शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

कविता

परिन्दे
सुभाष नीरव


परिन्दे
मनुष्य नहीं होते।

धरती और आकाश
दोनों से रिश्ता रखते हैं परिन्दे।

उनकी उड़ान में है अनन्त व्योम
धरती का कोई टुकड़ा
वर्जित नहीं होता परिन्दों के लिए।

घर-आँगन, गाँव, बस्ती, शहर
किसी में भेद नहीं करते परिन्दे।

जाति, धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय से
बहुत ऊपर होते हैं परिन्दे।

मंदिर में, मस्जिद में, चर्च और गुरुद्वारे में
कोई फ़र्क नहीं करते
जब चाहे बैठ जाते हैं उड़कर
उनकी ऊँची बुर्जियों पर बेखौफ!

कर्फ्यूग्रस्त शहर की
खौफजदा वीरान-सुनसान सड़कों, गलियों में
विचरने से भी नहीं घबराते परिन्दे।

प्रांत, देश की हदों-सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिन्दे।
इन्हें पार करते हुए
नहीं चाहिए होती इन्हें कोई अनुमति
नहीं चाहिए होता कोई पासपोर्ट-वीज़ा।

शुक्र है-
परिन्दों ने नहीं सीखा रहना
मनुष्य की तरह धरती पर।
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28 टिप्‍पणियां:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

परिन्दों ने नही सीखा मनुष्य की तरह धरती पर रहना....
बहुत सुन्दर.

M VERMA ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

परिन्दे नहीं टिकते धरती पर
देख लिया होगा इंसानों की दरिन्दगी

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत रचना ...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना मंगलवार 23 -11-2010
को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


http://charchamanch.blogspot.com/

PRAN SHARMA ने कहा…

KAVITA PRABHAAVSHALEE HAI.KAVITA
PADH KAR MUJHE APNEE GAZAL KAA
MATLAA YAAD AA GAYAA HAI --

UDTE HAIN HAZARON AAKASH MEIN PANCHHEE
OONCHEE NAHIN HOTEE PARWAAZ
HARIK KEE

बलराम अग्रवाल ने कहा…

अपहृत सीता को बचाने के लिए रावण से जूझने वाला पहला प्राणी 'जटायु' एक परिंदा ही था। इसलिए केवल निरीह और असहाय भी नहीं होते हैं परिंदे। बहुत अच्छी कविता लिखी है।

KAHI UNKAHI ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना...बधाई...।

प्रियंका
www.priyankakedastavez.blogspot.com

अनुपमा पाठक ने कहा…

बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त की है परिंदों की जिंदगी!!!!
मानव जीवन कई विवशताओं से जुड़ा है , परिंदों सी किस्मत कहाँ यहाँ!

निर्मला कपिला ने कहा…

शुक्र है
परिन्दों ने नही सीखा
मनुशःय की तरह रहना।
बहुत सुन्दर लगी आपकी रचना
बधाई।

भारतेंदु मिश्र ने कहा…

बधाई,सुन्दर कविता के लिए। सुभाष जी परिन्दे कई मायने मे आदमी से बेहतर होते है

Dorothy ने कहा…

परिंदों के माध्यम से अपने आस पास के परिवेश में मौजूद विसंगतियों और कटु सच्चाईयों से रू-ब-रू कराती, भावपूर्ण और सटीक अभिव्यक्ति, जो किसी को भी सोचने के लिए विवश कर दे. आभार.
सादर,
डोरोथी.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

मंदिर में ,मस्जिस में , चर्च और गुरूद्वारे में

कोई फर्क नहीं करते परिंदे ....

बहुत खूब ....सुभाष जी ...

सच्च हमें परिंदों से सीख लेनी चाहिए ....!!

सहज साहित्य ने कहा…

बेजोड़ रचना । इस रचना को पढ़ने का सौभाग्य हमारे छात्रों को भी मिल रहा है ।

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई, बहुत सुन्दर कविता है. मनुष्येतर प्राणी मनुष्य के साथ रहकर भी उस जैसा नहीं बन पाते.

परिन्दों को माध्यम बनाकर तुमने बहुत बड़ी बात कह दी है.

चन्देल

वाणी गीत ने कहा…

नहीं सीखा परिंदों ने इनसान की तरह रहना ...
इसलिए ही तो मुक्त आकाश है उनके लिए ...
सुन्दर अभिव्यक्ति !

मंजुला ने कहा…

bahut sundar rachna...

सुनील गज्जाणी ने कहा…

subhash jee
pranam !
achchi abhivyakti achchi rachna hume padhwane k liye aap ka aabhar sadhuwad ,
saadar

उमेश महादोषी ने कहा…

स्वच्छन्दता का सही मतलब जानते हैं परिंदे। इसीलिए खौफ और सीमाओं से परे उसका पूरा आनंद ले पाते हैं। सुन्दर कविता।

vipin.arora9 ने कहा…

प्रणाम,बहुत अच्छी कविता है

सुरेश यादव ने कहा…

सुन्दर कविता के लिए बधाई हो नीरव जी .

ashok andrey ने कहा…

priya bhai subhash jee aapki yeh kavitaa bahut prabhavshali hai man par gehraa prabhav chhodtii hai, vakeii-
prindo ne nahiin seekha rehnaa
manushya kii tarah dhartii par.
iss bahut sundar abhivyakti ke liye badhai.

MANI KA HASHIYA ने कहा…

बहुत बड़ी और खरी बात कह दी आप ने...। मेरी बधाई...।
www.manikahashiya.blogspot.com

प्रदीप कांत ने कहा…

वपरिन्दों ने नही सीखा मनुष्य की तरह धरती पर रहना....

काश आगे भी न सीखें ...

subhash chander ने कहा…

vah...vah aur vaaaa...h.

subhash chander ने कहा…

vaah..bahut sundar kavita hai,badhai

sanju ने कहा…

नहीं सीखा परिंदों ने इनसान की तरह रहना
बहुत सुंदर कविता के लिए बधाई...।

बेनामी ने कहा…

Dear Subhashji
Namaskar.
Parende kavita bahut hi achhi lagi ,dusri dono kavitayen bhi achi hai par parende bahut kuchh kahti hai jo aaj ke dour ka satye hai.
Shubhkamnayon ke saath,
Dr.Anjana Sandhir

manukavya ने कहा…

काश !! हम मनुष्य कुछ सीख लेते इन परिंदों से....