को छोड़कर कोई भी कहानी उन्हें छू नहीं पाई। लेखक ने अपने कहानियों में कोई नई बात नहीं कही थी। जो कथ्य उठाए गए थे, उन्हें पूर्ववर्ती लेखक पहले ही बहुत खूबसूरत ढंग से उठा चुके थे। कहानियाँ आज की कहानीधारा में कहीं भी टिकती नज़र नहीं आई उन्हें। किसी-किसी कहानी में शिल्प को लेकर उन्हें लगा, मानो लेखक ने अनावश्यक कुश्ती की हो। जिन दो-एक कहानियों ने उन्हें छुआ था, वे अपने अंत को लेकर कुछ मार्मिक हो गई थीं किंतु अपनी बुनावट में पठनीय कम, बोझिल अधिक लगीं उन्हें।&lt;br /&gt;दो-एक दिन असमंजस और दुविधा की स्थिति में रहे वह। फिर, एकाएक उन्होंने निर्णय ले लिया, ''क्या ज़रूरी है कि एक कमजोर किताब पर मेहनत की जाए ?... नहीं, वह पर्चा नहीं लिखेंगे।''&lt;br /&gt;पत्नी का कहना दूसरा था। उनके विचार में उन्हें एक बार वायदा कर लेने के बाद पर्चा अवश्य लिखना चाहिए। उसने अपना मत दिया, ''कहानियाँ आपको जैसी भी लगी हैं, आप वैसा ही लिखिए। खराब तो खराब, अच्छी तो अच्छी ! अब आप नहीं लिखेंगे तो मदन को बुरा लगेगा। कितना आदर करता है वह आपका !''&lt;br /&gt;उन्होंने अपने निर्णय पर पुन: विचार किया। उन्हें लगा, पत्नी ठीक कहती है। उन्हें वैसा ही लिखना चाहिए, जैसी कहानियाँ उन्हें लगी हैं। इसमें लेखक का ही भला है। कहानी की समृद्ध परंपरा का उल्लेख करते हुए आज की कहानीधारा में मदन की कहानियों की पड़ताल करनी चाहिए उन्हें।&lt;br /&gt;और उन्होंने ऐसा ही किया। उन्होंने रचना को सामने रखने की कोशिश की, रचनाकार को नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोष्ठी के दिन वह तीन बजे ही तैयार होकर बैठ गए। गोष्ठी चार बजे से प्रारंभ होनी थी। साढ़े तीन तक गाड़ी को आ जाना चाहिए था। वह तब तक तैयार किए गए आलेख को एक बार बैठकर पढ़ने लगे। टाइपिंग में रहे गई अशुद्धियों को ठीक करते रहे। आलेख पांचेक पेज का हो गया था लेकिन उन्हें लगता था कि उन्होंने अपनी बात खुलकर आलेख में कह दी है। एक-एक कहानी के आर-आर गए थे वह।&lt;br /&gt;साढ़े तीन हो रहे थे और गाड़ी अभी तक नहीं आई थी। वह उठकर बाहर गेट तक देखने गए और फिर लौटकर कमरे में आकर बैठ गए। पन्द्रह मिनट और बीते तो उन्हें बेचैनी होने लगी।&lt;br /&gt;तभी, एक स्कूटर बाहर आकर रुका। एक दुबला-पतला-सा युवक अंदर आया और बोला, ''करुणाकर जी, मैं आपको लेने आया हूँ।''&lt;br /&gt;''गाड़ी का क्या हुआ ?'' उन्होंने पूछा।&lt;br /&gt;''गाड़ी अध्यक्ष जी को लेने गई है इसलिए मदन जी ने मुझे आपको लेने भेज दिया। चलिए, चलें। देर हो रही है।''&lt;br /&gt;उन्होंने अपना झोला उठाया और स्कूटर के पीछे बैठ गए। चार बज चुके थे लेकिन धूप में अभी भी तेजी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोष्ठी निर्धारित समय से एक घंटा देर से आरंभ हुई, अध्यक्ष के आ जाने पर। गाड़ी से डॉ. भुवन के साथ मदन भी उतरा- प्रसन्नचित-सा।&lt;br /&gt;पहला पर्चा करुणाकर जी का ही था। पर्चा पढ़ने में उन्हें कोई पन्द्रह मिनट लगे। कुछ मिलाकर उनके पर्चे का सार यह था कि अपने समग्र प्रभाव में संग्रह की कहानियाँ पाठक को प्रभावित करने में असमर्थ हैं। कहानियाँ एकरस और ऊबाऊ तो हैं ही, लेखक के सीमित अनुभव-संसार का भी परिचय कराती हैं। यथार्थ को पकड़ने वाली लेखकीय दृष्टि, जीवन और समाज सापेक्ष नहीं है। कथ्यों में विविधता का अभाव है और भाषा व शिल्प के स्तर पर संग्रह की कहानियाँ बेहद कमजोर हैं। कई कहानियाँ अपनी सरंचना तक में बिखर गई हैं और वे बेहद अप्रासंगिक भी लगती हैं। गत तीन-चार वर्षों में लिखी गई इन कहानियों को पढ़ते समय लेखक की लेखनी में कोई क्रमिक विकास या बदलाव दृष्टिगोचर नहीं होता बल्कि सभी कहानियाँ फार्मूलाबद्ध और एक ही ढर्रे पर लिखी कहानियाँ लगती हैं। कुछ मिला कर नए लेखक का यह पहला संग्रह लेखक के प्रति कोई उम्मीद नहीं जगाता। अंत में, अपने पर्चे में उन्होंने आशा व्यक्त की थी कि लेखक आने वाले समय में अपने अनुभव को व्यापक बनाएगा और बेहतर कहानियाँ लेकर ही पाठकों के समक्ष उपस्थित होगा।&lt;br /&gt;दूसरा पर्चा कु. गीतांजलि का था। अपने पर्चे में गीतांजलि ने करुणाकर के पर्चे के ठीक उलट बातें लिखी थीं। लेखक की कहानियों को प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ते हुए यह सिध्द करने की कोशिश की थी कि लेखक अपने समाज, अपने परिवेश से कहीं गहरे जुड़ा है और वह जीवन के जटिल से जटिलतर होते जाते यथार्थ को ईमानदाराना ढंग से अभिव्यक्ति प्रदान करने में समर्थ हुआ है। कहानियों को बेहद पठनीय बताते हए गीतांजलि ने रेखांकित करने की चेष्टा की थी कि लेखक अपने &lt;span class=""&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYJLU8gI4I/AAAAAAAAAFg/wn1ahKVvUKE/s1600-h/2867657548_c820a95781_m.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284421302971540354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 155px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYJLU8gI4I/AAAAAAAAAFg/wn1ahKVvUKE/s200/2867657548_c820a95781_m.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;पहले&lt;/span&gt; ही संग्रह से नए कहानीकारों में एक अलग ही पहचान बनाता दीखता है।&lt;br /&gt;करुणाकर पर्चे को सुनकर दंग रह गए। वह लेखक की कहानियों पर पर्चा था कि लेखक का आँख मूंदकर स्तुतिगान ! कहानियों को श्रेष्ठ बताने के पीछे जो तर्क दिए गए थे, वे बेहद बचकाने और पोपले लगे।&lt;br /&gt;आलेख-पाठ के बाद चर्चा का दौर आरंभ हुआ। वक्ताओं की सूची में पहला नाम डॉ. वर्मा का था जो मूलत: कवि थे लेकिन आलोचना में भी खासा दख़ल रखते थे। डॉ. वर्मा ने गीतांजलि के पर्चे पर अपनी सहमति प्रकट करते हुए दो-चार बातें कहानीकार और उसकी कहानियों के पक्ष में और जोड़ीं और आग्रह किया कि इन कहानियों को वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए। लेखक को बदलते परिवेश के प्रति जागरूक और सचेत बताते हुए डॉ.वर्मा ने जोर देकर कहा कि लेखक अपनी कहानियों के जरिए यथार्थ की तहों तक पहुँचने की कोशिश करता हुआ दिखाई देता है। कहानियाँ पठनीय ही नहीं, प्रामाणिक और विश्वसनीय भी हैं और पाठकों को बाँधे रखने तथा उन्हें कहीं गहरे तक छूने में समर्थ हैं। अंत में करुणाकर के पर्चे को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि बड़े और स्थापित लेखकों को नए लेखकों के प्रति संकीर्ण और संकुचित नज़रिया नहीं रखना चाहिए।&lt;br /&gt;चर्चा के दौरान, हर चर्चाकार ने करुणाकर के पर्चे को एक सिरे से खारिज किया और मदन की कहानियों को श्रेष्ठ बताया। कई वक्ताओं ने तो यहाँ तक कहा कि करुणाकर जी ने कहानी को लेकर जो पैमाना बना रखा है, उसी पैमाने से वह सभी की कहानियों को नापने की कोशिश करते हैं। यही वजह है कि उन्हें दूसरों की कहानियाँ कमजोर और खराब लगती हैं। एक अन्य वक्ता का विचार था कि करुणाकर जी ने जिन मापदंडों की अपने पर्चे में चर्चा की है, उनकी अपनी कहानियाँ उन पर पूरी नहीं उतरतीं तो फिर नए लेखक से वह क्या आशा कर सकते हैं... एक वक्ता का कथन था कि कितने आश्चर्य की बात है कि एक लेखक अपनी तीन दशकों की कथा-यात्रा में कोई क्रमिक विकास कता दिखाई नहीं देता, वही लेखक कैसे किसी नए लेखक की दो तीन वर्षों के दौरान लिखी गई कहानियों में क्रमिक विकास तलाशने लगता है।&lt;br /&gt;सारी चर्चा लेखक की कहानियों पर न होकर करुणाकर के पर्चे के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह गई थी। हर चर्चाकार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में उनके पर्चे की कड़ी आलोचना कर रहा था। लगता था, गोष्ठी कहानी-संग्रह पर न होकर करुणाकर के पर्चे पर रखी गई हो।&lt;br /&gt;तभी एक वक्ता ने बोलने की अनुमति मांगी। करुणाकर ने उसकी ओर देखा और चौंक पड़े- अरे, यह तो अरुण है। एक ज़माना था, दोनों धुऑंधार लिख रहे थे और छप रहे थे। दोनों में कहानी लिखने की होड़ लगी रहती थी। दोनों कहानियों पर जमकर घंटों बहस करते थे। अरुण कह रहा था, ''मुझे अफ़सोस है कि मेरे पूर्ववर्ती वक्ता लेखक की कहानियों पर न बोलकर व्यक्तिगत छींटाकशी और आरोप आद लगाने में ही अपना समय बर्बाद करते रहे। कहानियों पर शायद वे बोल ही नहीं सकते थे। मेरे पास लेखक की पुस्तक नहीं थी, सिर्फ़ गोष्ठी की सूचना अख़बार में पढ़कर चला आया था। अत: मदन की कहानियों पर राय तो नहीं दे सकता, पर हाँ, यहाँ यह अवश्य कहना चाहूँगा कि किसी कहानी या रचना पर सभी एकमत हों, संभव नहीं है। फिर भी, किसी के मत तथा विचार से असहमति यदि कोई रखता है तो उसे अपनी असहमति शालीन ढंग से उचित और ठोस तर्क देकर ही व्यक्त करनी चाहिए और एक साहित्यिक गोष्ठी की गरिमा को बनाए रखना चाहिए।''&lt;br /&gt;अरुण के बाद कोई वक्त शेष नहीं रहा था।&lt;br /&gt;अध्यक्ष महोदय ने लेखक को उसकी पहली कथाकृति के प्रकाशन पर बधाई और आशीर्वाद दिया तथा कहा कि लेखक की कहानियाँ इस बात का प्रमाण है कि वह अपने समय और समाज के प्रति बेहद जागरूक है। लेखक में एक समर्थ कथाकार की पूरी संभावनाएँ निहित हैं। करुणाकर के पर्चे का उल्लेख किए बिना उन्होंने कहा कि कुछ वरिष्ठ लेखक नए लेखकों की कहानियों पर बोलते हुए यह भूल जाते हैं कि वह भी कभी नए थे। नए लेखक की पहली कृति में ही वह सभी कुछ पाना चाहते हैं जो वे अपने पूरे लेखन में नहीं दे पाते। उनकी मंशा नए लेखक को उत्साहित और प्रेरित करने की नहीं, वरन निरुत्साहित करने की अधिक होती है। किंतु एक नए और समर्थ लेखक को ऐसी आलोचना की चिंता न करते हुए सतत रचनाशील रहना चाहिए।&lt;br /&gt;गोष्ठी की समाप्ति पर जलपान की व्यवस्था की गई थी। सभी दो-दो, तीन-तीन के ग्रुप में इधर-उधर&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYIDq_NBzI/AAAAAAAAAFY/xlF5BP0oH78/s1600-h/3067909130_54aabd1935_m[1].jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5284420071937869618" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 131px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_QdyvfN0Pgjk/SVYIDq_NBzI/AAAAAAAAAFY/xlF5BP0oH78/s200/3067909130_54aabd1935_m%5B1%5D.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; छिटककर खड़े हो गए थे और आपस में बातें करने लगे थे।&lt;br /&gt;अरुण और करुणाकर एक कोने में खड़े थे। कई वर्षों के बाद मिले थे दोनों। इस समय उनकी बातचीत का विषय डॉ. भुवन थे।&lt;br /&gt;''तुम्हें मालूम है करुणाकर, डॉ. भुवन पर अभिनंदन ग्रंथ छापने की योजना चल रही है।'' चाय का घूंट भरते हुए अरुण ने फुसफुसाते हुए कहा।&lt;br /&gt;''हाँ, अब यही तो रह गया है।''&lt;br /&gt;''और उस योजना में मदन जैसे लोग सक्रियता से जुड़े हैं।''&lt;br /&gt;''अपने पीछे शिष्यों की भीड़ जुटाए रखना और उन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना तो इन्हें खूब आता है, अरुण।'' करुणाकर ने खाली प्याला एक ओर रखते हुए कहा।&lt;br /&gt;एकाएक उनकी दृष्टि कुछ दूरी पर खड़े मदन और गीतांजलि पर चली गई। समीप ही, 'साहित्य सरोकार' का संपादक सुरेंद्र खड़ा था।&lt;br /&gt;''बहुत अच्छा पर्चा लिखा आपने।'' सुरेंद्र गीतांजलि की तारीफ़ कर रहा था।&lt;br /&gt;''जी शुक्रिया !'' गीतांजलि ने मंद-मंद मुस्कराते हुए कहा।&lt;br /&gt;''ये कहानियाँ भी बहुत अच्छी लिखती हैं। अभी हाल ही में इनकी एक बेहद अच्छी कहानी 'सत्ययुग' में छपी है। पढ़ी होगी आपने ?'' मदन बीच में ही बोल उठा।&lt;br /&gt;''नहीं, नहीं पढ़ पाया। 'सत्ययुग' देखता नहीं इन दिनों।'' सुरेंद्र ने उत्तर दिया, ''आप 'साहित्य सरोकार' के लिए कहानी भेजिए न।''&lt;br /&gt;''कहानी भी भेज देंगी। पहले आप इनका यह पर्चा तो छापिए, 'साहित्य सरोकार' में।'' मदन ने गीतांजलि को बोलने का अवसर ही नहीं दिया।&lt;br /&gt;''ज़रूर छापूंगा। पर्चे की एक कॉपी और पुस्तक की एक प्रति भिजवा देना।''&lt;br /&gt;तभी मदन को डॉ. भुवन ने बुला लिया, ''अच्छा मदन, हम चलें।''&lt;br /&gt;मदन उन्हें गाड़ी तक ले गया। डॉ. भुवन का बायां हाथ मदन के कंधे पर था। गाड़ी में बैठने से पूर्व वह बोले, ''मदन, तुमने अपनी पुस्तक 'साहित्य श्री' पुरस्कार के लिए सबमिट की या नहीं ?''&lt;br /&gt;''जी, अभी नहीं की।''&lt;br /&gt;''कब करोगे भाई। अंतिम तिथि में बस पाँच-छह दिन ही तो शेष हैं। आज कल में सबमिट कर दो। अरे भई, तुम युवाओं के लिए ही यह पुरस्कार है। तुम लोग नहीं करोगे तो क्या हम बूढ़े करेंगे ?''&lt;br /&gt;डॉ. भुवन को विदा कर जब मदन लौटा तो उसकी नज़र एक कोने में खड़े करुणाकर पर पड़ी। वह उनके समीप जाकर बोला, ''आप कुछ देर रुकिएगा भाई साहब... गाड़ी अभी दस-पन्द्रह मिनट में लौटेगी तो आपको...''&lt;br /&gt;''नहीं भाई, मेरी चिंता छोड़ो। मैं चला जाऊँगा।'' करुणाकर जी का स्वर ठंडा था।&lt;br /&gt;''ऐसे कैसे हो सकता है, भाई साहब !'' मदन ने जोर देकर उन्हें रोकने का प्रयत्न किया। तभी समीप खड़ा अरुण बोला, ''करुणाकर, तुम बात खत्म करके आओ। मैं बाहर सिगरेट लेता हूँ तब तक।'' और वह वहाँ से हट गया।&lt;br /&gt;''थोड़ी ही देर की बात है, भाई साहब।'' अरुण के जाते ही मदन फिर करुणाकर जी को मनाने लगा।&lt;br /&gt;''नहीं, नहीं जब तब गाड़ी का इंतज़ार करूँगा तब तक तो बस भी मिल जाएगी मुझे। तुम चिंता न करो, अरुण मेरे साथ है। चढ़ा देगा बस में।'' कहते हुए वह धीमे-धीमे उस ओर डग भरने लगे जिस ओर अरुण गया था।&lt;br /&gt;उनके हटते हुए मदन को कुछ लोगों ने घेर लिया था और उसे गोष्ठी के सफल होने की बधाइयाँ देने लगे थे।&lt;br /&gt;00&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( &lt;span style="color:#cc0000;"&gt;&lt;strong&gt;मेधा बुक्स, दिल्ली&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; से वर्ष 2003 में प्रकाशित कहानी संग्रह &lt;span style="color:#3333ff;"&gt;&lt;strong&gt;''औरत होने का गुनाह''&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; में संग्रहित )&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3083653920912210863-6900931163229414199?l=srijanyatra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://srijanyatra.blogspot.com/feeds/6900931163229414199/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3083653920912210863&amp;postID=6900931163229414199&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6900931163229414199'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3083653920912210863/posts/default/6900931163229414199'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://srijanyatra.blogspot.com/2008/12/13.html' title='कहानी-13'/><author><name>सुभाष नीरव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/06327767362864234960</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='30' height='32' src='http://bp1.blogger.com/_QdyvfN0Pgjk/SCHi9tm41DI/AAAAAAAAAAM/b5f453jNxas/S220/Neerav+photo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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style="color:#3333ff;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;सुभाष नीरव&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"री, लक्खे तरखान के तो भाग खुल गए।"&lt;br /&gt;"कौण?... ओही सप्पां दा वैरी?"&lt;br /&gt;"हाँ, वही। साँपों का दुश्मन लक्खा सिंह।"&lt;br /&gt;"पर, बात क्या हुई?"&lt;br /&gt;"अरी, कल तक उस गरीब को कोई पूछता नहीं था। आज सोहणी नौकरी और सोहणी बीवी है उसके पास। बीवी भी ऐसी कि हाथ लगाए मैली हो।"&lt;br /&gt;जहाँ गाँव की चार स्त्रियाँ इकट्ठा होतीं, लक्खा सिंह तरखान की किस्मत का किस्सा छेड़ बैठतीं। उधर गाँव के बूढ़े - जवान मर्द भी कहाँ पीछे थे। उनकी ज‍़बान पर भी आजकल लक्खा ही लक्खा था।&lt;br /&gt;"भई बख्तावर, लक्खा सिंह की तो लाटरी खुल गई। दोनों हाथों में लड्डू लिए घूमता है।"&lt;br /&gt;"कौन?... बिशने तरखान का लड़का? साँपों को देखकर जो पागल हो उठता है...।"&lt;br /&gt;"हाँ, वही।"&lt;br /&gt;"रब्ब भी जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है। कल तक यही लक्खा रोटी के लिए अन्न और चूल्हा जलाने के लिए रन्न(बीवी) को तरसता था।"&lt;br /&gt;"हाँ भई, किस्मत के 
