शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल




मित्रो

'सृजन-यात्रा' में इस माह अपनी लघुकथाओं के प्रकाशन के सिलसिले को विराम देते हुम 'माँ दिवस' पर अपनी एक ग़ज़ल आपसे साझा कर रहा हूँ। यह तो ग़ज़ल के पारखी ही बताएँगे कि यह ग़ज़ल है भी कि नहीं, पर 'माँ' को लेकर मेरे भीतर जो पवित्र भावना रही है, उसे इसी रूप में अभिव्यक्त कर पाया हूँ। आशा है, आप भी मेरे भीतर की भावना से सहमत होंगे…

सुभाष नीरव



माँ

दुनिया भर की दुख- तक़लीफें भुला लिया करता हूँ
माँ के दामन में जब सर को छुपा लिया करता हूँ

माँ देती जब ढारस मुझको मेरी नाकामी पे
अपने भीतर दूनी ताकत जुटा लिया करता हूँ

खफ़ा खफ़ा सी नींद मेरी तब मुझे मनाती है
माँ की बांहों को तकिया जब बना लिया करता हूँ

माँ ही मंदिर, माँ ही मस्जिद, माँ गिरजा - गुरद्वारा
रब के बदले माँ को मैं सर नवा लिया करता हूँ

यही हुनर सीखा है मैंने हर पल खटती माँ से
बोझ कोई भी हो हंस कर उठा लिया करता हूँ

मायूसी के अँधियारों में जब-जब घिर जाता हूँ
माँ की यादों के दीपक तब जला लिया करता हूँ


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15 टिप्‍पणियां:

सहज साहित्य ने कहा…

दिल को छू गई आपकी यह भावपूर्ण कविता ।

Dr Varsha Singh ने कहा…

भावपूर्ण ग़ज़ल के लिए बधाई।

PRAN SHARMA ने कहा…

MAA KO SAMARPIT AAPKEE GAZAL SE
MERA MAN BHEEG GAYAA HAI .

शकुन्तला बहादुर ने कहा…

मन की गहराइयों से निकले मन को छूने वाले भावों की सहज सरल किन्तु प्रभावी अभिव्यक्ति है।
इससे बढ़कर माँ के प्रति और क्या श्रद्धांजलि हो सकती है? बधाई सुभाष जी !!!

ओमप्रकाश यती ने कहा…

माँ पर एक मार्मिक रचना के लिये साधुवाद....ओमप्रकाश यती

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई सुभाष,

मां को समर्पित तुम्हारी यह गज़ल अंदर तक छू गयी. बहुत अच्छी और मार्मिक गज़ल.

बधाई.

चन्देल

KAHI UNKAHI ने कहा…

बहुत भावप्रवण ग़ज़ल है...बधाई...।
प्रियंका

Rachana ने कहा…

kya hi sunder gazal hai
hunar wala sher ti kamal ka hai
bahut bahut badhai
saader
rachana

बेनामी ने कहा…

पढ़ कर माँ कृतज्ञ ज़रूर हुई होंगी ! सुन्दर रचना की बधाई स्वीकार करें !
Rekha Maitra
rekha.maitra@gmail.com

Bobby ने कहा…

बहुत अच्छी रचना है... बधाई...!

सुनील गज्जाणी ने कहा…

bhai saab
pranam !
behad sunder bahivyakti , har sher sunder hai , dil ko choone wala ! sadhuwad , badhai !
saadar !

mamta ने कहा…

भावप्रवण ग़ज़ल है...बधाई...mamta

देवमणि पाण्डेय ने कहा…

अच्छी रचना है, बधाई। छिपा की जगह 'छुपा'और निवा की जगह 'नवा' कर दीजिए तो बेहतर होगा।
देवमणि पाण्डेय (मुम्बई)

Devi Nangrani ने कहा…

Neerav ji
aapki ghazal ka kathya aur shipl bahut hi accha laga. har sher ek sampoorn bimb ukerne mein saksham hai
shubhkamanon sahit

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

बड़ी ही सरलता और सहजता से अनुभूतियों को व्यक्त कर अंतर्मन को छू लिया है.