गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

कविता




पढ़ना चाहता हूँ एक अच्छी कविता
सुभाष नीरव

मैं पढ़ना चाहता हूँ
एक अच्छी कविता।

कविता
कि जिसे पढ़कर
खुल जाएं
बाहर-भीतर के किवाड़
मन का कोना-कोना
गमकने-महकने लगे
ताज़ी हवा से।

कविता
कि जिसे पढ़कर
मन के अँधेरों में
उतर आए
रोशनी की लकीर।

पढ़ना चाहता हूँ मैं
एक अच्छी कविता।

एक ऐसी कविता
जो उतरे मेरे भीतर
जैसे उतरते हैं
पहाड़ों पर से
घाटियों में
जल-प्रपात
अपने मधुर संगीत के साथ।

कविता
तुम आओ तो इसी तरह आना
मेरे पास !
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(कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित)

12 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

कविता ...आओ तो इसी तरह ...
महकती ...बरसती ....

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर!

दिव्य नर्मदा ने कहा…

नीरव में कविता मिली, महानगर में शोर.
कलकल-कलरव सुन 'सलिल', ले आनंद बटोर.
किलकिल से रह दूर तू, मत सुख को परिभाष.
सुख पाया उसने सदा, जो हो सका सुभाष.
जो हो सका सुभाष, उसे जग मने सविता.
शब्द-शब्द से सृजता वह नीरव में कविता..

लता 'हया' ने कहा…

हर रचना एक से बढ़कर एक है ; जितना पढ़ सकी उनमें ठोकर बेहतरीन लगी ;
मैं भी हर तरह के ज़ख्मों की ज़बान सीख चुकी
अब समझ लेती हूँ वो बात जो ठोकर बोले
बाकि भी जल्द ही पढूंगी

PRAN SHARMA ने कहा…

SAHAJ AUR ACHCHHEE KAVITA KE LIYE
BADHAAEE.

बलराम अग्रवाल ने कहा…

अच्छी कविता भी हमेशा अच्छे पाठक की तलाश में घूमती है, तुम तक पहुँचेगी जरूर।

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता है बधाई

भगीरथ ने कहा…

mahakati kavita ke liye badhai

अलका सिन्हा ने कहा…

Subhashji,

Maine padha ek achhi kavita ka aahwan / Aur mehsoos kiya / Ki jor-jor se bajne lage bheetar-bahar ke kiwar / Unchi building ki saatween manzil se / Foot ker behne laga jal prapat / Man ke andheron me ubharne lagi / Mehakti - gamakti roshni ki lakir ! / Sach, kitni samarthyawan hoti hai rachna / Ki jiske aahwan bhar se / Ghat jata hai itna !

-- Alka Sinha

सुभाष नीरव ने कहा…

अलका जी, आपने तो यह कविता पहले भी पढ़ी है। जब पुस्तक आई थी और आप इस पर बोलना चाहती थीं। शायद एक दो गोष्ठियों में सुनी भी हो। पर कोई कविता अपने पुनर्पाठ में पाठक को किस नये अर्धों तक ले जाती है, यह सिद्ध होता है आपकी टिप्पणी से, आपको कविता ने इतना स्पर्श किया, सचमुच मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। अपने उद्गारों को व्यक्त किया और मुझ तक ही नहीं, अन्य पाठकों तक भी पहुंचाया, इसके लिए शुक्रिया शब्द बहुत छोटा है।
सुभाष नीरव

MUFLIS ने कहा…

कविता
कि जिसे पढ़ कर
मन के अंधेरों में
उतर आये
रौशनी की लकीर ....

अनुपम काव्य के अनूठे रूप को
नए सिरे से परिभाषित करती
आपकी बहुत ही सुन्दर रचना
सिर्फ पढने को नहीं,,,
गुनगुनाने को मन करता है

अभिवादन स्वीकारें .

sangeeta ने कहा…

मैंने अपनी पहली हिंदी कविता लिखी , पता नहीं कविता के पैमाने पर कहाँ है पर आपका प्रोत्साहन पाकर धन्य हूँ .
कविता तुम आओ तो इसी तरह आना , मेरे पास ........ऐसा लगा मेरे ही मन की बात है.