गुरुवार, 20 मई 2010

कविता


भाषा की नदी
सुभाष नीरव

हमारे बीच
भाषा की जो नदी
बहा करती थी
जाने क्या हुआ
एकाएक सूख गई

जिन शब्दों से
होता था हमारा सम्वाद
वे इतनी बार
कि किए गए प्रयोग
कि घिस घिस कर लुप्त हो गए

अब हमारे बीच
भाषा की सूखी नदी पसरी है

अब तुम
उस पार हो गुमसुम
और इस पार
मैं खामोश...

चलो,
अच्छा हुआ
सूख गई भाषा की नदी
अधरों का काम खत्म हुआ
कानों को भी मिलेगा आराम
लेकिन-
तुम्हारे नयनों में क्या है
मैं पढ़ सकता हूँ
मेरी आँखों की भाषा को
बांचना कठिन नहीं तुम्हारे लिए।

भाषा की नदियां
जब रिश्तों के बीच सूख जाती हैं
तब आँखें ही तो
हमारे अधर होती हैं
और हमारे कान भी !
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9 टिप्‍पणियां:

राजेश उत्‍साही ने कहा…

अच्‍छी कविता है। आपने सही कहा। हम कुछ शब्‍दों का इतना प्रयोग करते हैं कि वे अपना अर्थ ही खो बैठते हैं। लेकिन मुश्किल यह भी है कि नयनों की भाषा का अर्थ सबके लिए एक सा नहीं होता। पर फिर भी वह भाषा तो है।

बेनामी ने कहा…

प्रिय मित्र, mujhe to zyadah pata hi naheen tha ki tum bahut kam kar rahe ho. Main to samajh raha tha ki tum bhi so-called fhoonfaan lekhkhkon ji jamat mayn hoge jo acadmiyon ki membership ke liye gidgidate hain, paise bhejkar puraskar jutate hain.Galat dharna thi n? Hota ye hai ki vyakti ko janne ke liye uske dost dekhe jate hain. Jaise banye ki kichin, panjabi ka drawing room, muslim parivar ki tehzeeb aur chhade ka bedroom vagairah.Tumhare do-ek dost aise lage the ki....? chalo achcha hai. mubarak ho. Vaise atm-prachar se bacho.Self-marcketing zaroori hai, par product ke liye. tum product naheen ho. Thanx. Good By.

ranjan zaidi
zaidi.ranjan20@gmail.com

बेनामी ने कहा…

बहुत सुन्दर!
इला

बेनामी ने कहा…

सुभाष नीरव जी,
सानंद होंगे. ‘सृजन यात्रा’ के नए अंक में आपकी कविताएं पढ़ी. गहन संवेदनायुक्त हैं. मर्मस्पर्शी हैं. इसी तरह सतत लिखते रहिए. –
डॉ.(सुश्री) शरद सिंह, सागर
sharadsingh_1@yahoo.com

दिव्य नर्मदा divya narmada ने कहा…

sasuti ke bhandar kee,
badee apoorab baat.
jyon kharchai tyon-tyon badhai,
bin kharachae ghat jaat..

लता 'हया' ने कहा…

शुक्रिया सुभाष जी .
जल भी ज़रूरी है और भाषा भी
पर बेहतर लगी नदी की भाषा ही .
आपकी सृजन -यात्रा अब जारी रहे ... ..यही दुआ है ..

सहज साहित्य ने कहा…

बड़ी तपन -भरी है, यह क्रूर सदी। अभाओं की लू में सूखी, भाव-भरी नदी ।

Devi Nangrani ने कहा…

Kitna sahi likha hai. par kabhi kabhi apne banaye sanche mein apni hi marzi se dhal jaana aasaan ho jata hai. Man manmaaniyaan bhi to karta hai.....

chhaganlal garg ने कहा…

अब शब्द तरक्की पसंद हैं
बहुत हुआ
आत्मीय शब्दों का प्रयोग
फिर खोते हैं
अपना विपुल विस्तार
सिर्फ समा जाते हैं
प्रेम की एकागी नदी मे
जहाँ मात्र हम
ओर हमारा विस्तार
विस्तृत दुनिया
समाहित कर लेते बिन्दु मे
रहता कहां अस्तित्व
नहीं जरूरत शब्दों की
असीमता मे शब्दों का क्या काम
जहां शब्द चलते
भाव चलते
राग मोह फसते
ओर मिले क्या
कुछ मिला तो
विरह का भार
रूदन निस्सार
शायद शब्दों से नहीं
भीतरी भावों से
सृजन होता हैं ।