रविवार, 12 दिसंबर 2010

कविता



बधाइयों की भीड़ में चिंतामग्न अकेला व्यक्ति
सुभाष नीरव

'जब न मिलने के आसार बहुत हों
जो मिल जाए, वही अच्छा है'
एक अरसे के बाद
सुनने को मिलीं ये पंक्तियाँ
उनके मुख से
जब मिला उन्हें लखटकिया पुरस्कार
उम्र की ढलती शाम में
उनकी साहित्य-सेवा के लिए ।

मिली बहुत-बहुत चिट्ठियाँ
आए बहुत-बहुत फोन
मिले बहुत-बहुत लोग
बधाई देते हुए।

जो अपने थे
हितैषी थे, हितचिंतक थे
उन्होंने की जाहिर खुशी यह कह कर
'चलो, देर आयद, दुरस्त आयद
इनकी लंबी साधना की
कद्र तो की सरकार ने ...
वरना
हकदार तो थे इसके
कई बरस पहले ... ।'

जो रहे छत्तीस का आंकड़ा
करते रहे ईर्ष्या
उन्होंने भी दी बधाई
मन ही मन भले ही वे बोले
'चलो, निबटा दिया सरकार ने
इस बरस एक बूढ़े को ...'

बधाइयों के इस तांतों के बीच
कितने अकेले और चिंतामग्न रहे वे
बत्तीस को छूती
अविवाहित जवान बेटी के विवाह को लेकर
नौकरी के लिए भटकते
जवान बेटे के भविष्य की सोच कर
बीमार पत्नी के मंहगे इलाज, और
ढहने की कगार पर खड़े छोटे से मकान को लेकर ।

जाने से पहले
इनमें से कोई एक काम तो कर ही जाएँ
वे इस लखटकिया पुरस्कार से
इसी सोच में डूबे
बेहद अकेला पा रहे हैं वे खुद को
बधाइयों की भीड़ में ।
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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

कविता

परिन्दे
सुभाष नीरव


परिन्दे
मनुष्य नहीं होते।

धरती और आकाश
दोनों से रिश्ता रखते हैं परिन्दे।

उनकी उड़ान में है अनन्त व्योम
धरती का कोई टुकड़ा
वर्जित नहीं होता परिन्दों के लिए।

घर-आँगन, गाँव, बस्ती, शहर
किसी में भेद नहीं करते परिन्दे।

जाति, धर्म, नस्ल, सम्प्रदाय से
बहुत ऊपर होते हैं परिन्दे।

मंदिर में, मस्जिद में, चर्च और गुरुद्वारे में
कोई फ़र्क नहीं करते
जब चाहे बैठ जाते हैं उड़कर
उनकी ऊँची बुर्जियों पर बेखौफ!

कर्फ्यूग्रस्त शहर की
खौफजदा वीरान-सुनसान सड़कों, गलियों में
विचरने से भी नहीं घबराते परिन्दे।

प्रांत, देश की हदों-सरहदों से भी परे होते हैं
आकाश में उड़ते परिन्दे।
इन्हें पार करते हुए
नहीं चाहिए होती इन्हें कोई अनुमति
नहीं चाहिए होता कोई पासपोर्ट-वीज़ा।

शुक्र है-
परिन्दों ने नहीं सीखा रहना
मनुष्य की तरह धरती पर।
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रविवार, 31 अक्टूबर 2010

कविता



मित्रों, पिछले कुछ माह से घर-परिवार और कार्यालयी उलझनों, परेशानियों के चलते तथा आँख के आप्रेशन के कारण अपने ब्लॉग ‘सृजन-यात्रा’ पर ही नहीं अपितु अपने अन्य ब्लॉगों पर भी ध्यान नहीं दे पाया। स्थितियाँ कुछ बेहतर हुईं तो आज छूटे हुए कामों को पूरा करने का यत्न कर रहा हूँ। ‘सृजन-यात्रा’ में अपनी कुछ कहानियों के बाद कविताओं के प्रकाशन का सिलसिला मैंने आरंभ किया था। इस पोस्ट में अपनी कविता ‘कविता मेरे लिए’ इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ कि दीपावली का शुभ-पर्व करीब है और मेरी इस कविता में ‘शब्दों’ को ‘रौशनी’ बनाने की बात आई है। इस कविता को आप सबके सम्मुख दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ रख रहा हूँ…

कविता मेरे लिए

सुभाष नीरव

कविता की बारीकियाँ
कविता के सयाने ही जाने।

इधर तो
जब भी लगा है कुछ
असंगत, पीड़ादायक
महसूस हुई है जब भी भीतर
कोई कचोट
कोई खरोंच
मचल उठी है कलम
कोरे काग़ज़ के लिए।

इतनी भर रही कोशिश
कि कलम कोरे काग़ज़ पर
धब्बे नहीं उकेरे
उकेरे ऐसे शब्द
जो सबको अपने से लगें।

शब्द जो बोलें तो बोलें
जीवन का सत्य
शब्द जो खोलें तो खोलें
जीवन के गहन अर्थ।

शब्द जो तिमिर में
रौशनी बन टिमटिमाएँ
नफ़रत के इस कठिन दौर में
प्यार की राह दिखाएँ।

अपने लिए तो
यही रहे कविता के माने।

कविता की बारीकियाँ तो
कविता के सयाने ही जाने।
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(कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित)

शनिवार, 7 अगस्त 2010

कविता

बेहतर दुनिया का सपना देखते लोग
सुभाष नीरव


बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग इस दुनिया में
जो चढ़ते सूरज को करते हैं नमस्कार
जुटाते हैं सुख-सुविधाएँ और पाते हैं पुरस्कार।

बहुत बड़ी गिनती में हैं ऐसे लोग
जो देख कर हवा का रुख चलते हैं
जिधर बहे पानी, उधर ही बहते हैं।

बहुत अधिक गिनती में हैं ऐसे लोग
जो कष्टों-संघर्षों से कतराते हैं
करके समझौते बहुत कुछ पाते हैं।

कम नहीं है ऐसे लोगों की गिनती
जो पाने को प्रवेश दरबारों में
अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं।

रीढ़हीन लोगों की इस बहुत बड़ी दुनिया में
बहुत कम गिनती में हैं ऐसे लोग जो-
धारा के विरुद्ध चलते हैं
कष्टों-संघर्षों से जूझते हैं
समझौतों को नकारते हैं
अपना सूरज खुद उगाते हैं।

भले ही कम हैं
पर हैं अभी भी ऐसे लोग
जो बेहतर दुनिया का सपना देखते हैं
और बचाये रखते हैं अपनी रीढ़
रीढ़हीन लोगों की भीड़ में।
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(कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित)

रविवार, 4 जुलाई 2010

दो कविताएं/सुभाष नीरव



आदमी की फितरत

पहले तुमने मुझे
अपने होंठों से लगाया
फिर आँच दे दी
मेरा जीवन शुरू हो गया

उठाते रहे लुत्फ़ तुम
कश-दर-कश
जब तक मुझमें आँच थी

पर क्या मालूम था मुझे
जब यही आँच बनने लगेगी खतरा
तुम्हारी उंगलियों के लिए
तुम मुझे फर्श पर फेंक
अपने जूते की नोक से
बेरहमी से मसल दोगे।
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शिखरों पर लोग

जो कटे नहीं
अपनी ज़मीन से
शिखरों को छूने के बाद भी
गिरने का भय
उन्हें कभी नहीं रहा

जिन्होंने छोड़ दी
अपनी ज़मीन
शिखरों की चाह में
वे गिरे
तो ऐसे गिरे
न शिखरों के रहे
न ज़मीन के।
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(कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित)

शनिवार, 12 जून 2010

कविता



धारा के विरुद्ध
सुभाष नीरव


बने बनाये साँचों में ढलना
बहुत आसान होता है

कठिन होता है
अपने लिए अलग साँचा बनाना
और खुद को उसमें ढालना

ऐसा करके देखो-
अलग दिखोगे।

धारा के साथ
हर कोई बह सकता है
कठिन होता है
धारा के विरुद्ध तैरना

तैर कर देखो-
अलग दिखोगे।

पतंग जब तक
हवा के साथ होती है
उड़ती है पर
ऊँचाइयाँ नहीं छूती

होती है जब
हवा के विरुद्ध
उठती है ऊपर, बहुत ऊपर
और दीखती है
सबसे अलग आकाश में !
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(कविता संग्रह “रोशनी की लकीर” में संग्रहित)

गुरुवार, 20 मई 2010

कविता


भाषा की नदी
सुभाष नीरव

हमारे बीच
भाषा की जो नदी
बहा करती थी
जाने क्या हुआ
एकाएक सूख गई

जिन शब्दों से
होता था हमारा सम्वाद
वे इतनी बार
कि किए गए प्रयोग
कि घिस घिस कर लुप्त हो गए

अब हमारे बीच
भाषा की सूखी नदी पसरी है

अब तुम
उस पार हो गुमसुम
और इस पार
मैं खामोश...

चलो,
अच्छा हुआ
सूख गई भाषा की नदी
अधरों का काम खत्म हुआ
कानों को भी मिलेगा आराम
लेकिन-
तुम्हारे नयनों में क्या है
मैं पढ़ सकता हूँ
मेरी आँखों की भाषा को
बांचना कठिन नहीं तुम्हारे लिए।

भाषा की नदियां
जब रिश्तों के बीच सूख जाती हैं
तब आँखें ही तो
हमारे अधर होती हैं
और हमारे कान भी !
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