सोमवार, 23 जून 2008

कहानी–7




उसकी भागीदारी
सुभाष नीरव
चित्र : अवधेश मिश्र

मुझे यहाँ आए एक रात और एक दिन हो चुका था। पिताजी के सीरियस होने का तार पाते ही मैं दौड़ा चला आया था। रास्ते भर अजीब-अजीब से ख़याल मुझे आते और डराते रहे थे। मुझे उम्मीद थी कि मेरे पहुँचने तक बड़े भैया किशन और मंझले भैया राज दोनों पहुँच चुके होंगे। पर वे अभी तक नहीं पहुँचे थे जबकि तार अम्मा ने तीनों को एक ही दिन, एक ही समय दिया था। वे दोनों यहाँ से रहते भी नज़दीक ही है। उन्हें तो मुझसे पहले यहाँ पहुँच जाना चाहिए था। रह-रहकर यही सब बातें मेरे जे़हन में उठ रही थीं और मुझे बेचैन कर रही थीं। मैं जब से यहाँ आया था, एक-एक पल उनकी प्रतीक्षा में काट चुका था। बार-बार मेरी आँखें स्वत: ही दरवाजे की ओर उठ जाती थीं। मुझे तो ऐसे मौकों का ज़रा-भी अनुभव नहीं था। कहीं कुछ हो गया तो मैं अकेला क्या करूँगा, यही भय और दुश्चिंता मेरे भीतर रह-रहकर साँप की तरह फन उठा रही थी।
पिताजी की हालत में रत्तीभर भी सुधार नहीं था। कल शाम जब से मैं आया हूँ, उन्हें मैं नीम-बेहोशी में ही देख रहा हूँ। अम्मा ने बताया था कि मेरे आने से चार-पाँच घंटे पहले तक तो उन्होंने दवा वगैरह ली थी। टट्टी-पेशाब भी किया था। शरीर में हरकत थी। किन्तु, उसके बाद से न तो आँखें खोली हैं, न ही हिले-डुले हैं। अम्मा कई बार उनका पायजामा वैगरह भी देख चुकी है। टट्टी-पेशाब तक लगता है, बन्द हो गया है। अम्मा अब बेहद घबराई हुई-सी थीं। उनसे कहीं अधिक मैं घबरा रहा था।
पिताजी को हिला-डुलाकर बात करने की मेरी कोशिशें बेकार रही थीं। सारा दिन मैं उनके पास बैठा रहा था। बैठे-बैठे कभी लगता, अभी पिताजी करवट लेंगे। कभी लगता, अभी उनके होंठ हिलेंगे... कभी लगता, वे गर्दन हिलाने की कोशिश कर रहे हैं... पर, ऐसा मुझे लगता था, होता कुछ नहीं था।
पूरे घर में सन्नाटे की एक चादर तनी थी। एक दुश्चिंता और चुप्पी की गिरफ्त में हम सब बुरी तरह जकड़े हुए थे। हम लोग आपस में बातें भी करते थे, तो लगता था, फुसफुसा रहे हों। गले से आवाज़ खुलकर निकल ही नहीं रही थी। छोटी बहन पिंकी और छोटा भाई विक्की कल से ही मुझसे बहुत कम बोले थे। उनके चेहरे पर चुप्पियाँ चस्पाँ थीं। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि विक्की जैसा शरारती बालक इतना शान्त और खामोश कैसे रह सकता है ! उसे तो उठते-बैठते, खाते-पीते बस शरारत ही सूझती थी।
हम चुप थे। हमारा एक-एक पल भय और घबराहट में बीत रहा था।
घड़ी ने शाम के छह बजाए तो मैं पिताजी के पास से उठकर दूसरे कमरे में आ गया। विक्की कोई किताब पढ़ रहा था चुपचाप। पिंकी किसी पुराने कपड़े पर कढ़ाई कर रही थी।
बहर, गली में बच्चे खेल रहे थे। हल्का-हल्का शोर खुली खिड़की से कूदकर अन्दर आ रहा था। शायद आइस-पाइस या छुपा-छिपी का खेल था। कभी-कभी कोई बच्चा हमारे घर से लगे जीने के नीचे छुप जाता था। दूसरा बच्चा उसे ढूँढ़ते हुए जब वहाँ पहुँचता तो शोर तेज हो उठता और हमारे घर में सन्नाटे की तनी हुई चादर हिलने लगती।
एक-दो बार अम्मा बाहर निकलकर शोर न करने का इशारा कर आई थीं लेकिन बच्चे तो आखिर बच्चे थे। थोड़ी देर बाद ही उनका शोर फिर सुनाई दे जाता। इस बार अम्मा ने झल्लाकर उन्हें डपट दिया था, “तुमसे कहा न, यहाँ शोर न करो... जाओ, दूर जाकर खेलो। अब इधर आए तो...।” और उन्होंने खुली हुई खिड़की बन्द कर दी थी।
अम्मा की डांट सुनकर बच्चे चुपचाप खिसक गए थे। अब, घर के बाहर और भीतर दोनों तरफ एक चुप्पी ही चुप्पी थी।
मेरी पीठ में अब दर्द होना आरंभ हो गया था और मुझे नींद भी आ रही थी। एक रात और एक दिन बैठे-बैठे गुजारना... और उससे पहले एक दिन का रेल का सफ़र! थकावट होना तो लाजि़मी था। मैं कुर्सी पर अधलेटा-सा होकर पसर गया। मुझे यूँ अधलेटा-सा देखकर अम्मा बोली– “थक गया होगा तू भी। थोड़ी देर लेट जा, कमर सीधी हो जाएगी।”
अम्मा बहुत पास से बोल रही थीं लेकिन उनकी आवाज़ मुझे बहुत दूर से आती लग रही थी। थकी-थकी-सी। मैंने अम्मा की बात का कोई जवाब नहीं दिया। बस, दोनों हथेलियों से अपना मुँह ढंक कर मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करने लगा था।
तभी अम्मा ने पूछा, “चाय पियेगा, बनाऊँ ?”
“नहीं, इच्छा नहीं है।” मैं यह कहना चाहता था लेकिन कह नहीं पाया। होंठ हिले ही नहीं, जड़ से हो गए थे जैसे। बस, क्षणांश मैंने अम्मा की ओर नज़रें उठाकर देखा था। अपनी ओर मेरे देखते जाने को मेरी सहमति समझ कर वह चाय बनाने रसोई में चली गई थीं।
अब, धीरे-धीरे मेरे अन्दर कुछ खोल रहा था। धैर्य चुक रहा था और बेचैनी बढ़ने लगी थी। मुझे गुस्सा भी आ रहा था। अपने पर नहीं, किशन और राज भैया पर। अभी तक ये लोग नहीं आए ?... क्या इन्हें तार नहीं मिला ?... इस छोटे-से कस्बे में कोई अस्पताल तक नहीं है। बस, जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह उग हुए नर्सिंग-होम थे। जहाँ डाक्टर स्वयं चाहते हैं कि उनका मरीज जल्द ठीक न हो। उनके लिए डाक्टरी एक पेशा है, धन्धा है। पैसा कमाने का धन्धा! बस, यहाँ से आठ-दस मील दूर एक सरकारी अस्पताल है। दोनों बड़े भाई आ जाते तो पिताजी को वहीं ले जाते। पर, मैं अकेला... उन्हें ऐसी हालत में... सोचते ही मेरे तो पसीने छूटने लगते हैं।
अम्मा चाय ले आई थीं। चाय का प्याला लेते हुए मैं स्वयं पर नियंत्रण न रख सका। मैंने पूछा, “किशन और राज भैया को भी तो तार मिल चुका होगा। आए क्यों नहीं अब तक ?” मेरी आवाज़ में तल्ख़ी थी और उससे खीझ और गुस्से का रंग मिला हुआ था।
“जाने क्या बात है ? कोई बात होगी... तार पाकर रुकने वाले तो नहीं हैं। आते ही होंगे।” अम्मा पास बैठकर आहिस्ता-आहिस्ता बोल रही थीं, “आजकल घर-गृहस्थी छोड़कर एकदम निकलना भी तो नहीं होता।”
अम्मा की इस बात से मैं अन्दर तक कुढ़ गया था। ‘हुंह... निकलना नहीं होता या निकलना नहीं चाहते। क्या घर-गृहस्थी उन्हीं की है, मेरी नहीं ! सोनू के कल से पेपर शुरू हैं। निक्की और सुधा भी पिछले हफ्ते से ठीक नहीं हैं। फिर भी, मैं तार पाते ही दौड़ा चला आया। मेरे भीतर एक उठापटक मची थी लेकिन मैं इस उठापटक को शब्द नहीं दे पा रहा था। अम्मा मेरे सामने बैठी कुछ सोच रही थीं और मैं भीतर ही भीतर भुन रहा था।
दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं ठीक से होकर बैठ गया। पिंकी ने उठकर दरवाजा खोला। किशन और राज भैया में से कोई नहीं था। पड़ोस वाली रमा आंटी थीं। दिन में भी पड़ोस से इक्का-दुक्का लोग पिताजी का हाल पता करने आ चुके थे और अपनी-अपनी सलाह देकर चले गए थे। रमा आंटी ने कमरे में घुसते ही अम्मा को सम्बोधित करते हुए पूछा, “बहन जी, अब कैसी तबीयत है भाई साहब की ?”
“उसी तरह बेहोश पड़े हैं... आज तो हिल-डुल भी नहीं रहे। बस, रब्ब ही मालिक है।” कहते-कहते अम्मा की हिचकियाँ उभर आईं।
“धीरज रखो बहन, कुछ नहीं होगा। सब ठीक हो जाएगा। ऊपरवाले पर भरोसा रखो।” रमा आंटी अम्मा का कन्धा थपथपाकर उन्हें धीरज बंधाने लगीं, अब ता ब्रज भी आ गया है। किशन और राज भी आते ही हों। अब सम्हाल लेंगे। दिल थोड़ा न करो। हिम्मत रखो।
कुछ देर असम्वाद की स्थिति रही। अम्मा फर्श की ओर टकटकी लगाए देखती रहीं और मैं हथेलियाँ बगल में दबाये अपने को बेहद संजीदा दर्शाने की कोशिश करता रहा। रमा आंटी लगता था, अगली बात के लिए शब्द ढूँढ़ रही थीं। एकाएक, दीवार घड़ी की ओर देखते हुए बोली, “आप लोगों ने खाना-वाना खाया कि नहीं। चलो, मैं बनाती हूँ। कब तक भूखे रहेंगे आप।... भाई साहब बीमार ही तो हैं। ठीक हो जाएंगे। ऐसे कोई खाना-पीना छोड़ देता है ?... आ बेटा ब्रज, मेरे यहाँ कुछ खा ले।”
मेरे जवाब की प्रतीक्षा न करते हुए वह विक्की और पिंकी की ओर मुखातिब होकर बोलीं, “चलो, तुम दोनों भी खा-पी लो।”
विक्की-पिंकी ने एकबारगी रमा आंटी की ओर देखा। फिर मेरी और अम्मा की ओर। हमारी ओर से कोई प्रतिक्रिया न पाकर वे चुपचाप अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए।
“अच्छा, मैं यहीं भिजवा देती हूँ।” हमारी चुप्पी को देखकर रमा आंटी बोलीं तो अम्मा के मुँह से बोल फूटे, “नहीं बहन, क्यूं तकलीफ करती हो। मेरा तो मन नहीं है। ब्रज और बच्चों के लिए दोपहर का ही पड़ा हुआ है। खा लेंगे ये।”
“अच्छा, मैं चलती हूँ। मेरी ज़रूरत पड़े तो बुला लेना, बहन।” कहती हुई रमा आंटी चली गईं। उनके आने पर हमारे घर की चुप्पियाँ जो थोड़ी देर के लिए कहीं दुबक गई थीं, उनके जाते ही उन्होंने फिर से पूरे घर को अपने शिकंजे में ले लिया था। थोड़ी देर बाद अम्मा पिताजी के कमरे की ओर चली गई थीं। मैंने फिर अपनी टांगें फैला ली थीं और आँखें मूंदकर सिर दीवार से लगा लिया था।

पिताजी के शान्त चेहरे पर हल्की-सी हरकत देखकर अम्मा ने मेरी ओर देखा है। हाँ, सचमुच पिताजी के चेहरे पर हल्की-सी हरकत हुई है। होंठों पर कम्पन साफ दीख रहा है। अम्मा उनके करीब होकर कहती है, “सुनिए, आँखें खोलिए... देखिए, ब्रज आया है। इससे नहीं मिलोगे ?”
मैं भी आगे बढ़कर पिताजी का कमजोर और बेजान-सा हाथ अपनी मुट्ठी में लेते हुए कहता हूँ, “मैं हूँ पिताजी... आपका ब्रज... ठीक है न आप...” पिताजी के काँपते होंठों से लगता है, वे कुछ कहना चाह रहे हैं। मैं आगे झुक कर कहता हूँ, “पिताजी, कुछ कहना चाहते हैं ?... कहिए, मैं हूँ न। आपका बेटा, ब्रज...।”
“कि...श...न... रा...ज...” अस्फुट शब्द हवा में तैरते हैं।
“वे भी आते ही होंगे।... आप...”
वे एकबार अम्मा की ओर देखते हैं, फिर धीमे से गर्दन घुमाकर मेरी ओर। टुकड़ा-टुकड़ा शब्द हवा में तैरते हैं, अपनी अम्मा की, छोटे भाई-बहन की देखभाल करना बेटा... इन्हें तुम्हारे आसरे ही... बमुश्किल से बोले गए शब्द अधबीच में ही अपनी यात्रा खत्म कर देते हैं। और फिर, अम्मा रोने लगती हैं, मुँह में साड़ी का पल्लू दबाकर। मैं भीतर से काँपता हुआ भयभीत-सा ढाढ़स बँधाता हूँ, आप चिन्ता न करें... आपको कुछ नहीं होगा। लेकिन, अगले ही क्षण हो जाता है। पिताजी की गर्दन एक ओर... अम्मा की चीख निकल जाती है। पिंकी-विक्की रोना-चिल्लाना आरंभ कर देते हैं। घर में तनी सन्नाटे की चादर तार-तार हो जाती है। मेरे पांवों के नीचे से ज़मीन खिसकने लगती है। अब क्या होगा ! मैं अकेला...घबराहट से मेरा पूरा शरीर काँपने लगता है। खुद को असहाय पाकर मैं भी फूट-फूटकर रोने लगता हूँ।
तभी, मेरी नींद टूट जाती है। पास ही खड़ी अम्मा मुझे कन्धे से हिला रही थी, “ब्रज... ब्रज बेटा सो गया क्या ?... चल, बिस्तर लगा दिया है, लेट जा। मैं बैठती हूँ उनके पास। सो ले, कल रात से तू सोया नहीं।”
मैं चुपचाप उठा था और कपड़े बदलने लगा था।

सोने से पहले मैं एक बार पिताजी के कमरे में गया। वे उसी तरह बेहरकत लेटे हुए थे। अम्मा ने बताया कि उन्होंने चम्मच से दवा पिलानी चाही थी लेकिन दवा गले से उतरी ही नहीं।
“डॉक्टर को बुला लाऊँ ?” मैंने अम्मा से पूछा था।
“इस समय वह बुलाने से भी नहीं आएगा। सुबह अपने आप आ जाएगा। फिर भी तेरी मर्जी।”
मैंने साइकिल उठाई थी और उन्हीं कपड़ों में डॉक्टर के घर पहुँच गया था। अम्मा की बात सही थी। उसने वही दवा देते रहने को कहकर मुझे लौटा दिया था। मैंने जाकर पिताजी की नब्ज़ एकबार देखी थी। वह चल रही थी, मन्द-मन्द। मैंने पायजामा टटोलकर देखा, गीला था। टाँगों पर से कम्बल हटाया तो बदबू का एक तेज भभका मेरे नथुनों में जबरन घुस गया। मैंने एकबारगी अम्मा को आवाज़ दी थी और फिर खुद ही उनका पायजामा बदलने लग गया था। अम्मा ने गीला पायजामा उठाया और बाथरूम में डाल आईं। आकर बोली, “तू थोड़ा सो ले ब्रज। देख, आँखें कैसी लाल हो रही हैं तेरी।”
अम्मा की बात पर मैं चुपचाप उठकर सोने चला गया था।
लेटते ही मुझे नींद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था और अगले दिन सुबह देर तक मैं सोता रहा था। अम्मा ने जब मुझे जगाया तो घड़ी में दस-पच्चीस हो रहे थे। मैंने उठते ही पिताजी के बारे में पूछा।
रात को उनके द्वारा दो बार कपड़े गन्दे करने की बात अम्मा ने मुझे बताई और बोली, “आठ बजे मैंने दवा दी थी। तू उठकर नहा-धो ले। नाश्ता कर ले और फिर ज़रा डाक्टर को बुला ला। रोज तो नौ बजे तक खुद आ जाता था, आज साढ़े दस होने को आए...।
नहा-धो कर नाश्ता करके डॉक्टर को बुलाने मैं जा ही रहा था कि किशन और राज भैया आ गए। अम्मा उन्हें देखकर रोने लगीं तो दोनों देर से पहुँचने का अपना-अपना स्पष्टीकरण देने लगे। किशन भैया सरकारी काम से बाहर गए थे। लौटे तो तार मिला और तभी चल दिए। राज भैया ने कहा, “तार पर उनका पता गलत था इसलिए तार देर से मिला। मिलते ही गाड़ी पकड़ ली।”
दोनों सीधे पिताजी के कमरे में चले गए थे। अम्मा के पीछे-पीछे मैं भी पिताजी के कमरे में घुसा। पिताजी वैसी ही बेहोशी की-सी हालत में लेटे हुए थे। किशन भैया ने उनका हाथ पकड़कर नब्ज़ देखी थी और फिर उनके ठण्डे हाथ को अपनी हथेलियों से मलकर गरमाने लगे थे। तभी, डॉक्टर आ गया था। किशन भैया ने डॉक्टर से बात की थी, उसे अलग ले जाकर। शहर के बड़े अस्पताल में ले जाने की बाबत भी पूछा था। “आप की मर्जी है, वैसे...” कहकर डॉक्टर ने बात हमारे ऊपर छोड़ दी थी। डॉक्टर ने इस बार दवा चेंज कर दी थी। मैं दवा लेने बाजार जाने लगा तो किशन भैया मुझे सौ का नोट थमाने लगे जिसे मैंने हल्की-सी न-नुकर के बाद ले लिया था और साइकिल दबा दी थी।

किशन भैया आते ही पिताजी की तीमारदारी में लग गए थे। कभी उनके कपड़े बदलते, कभी चम्मच से पानी पिलाते। कभी ठण्डे हाथ-पांवों को अपनी हथेलियों से गरमाने की कोशिश करते।
राज भैया जब से आए थे, कुछ सुस्त से लग रहे थे। वह कम बोल रहे थे। चेहरे से वह भी मेरी तरह भीतर से घबराये हुए लग रहे थे। अब मेरी घबराहट वैसे कुछ कम हो गई थी। किसी अनहोनी को अकेले फेस करने का तनाव अब मेरे मस्तिष्क में नहीं था। किशन भैया और राज भैया के आ जाने से मुझे भीतरी बल मिला था और लगा था, अब मुझे चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है। दोनों बड़े भैया सब कुछ सम्हाल लेंगे। वैसे भी, वे मुझसे अधिक अनुभवी थे। उनके रहते मैं कुछ हल्का-सा महसूस कर रहा था। विक्की और पिंकी में कोई फर्क नहीं आया था। बल्कि वे अब ज्यादा ही गम्भीर औ चुप दीख रहे थे।
बदली हुई दवा से पिताजी की हालत में हल्का-सा फर्क हुआ तो उसे मैंने ही नहीं, अम्मा ने भी चट से पकड़ लिया। पिताजी ने हिलकर करवट बदलने की कोशिश की थी। उनके होंठों से लग रहा था, वे कुछ कह रहे हैं, पर शब्द बेआवाज़ थे। पिताजी को कुछ नहीं होगा, अब यह धारणा धीरे-धीरे बलवती हो रही थी।
इस परिवर्तन में मेरे भीतर अब तक दबी, छुपी और कुलबुलाती बात को बाहर निकलने की हिम्मत बंधा दी थी। दरअसल, जिस रात से मैं यहाँ आया था, उसके अगले दिन से ही मैं सोच रहा था कि किशन भैया और राज भैया के आते ही मैं लौट जाऊँगा। दोनों बड़े भाई स्वयं सम्हाल लेंगे। मुझे अपनी बीमार पत्नी और बच्ची की चिन्ता सता रही थी। सोनू के होने वाले पेपर्स की फिक्र हो रही थी। आफिस से भी मुझे छुट्टी इसलिए मिली थी कि तार पहुँचा था। वरना... आजकल तो वैसे ही आडिट चल रहा है।
किशन भैया को दौड़-दौड़कर पिताजी की सेवा-सुश्रूशा करते देख मुझे उम्मीद होने लगी थी कि भैया अवश्य काफी दिनों की छुट्टी लेकर आए हैं। अब, जब तक पिताजी कुछ बेहतर स्थिति में नहीं आ जाते, वह नहीं जाएंगे। दोनों बड़े भाइयों का वैसे ही ऐसे समय में यहाँ रहना ज़रूरी है। जाने कब क्या हो जाए।
एकाएक, मुझे अपनी सोच पर ग्लानि होने लगी। क्या उन्हीं का रहना यहाँ ज़रूरी है?... उसका नहीं ?... लेकिन, अगले ही क्षण, लौटने की बात मेरे भीतर उछलकूद करने लगी और मैं अवसर की तलाश करने लग गया। अम्मा अधिक बात नहीं कर रही थी। मैं जब भी उन्हें अकेले पाकर अपने दिल की बात कहने की चेष्टा करता, मेरी जुबान को न जाने क्या हो जाता। जैसे उसे उस क्षण लकवा मार जाता हो! मुँह से कोई शब्द ही न फूटता।
किशन और राज भैया के सामने पड़ते ही मेरी हिम्मत जवाब दे जाती। दोपहर खाने के वक्त सोचा था, अपनी बात कह दूँगा। फिर सोचा, इतनी जल्दी ठीक नहीं रहेगा, शाम को कह दूँगा। रात नौ बजे की ट्रेन है, उसी से लौट जाऊँगा।
शाम के साढ़े चार का वक्त था, जब पिताजी को कुछ-कुछ होश आया था। उन्होंने मिचमिचाती आँखों से हम तीनों को देखा था। हाथों में हल्की-सी जुंबिश-सी हुई थी। शायद, वे हाथ उठाकर हमें प्यार देना चाह रहे थे।
बदली हुई दवा असर कर रही थी।
खतरे का अहसास धीरे-धीरे कम होता लग रहा था। पिंकी चाय बना लाई थी और हम सब दूसरे कमरे में बैठकर चाय पीने लगे थे। चाय पीते हुए मैंने भीतर ही भीतर तैयारी की। भूमिका-स्वरूप अपनी बात भी चलाई। मसलन, अब तो पिताजी की हालत में सुधार हो रहा है...घबराने की बात नहीं दीखती अब...। और जैसे, मुझे तीन दिन हो गए यहाँ आए। घर पर सुधा और बेटी निक्की भी ठीक नहीं। सोनू के कल से पेपर्स हो रहे होंगे... पता नहीं, क्या करके आता होगा... आदि।
मेरी इस बातचीत को कोई गम्भीरता से नहीं ले रहा था। बस, चुपचाप सुन रहे थे।
मैं एक पल सबके चेहरों की ओर देखता, फिर दिल की बात को दिल में ही दबा लेता। कभी-कभी मुझे लगता, बड़े भैया स्वयं ही कहेंगे, “ब्रज, अब मैं आ गया हूँ। सब सम्भाल लूँगा। तुम चाहो तो चले जाओ, सुधा अकेली होगी। ऐसी-वैसी बात होगी तो बुला लेंगे तुम्हें।”
अम्मा ने मुझे पिताजी के कमरे से आवाज़ दी तो मैं उठकर उनके पास चला गया। वह पिताजी के नीचे से चादर बदलना चाह रही थीं, बोलीं, “ज़रा इन्हें थोड़ा-सा ऊपर उठाना। मैं नीचे की चादर बदल दूँ।”
एकबारगी मैंने बड़े भैया को अपनी मदद के लिए बुलाना चाहा, पर अगले ही क्षण मैंने खुद ही पिताजी को अपनी दोनों बाजुओं में लेकर ऊपर उठा लिया था और अम्मा ने झट से उनके नीचे की चादर बदल दी थी।
अम्मा को अकेले पाकर मेरे भीतर कुछ हिलने-डुलने लगा था। अम्मा ने पिताजी पर कम्बल ओढ़ाया और पास बैठकर उनके पैर दबाने लगीं तो मेरे मुँह से निकला, “अम्मा !”
“क्या बेटा ?”
“पिताजी...” बस, मेरे गले में जैसे कुछ फंस-सा गया। बमुश्किल शब्द निकले, “पिताजी, ठीक हो जाएंगे तो मैं कुछ दिनों के लिए आप लोगों को अपने यहाँ ले जाऊँगा। हवा-पानी बदल जाएगा।” मुझे अपने कहे शब्दों पर हैरत हो रही थी। क्या मैं यही कहना चाहता था !
“ये ठीक हो लें पहले...” अम्मा का कहते-कहते गला रुँध आया था, “वैसे भी तुम्हारे सिवा कौन है हमारा... तुम ही लोग तो हो।”
अम्मा के शब्द मेरे मर्म को छू रहे थे, अन्दर तक। मैं जानता था, यह अम्मा नहीं, अम्मा का दर्द बोल रहा था। उनको अपने यहाँ ले जाने की बात, मैंने उनका दिल रखने या उनका हौसला बढ़ाने के लिए कही थी। सच कहूँ तो मैं यह कहना ही नहीं चाह रहा था। मैं तो अपने लौटने की बात कहना चाहता था। यह तो मैं भी अच्छी तरह जानता था और अम्मा भी कि हम तीनों भाई अपनी-अपनी शादी के बाद उन्हें कितनी बार अपने-अपने यहाँ ले जा पाए हैं।
अब मुझे शर्म महसूस हो रही थी। मैं अपनी शर्म को मिटाने के लिए कमरे की दीवारों पर यूँ ही बेमतलब ताकने लगा था।

शाम को बाजार से सब्ज़ी लेकर लौटा तो बड़े भैया अम्मा से कह रहे थे–
“अम्मा, मैं रात की गाड़ी पकड़ लेता हूँ। सुबह आफिस ज्वाइन कर लूँगा। टूर से लौटा था तो सीधे इधर ही आ गया, तार पाकर। आफिस से छुट्टी भी नहीं ली थी। अब तो पिताजी की हालत में सुधार है। चिन्ता की कोई बात नहीं है। ठीक हो जाएगे जल्द।” भैया बोले जा रहे थे और अम्मा चुपचाप सुन रही थी। राज भैया भी समीप ही बैठे थे। खामोश। कमरे में मेरे घुसते ही बड़े भैया बोले, “राज और ब्रज तो हैं ही न। ऐसी-वैसी बात हो तो मुझे खबर कर देना।”
“भैया, जाना तो मुझे भी था...” इस बार राज भैया के होंठ हिले थे, “आप तो जानते ही हैं, मेरी नौकरी टेम्परेरी है। छुट्टी भी बड़ी मुश्किल से मिली है। वे लोग मौका देखते हैं अपना आदमी फिट करने के लिए। आप यहाँ रहते तो...”
किशन भैया कुछ देर सोच में पड़ गए थे। मेरे भीतर भी कुलबुलाहट होने लगी थी। अब तक दबा कर रखी बात बाहर निकलने को उतावली हो रही थी। लेकिन सहसा मेरी नज़रें अम्मा पर स्थिर हो गईं। अम्मा जहाँ बैठी थीं, वहीं स्थिर हो गई थीं, मूर्ति की तरह।
काफी देर बाद तने हुए सन्नाटे को किशन भैया ने तोड़ा, “अच्छा तो तुम भी चलो। पिताजी तो ठीक हैं। इतना घबराने या चिन्तित होने की ज़रूरत नहीं। अब हमें भी नौकरी की वजह से जाना पड़ रहा है, वरना ऐसे स्थिति में हमारा जाने को मन करता है भला ?”
फिर, मेरी ओर देखते हुए बोले, “ब्रज, तुम तो हो ही। पिताजी की दवा वगैरह टाइम से देते रहना... कोई बात हो तो मुझे तार कर देना, मैं आ जाऊँगा।” और फिर जेब से रुपये निकालकर मुझे थमाते हुए बोले, “रख लो, वक्त-बेवक्त काम आ जाते हैं।”
अम्मा अब सुबकने लगी थीं। उनकी आँखों से आँसुओं की धाराएं बहने लगीं। मैं आगे बढ़कर अम्मा की बगल में बैठ गया था और अम्मा को सांत्वना देने लगा था। हाथ में पकड़े रुपयों को देखकर मेरी आँखें भी डबडबा आई थीं। समझ में नहीं आ रहा था, रुपये रख लूँ या भैया को लौटा दूँ।
जब, थोड़ी देर तक कोई किसी से कुछ नहीं बोला, तो किशन भैया चुपचाप उठे और तैयारी करने लगे। अम्मा ने पिंकी को आवाज़ लगाई, “पिंकी बेटा, खाना वगैरह तैयार कर ले। दोनों भाइयों को खिला कर भेजना, रात का सफर है।” और उठकर पिताजी के कमरे में चली गईं। शायद, वे हमारे सामने रोना नहीं चाहती थीं। निश्चित ही, पिताजी के कमरे में जाकर वे खूब रोयी होंगी।

किशन और राज भैया को ट्रेन में बिठा कर लौटा तो अम्मा ने पूछा, “ब्रज, तू तो छुट्टी लेकर आया होगा ?”
अचानक किए गए अम्मा के इस प्रश्न पर मैं अचकचा गया था। अम्मा के इस प्रश्न के पीछे का दर्द मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था। अम्मा से आँखें मिलाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। पिंकी-विक्की के पास बैठते हुए मैंने कहा, “सोचता हूँ, कल सुबह पोस्ट-आफिस जाकर सुधा को चिट्ठी डाल दूँ कि चिन्ता न करे... कुछ दिन लग जाएंगे और साथ ही, आफिस में भी छुट्टी बढ़ाने की अर्जी पोस्ट कर दूँ।”
अम्मा ने आगे न कुछ पूछा, न कहा। फिर वही चुप्पियाँ हमारे बीच तन गईं। एकाएक, इन चुप्पियों से मुझे ऊब होने लगी। पिताजी की बीमारी से हमारे भीतर भय, घबराहट, दुश्चिन्ता का होना स्वाभाविक था लेकिन लगातार चुप्पियों को अपने ऊपर ढोये रखना... मुझे ये चुप्पियाँ अनावश्यक लगने लगीं। इनकी गिरफ्त से बाहर होने की इच्छा हुई। मैं चाहता था कि बर्फ़-सी जमी चुप्पियाँ गलकर बह जाएं।... पूरे घर में सन्नाटे की तनी चादर तार-तार हो जाए।... घर में फैली मनहूसियत से निजात मिले। इन्हीं सब विचारों में डूबते-उतराते हुए मैंने सहसा विक्की से प्रश्न किया, “तेरी पढ़ाई कैसी चल रही है ?” फिर उसका उत्तर जानने से पहले ही अपने बेटे सोनू के बारे में बताने लगा। उसके ‘हाफ-ईअरली एक्जाम’ में आए कम नम्बरों के बारे में... उसके सारा दिन खेलते रहने के बारे में... पढ़ाई की ओर ध्यान न देने के बारे में... इसके बाद मैंने अपनी छोटी बेटी निक्की की शैतानियों का जिक्र छेड़ दिया। पिंकी-विक्की सुनकर हँसने लगे। मुझे उनका हँसना अच्छा लग रहा था। एकाएक, विक्की ने पूछा, “भैया, निक्की को पोयम आती है ?”
“हाँ, बहुत। अरे, वह तो डांस भी करती है।”
“अच्छा !” पिंकी ने आश्चर्य व्यक्त किया।
“टी वी में चित्रहार देखती है तो खूब नाचती है, मटक-मटककर।”
“भैया, आज भी तो चित्रहार है। टी.वी. चला दूँ ?” विक्की ने सहमते हुए मेरी ओर देखकर पूछा।
“चुप्प !” पिंकी ने आँखें तरेर कर विक्की को तुरन्त डपट दिया, “तुझे टी.वी. की पड़ी है। लोग क्या कहेंगे... घर में...।”
“घर में क्या ?...” पिंकी की बात पर एकाएक मैं चीख-सा उठा, “क्या है घर में ?... कोई मातम है क्या ?... पिताजी बीमार हैं... दवा-दारू चल रही है। ठीक हो जाएंगे।”
मेरी अनायास तेज हो उठी आवाज़ से कमरे का सन्नाटा काँपने लगा था। मैंने जल्द ही खुद को संयत किया और प्यार से धीमे स्वर में बोला, “तुम लोग खेलो, कूदो, पढ़ो। तुम्हें किसने रोका है ?...टी.वी. भी देखो, पर ध्यान रहे, पिताजी डिस्टर्ब न हो... उनके आराम में खलल न पड़े, बस।”
मेरी बात पर अम्मा ने भी पिंकी-विक्की की ओर देखते हुए कहा, “कुछ नहीं हुआ उन्हें। बीमार ही तो हैं, ठीक हो जाएंगे।”
तभी, मैंने उठकर टी.वी. आन कर दिया। वोल्यूम कम ही रखा। अम्मा उठकर पिताजी के कमरे में चली गईं। कुछ ही पल में स्क्रीन पर फोटो उभर आई। चित्रहार आरंभ हो चुका था। पहला ही गाना था।
अम्मा भी पिताजी के कमरे का दरवाजा हल्का-सा भीड़कर हमारे बीच आ बैठीं।

[आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली से वर्ष 1990 में प्रकाशित कहानी संग्रह “दैत्य तथा अन्य कहानियाँ” में इसी शीर्षक से तथा भावना प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली से वर्ष 2007 में प्रकाशित कहानी संग्रह “आख़िरी पड़ाव का दु:ख” में “चुप्पियों के बीच तैरता संवाद” शीर्षक से संग्रहित]

3 टिप्‍पणियां:

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

सृजन यात्रा इतने देशों में पढ़ा जा रहा है, यह देखकर प्रसन्नता हुई. तुम्हारा श्रम सार्थक हो रहा है.

चन्देल

बेनामी ने कहा…

Dhanyavaad Subhash ji, links bhejne ke liye..kaam ke beech,lunchtime mein aapki ek kahani padhee..bahut pasand aayi..ab baaki aaram se padhni hongi

Sandhya
typicallysandhya@gmail.com

अशोक लव ने कहा…

avaidh sambandhon par padee lathee sachmuch tilmila deti hai.
kahanee kee panjabiyat se parivesh jeevant ho gaya hai.