मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

लघुकथा





मित्रो
'सृजन-यात्रा' ब्लॉग पर जनवरी 2011 से मैंने अपनी लघुकथाओं का प्रकाशन प्रारंभ किया था। अब तक कुल छह लघुकथाएं ही प्रकाशित हुई हैं। अपनी सभी लघुकथाएं एक एक करके मैं 'सृजन-यात्रा' में प्रकाशित करुँगा। मेरी ये सभी लघुकथाएं शीघ्र ही पुस्तक रूप में भी आपके समक्ष होंगी - 'सफ़र में आदमी' शीर्षक से जो भावना प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित होने जा रहा है। इसी संग्रह में से इस बार प्रस्तुत है एक और लघुकथा- 'अकेला चना'... आशा है, आप अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवश्य अवगत करायेंगे।
आप सबको दीप-पर्व दीपावली की अनेक शुभकामनाएं....
सुभाष नीरव


अकेला चना
सुभाष नीरव

बस पहले ही आधा घंटा लेट हो चुकी थी। दफ्तर जाने वाले सभी यात्री चीख-चिल्ला रहे थे। रास्ते में चैकिंग-स्टाफ खड़ा था। बस रुकवाकर चैकिंग की जाने लगी। सभी गुस्से में बड़बड़ाने लगे। पिछले दो दिनों से मैं लेट पहुंच रहा था। बॉस ने कल वार्निंग भी दी थी। मुझसे नहीं रहा गया।
''बस पहले ही आधा घंटा लेट है। इसे रोककर चैकिंग करने से हम और लेट हो जायेंगे। आप चलती बस में चैकिंग क्यों नहीं करते ?'' सीट से उठकर मैंने चैकिंग-स्टाफ से कहा।
''तू म्हारा अफसर लागै है के ?'' उनमें से एक बोला, ''हमणै आपणी ड्यूटी करणी सै। बस लेट हो रीयै तो हम के करैं ?''
''यह गलत तरीका है आपका...!'' मैंने रोष प्रकट किया। मुझे लगा, मेरी आवाज़ हद से ज्यादा तेज़ हो गयी थी।
''घणा शोर नी कर, बस चैक होण दे।''
''चलती बस भी चैक हो सकती है। बेवजह आप बस को नहीं रोक सकते। हम सब लोग दफ्तर के लिए पहले ही लेट हुए जा रहे हैं।'' मैं अकेला ही उनसे अड़ गया।
''रोक कै ई होगी चैक...भले ही घंटा लागै।'' दूसरा चैकर मुझे घूरते हुए बोला, ''चल, आपणा टिकट दिखा।''
मैंने खीझते हुए अपना टिकट उसे थमा दिया। वह टिकट लेकर बस से नीचे उतर गया और बोला, ''इब तू नीचे आ जा... घणा शोर मचावै था, बेटिकट चले है...।''
मैंने प्रतिवाद किया, ''मेरा टिकट आपके हाथ में है, मैं बेटिकट नहीं हूँ ?''
वह हँसा। सभी चैकर मुझे घेरकर खड़े हो गये।
''इस बस का टिकट ना है ये।''
“इसी बस का है ये टिकट…” मैं लगभग चीख ही पड़ा था।
''हमणै बेईमान बताण लाग रीया सै...चल।'' उसने मुझे एक ओर धकेला और बस को चलने की व्हिसिल दे दी।
एक क्षण मैंने जाती हुई बस की ओर देखा। बस में बैठे हुए लोग उपहासभरी दृष्टि से मेरी ओर देख रहे थे।
''घणा नेता नी बणा करते... चल, निकाल सौ रुपइया...।''
हाथों में पकड़ी सौ रुपये की पर्ची को मैंने एक बार गुस्से से देखा और फिर दांत पीसते हुए उसे चिन्दी-चिन्दी करके वहीं हवा में बिखेर दिया।

शनिवार, 10 सितंबर 2011

लघुकथा


अच्छा तरीका

सुभाष नीरव


राकेश ने एम.ए. अंग्रेजी विषय लेकर किया था और मैंने हिन्दी विषय लेकर। दो सालों की बेकारी के बाद वह शहर के एक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने लगा था। मैं गाँव में ही रह गया और अभी भी बच्चों को इकट्ठा करके 'अ आ इ ई' पढ़ा रहा हूँ।

एक बार मुझे शहर जाना पड़ा। ठहरने के लिए मैं राकेश के घर चला गया। सुबह-सुबह जब मैं उसके घर पहुँचा तो वह कुछेक बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रहा था। दो-तीन बैच पढ़ाकर नौ बजे वह स्कूल चला गया। शाम को चार बजे के करीब लौटा। कुछ बच्चे पहले से ही आये बैठे थे। वह तुरन्त उनको पढ़ाने बैठ गया। आठ-आठ, दस-दस बच्चों के कई बैच उसने रात नौ बजे तक पढ़ाये।

जब सभी बच्चे पढ़कर चले गये तो मैंने उससे पूछा, ''राकेश, इतने बच्चों को तुम ट्यूशन....।''

''इसमें क्या मुश्किल है ? सीधा-सा तरीका है।''

''क्या ?'' मैंने उत्सुकता जाहिर की।

वह मेरे बहुत करीब खिसक आया जैसे कोई राज़ की बात बताने जा रहा हो।

''बात यह है, यार, परीक्षा के दिनों में अंग्रेजी विषय की कापियाँ मैं ही जाँचता हूँ। छमाही परीक्षा में मैं अधिकांश बच्चों को फेल कर देता हूँ, या बहुत कम नंबर देता हूँ। बच्चे हिन्दी में या किसी अन्य भाषा में भले ही कम नंबर लायें या फेल हो जायें, कोई भी अभिभावक यह नहीं चाहता कि उसका बच्चा अंग्रेजी में फिसड्डी रहे।''

''फिर ?''

''फिर क्या ?'' वह बोला, ''बस, कुछ ही दिनों बाद कुछ बच्चों के अभिभावक मुझसे मिलते हैं और अनुरोध करते हैं कि मैं उनके बच्चे को ट्यूशन पढ़ाऊँ। कुछेक अभिभावकों से मैं ख़ुद भी मिलता हूँ। उनसे कहता हूँ- देखिये, आपका बच्चा अंग्रेजी में बहुत कमजोर है। आप स्वयं भी इसे घर में पढ़ाया करें। बस, तुम तो जानते ही हो, आजकल किस अभिभावक के पास इतना समय है कि वह अपने बच्चों के संग सिर-खपाई करे। सो, वे कह उठते हैं- मास्टर जी, आप ही हमारे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया कीजिये न। और मैं स्वीकार कर लेता हूँ।''

मुझे अवाक् देखकर उसने अपनी दायीं आँख होले से दबाई और मुसकराकर बोला, ''क्यों, अच्छा तरीका है न?''

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सोमवार, 27 जून 2011

लघुकथा




रंग-परिवर्तन
सुभाष नीरव

आखिर मन्त्री बनने का मनोहर लाल जी का पुराना सपना साकार हो ही गया। शपथ-ग्रहण समारोह के बाद वह मंत्रालय के सुसज्जित कार्यालय में पहुँचे। वहाँ उनके प्रशंसकों का तांता लगा हुआ था। सभी उन्हें बधाई दे रहे थे।
देश-विदेश के प्रतिष्ठित चैनलों, पत्रों और पत्रिकाओं के सैकड़ों पत्रकार व संवाददाता भी वहाँ उपस्थित थे।
एक संवाददाता ने उनसे पूछा, ''मन्त्री बनने के बाद आप अपने मंत्रालय में क्या सुधार लाना चाहेंगे ?''
उन्होंने तत्काल उत्तर दिया, ''सबसे पहले मैं फिजूलखर्ची को बन्द करूंगा।''
''देश और देश की जनता के बारे में आपको क्या कहना है ?''
इस प्रश्न पर वह नेताई मुद्रा में आ गये और धारा-प्रवाह बोलने लगे, ''देश में विकास की गति अभी बहुत धीमी है। देश को यदि उन्नति और प्रगति के पथ पर ले जाना है तो हमें विज्ञान और तकनॉलोजी का सहारा लेना होगा। देश की जनता को धार्मिक अंधविश्वासों से ऊपर उठाना होगा। तभी हम इक्कीसवीं सदी में अपने पहुँचने को सार्थक सिद्ध कर सकेंगे।''
तभी, उनके निजी सहायक ने फोन पर बजर देकर सूचित किया कि छत्तरगढ़ वाले आत्मानंदजी महाराज उनसे मिलना चाहते हैं। मन्त्री जी ने कमरे में उपस्थित सभी लोगों से क्षमा-याचना की। सब-के-सब कमरे से बाहर चले गये।
महाराज के कमरे में प्रवेश करते ही, मन्त्री जी आगे बढ़कर उनके चरणस्पर्श करते हुए बोले, ''महाराज, मैं तो स्वयं आपसे मिलने को आतुर था। यह सब आपकी कृपा का ही फल है कि आज...''
आशीष की मुद्रा में महाराज ने अपना दाहिना हाथ ऊपर उठाया और चुपचाप कुर्सी पर बैठ गये। उनकी शान्त और गहरी आँखों ने पूरे कमरे का निरीक्षण किया और फिर यकायक चीख-से उठे, ''बचो, मनोहर लाल, बचो!.... इस हरे रंग से बचो। यह रंग तुम्हारी राशि के लिए अशुभ और अहितकारी है।''
मन्त्री महोदय का ध्यान कमरे में बिछे कीमती कालीन, सोफा-कवर्स और खिड़कियों पर लहराते पर्दों की ओर गया। पूरे कमरे में हरीतिमा फैली थी। अभी कुछ माह पहले ही पूर्व मन्त्री क़ी इच्छा पर इसे सुसज्जित किया गया था।
''जानते हो, तुम्हारे लिए नीला रंग ही शुभ और हितकारी है।'' महाराज ने चेताया।
मन्त्री महोदय ने तुरन्त निजी सचिव को तलब किया। उससे कुछ बातचीत की और फिर महाराज को साथ लेकर अपनी कोठी की ओर निकल गये।
अब मंत्रालय के छोटे-बड़े अधिकारी रंग-परिवर्तन के लिए युद्धस्तर पर जुटे थे।
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शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल




मित्रो

'सृजन-यात्रा' में इस माह अपनी लघुकथाओं के प्रकाशन के सिलसिले को विराम देते हुम 'माँ दिवस' पर अपनी एक ग़ज़ल आपसे साझा कर रहा हूँ। यह तो ग़ज़ल के पारखी ही बताएँगे कि यह ग़ज़ल है भी कि नहीं, पर 'माँ' को लेकर मेरे भीतर जो पवित्र भावना रही है, उसे इसी रूप में अभिव्यक्त कर पाया हूँ। आशा है, आप भी मेरे भीतर की भावना से सहमत होंगे…

सुभाष नीरव



माँ

दुनिया भर की दुख- तक़लीफें भुला लिया करता हूँ
माँ के दामन में जब सर को छुपा लिया करता हूँ

माँ देती जब ढारस मुझको मेरी नाकामी पे
अपने भीतर दूनी ताकत जुटा लिया करता हूँ

खफ़ा खफ़ा सी नींद मेरी तब मुझे मनाती है
माँ की बांहों को तकिया जब बना लिया करता हूँ

माँ ही मंदिर, माँ ही मस्जिद, माँ गिरजा - गुरद्वारा
रब के बदले माँ को मैं सर नवा लिया करता हूँ

यही हुनर सीखा है मैंने हर पल खटती माँ से
बोझ कोई भी हो हंस कर उठा लिया करता हूँ

मायूसी के अँधियारों में जब-जब घिर जाता हूँ
माँ की यादों के दीपक तब जला लिया करता हूँ


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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

लघुकथा



रफ़-कॉपी

सुभाष नीरव

बाबू रामप्रकाश खाना खा चुकने के बाद, रोज़ की तरह आज भी अपने कमरे में बैठकर ऑफिस से लाया काम करने में जुट गये। कुछ ही देर बाद, उनका दस वर्षीय बेटा रमेश कमरे में दाख़िल हुआ और समीप आकर बोला, ''पापा, आप मेरे रफ-काम के लिए कापी नहीं लाए ?''

बाबू रामप्रकाश पलभर अपनी याददाश्त को कोसते रहे। पिछले तीन दिनों से वह भूलते आ रहे थे। आज फिर उन्होंने बेटे को समझाने की कोशिश की, ''ओह बेटा, हम आज फिर भूल गये। देखो न, कितना काम रहता है! याद ही नहीं रहता, सच।''

''हम कुछ नहीं जानते। आप तीन दिन से टाले जा रहे हैं। हमें कापी आज ही चाहिए।'' रमेश ज़िद करने लगा।

''बेटा, रात को इस वक्त दुकानें भी बंद हो गयी होंगी। कल हम ज़रूर ला देंगे।''

पर, बेटा अड़ा रहा। बाबू रामप्रकाश सोच में पड़ गये। एकाएक उनकी नज़र मेज़ पर रखे पतले-से उस नये रजिस्टर पर पड़ी जिसे वह आज ही दफ़्तर से नयी एंट्री करने के लिए लाये थे।

''लो बेटा, तुम इस पर अपना रफ़-काम कर लिया करो।'' उन्होंने रमेश को रजिस्टर थमाते हुए कहा।

रमेश ने रजिस्टर को खोलकर देखा, ''पापा, इसमें तो खाने बने हुए हैं।''

''तुझे रफ़-काम करने से मतलब है या खानों से ?'' बाबू रामप्रकाश एकाएक गुस्सा हो उठे। रमेश रजिस्टर लिये सहमा हुआ-सा कमरे से बाहर निकल गया।

बेटे के चले जाने के बाद बाबू रामप्रकाश ने मन ही मन सोचा - कल फिर स्टेशनरी-क्लर्क को नया रजिस्टर इशू करने के लिए चाय पिला देंगे। चाय कॉपी से सस्ती पड़ती है। फिर प्रसन्न से ऑफिस से लाया दूसरा काम करने में जुट गए।

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शनिवार, 12 मार्च 2011

लघुकथा



बहुत-सी रचनाओं का जन्म हमारे कार्यक्षेत्र के अनुभवों से जुड़ा होता है। मेरी ऐसी अनेक कहानियाँ, लघुकथाएँ हैं जो मेरी रोजी रोटी से जुड़े कार्यक्षेत्र के तनावों में से ही उपजीं। यहाँ 'अपने क्षेत्र का दर्द' शीर्षक से जो लघुकथा प्रस्तुत की जा रही है, यह उन दिनों की उपज है जब मेरी ड्यूटी भारत सरकार के एक केन्द्रीय मंत्री के कार्यालय में थी। सन् 80-85 के बीच की बात होगी। मंत्रियों के दोहरे चरित्र मैंने तभी बहुत करीब से देखे। उनकी कथनी और करनी में बहुत बड़ा अन्तर देखने को मिला, आँखें फटी की फटी रह गईं। वो जो दिखते हैं, होते नहीं। जो होते हैं, वे दिखते नहीं। एक जबरदस्त तनाव और छटपटाहट के बीच हम पेट की खातिर कुछ नहीं कर पाते। परन्तु, उस ‘कुछ’ न कर पाने के अपराध बोध से लेखक मुक्ति का एक दूसरा रास्ता अपनाता है। मैंने भी अपनाया यानी अपने देखे-अनुभव किए को अभिव्यक्त करने का रास्ता। मैंने उस ‘सच’ को अपनी रचनाओं में रेखांकित कर अपने अपराधबोध और ग्लानि को कुछ कम करने का प्रयास किया और मैं सफल भी रहा। 'गोली दागो रामसिंह'(कहानी जो दिनमान टाइम्स, नई दिल्ली में प्रकाशित हुई), और 'रंग-परिवर्तन' (लघुकथा जो रमेश बत्तरा ने नवभारत टाइम्स में छापी) 'अपने क्षेत्र का दर्द' की भांति ऐसे ही माहौल से उपजी मेरी रचनाएँ हैं। 'गोली दागो रामसिंह' कहानी 'सृजन-यात्रा' में 'कहानियाँ' लेबल के अन्तर्गत प्रकाशित हो चुकी है और 'रंग परिवर्तन' लघुकथाओं के क्रम में आगे आपके समक्ष प्रस्तुत होगी।
'अपने क्षेत्र का दर्द' लघुकथा भी 'सारिका' में सन् 1986 के आसपास प्रकाशित हुई। इसे बलराम ने वर्ष 1988 में प्रकाशित 'हिंदी लघुकथा कोश' में मेरी अन्य लघुकथाओं के साथ शामिल किया था।
-सुभाष नीरव

अपने क्षेत्र का दर्द
सुभाष नीरव

मन्त्री जी के नाम आयी सारी-की-सारी डाक चपरासी ने मेज़ पर उसके सामने रख दी।
उन सबके बीच मुड़े-तुड़े मैले-से एक कागज ने उसका ध्यान अपनी ओर बरबस ही खींच लिया। यह अस्पष्ट शब्दों में लिखा एक पत्र था। उसने उसे निकाला और अन्त तक पढ़ा। पत्र का एक-एक शब्द एक गरीब और असहाय बाप की पीड़ा को व्यक्त कर रहा था जिसकी इकलौती बेटी को दहेज के भूखे भेड़ियों ने जिन्दा जला डाला था। इलाके के थानेदार ने ससुराल वालों के खिलाफ़ रपट लिखने की बजाय, उल्टा उसे ही बुरी तरह मारा-पीटा और धमकाया था। 'गरीबों के मसीहा', 'ईश्वर', 'देवता' आदि कितने ही विशेषणों से मन्त्री जी को सम्बोधित करते हुए उसने अपने पत्र में न्याय दिलाने की गुहार लगाई थी।
पत्र को पढ़कर उसे अपनी बेटी का ध्यान हो आया। आये दिन वह एक नयी माँग के साथ धकेल दी जाती है - मायके में। क्या किसी दिन उसे भी ? नहीं-नहीं... वह भीतर तक काँप उठा।
उसने तुरन्त सम्बन्धित प्रदेश के मुख्य मन्त्री के नाम चिट्ठी टाइप करवाई और मन्त्री जी के हस्ताक्षर के लिए उनके कमरे में भेज दी।
थोड़ी ही देर बाद, मन्त्री जी ने उसे बुलाया।
''यह चिट्ठी तुमने भिजवाई है ?''
''जी सर! बेचारे गरीब की बेटी को जिन्दा जला डाला दरिन्दों ने दहेज के लालच में। यही नहीं सर, इलाके के थानेदार ने रपट तक दर्ज नहीं की और उस बूढ़े को बुरी तरह मारा-पीटा भी...।''
''हूँ...'' मन्त्री जी ने एक बार उसकी ओर देखा। चिट्ठी मन्त्री जी की उँगलियों के बीच झूल रही थी, ''तुमने पत्र मुझे दिखलाने से पहले ही चिट्ठी तैयार करवा दी! मुझसे पूछा तक नहीं ?''
''जी मैंने...'' उसने हकलाते हुए कारण स्पष्ट किया, ''बात यह है सर, कि पिछले दिनों ऐसी ही एक चिट्ठी के जवाब में आपने सम्बन्धित प्रदेश के मुख्य मन्त्री के नाम इसी प्रकार की सख़्त चिट्ठी भिजवाई थी, सो मैंने...''
''चिट्ठी तैयार करने से पहले मुझसे पूछ लिया करो।'' कहते हुए मन्त्री जी ने अपनी उँगलियों के बीच झूलती हुई चिट्ठी को चिन्दी-चिन्दी कर नीचे रखी टोकरी में फेंका और बोले, ''तुम्हें मालूम है, वह हमारे संसदीय क्षेत्र का मामला था, और यह...''
मन्त्री जी के कमरे में से निकलते हुए उसे लगा, जैसे उसकी अपनी बेटी जिन्दा जला दी गयी हो और वह कुछ न कर पाने के लिए शापित हो।
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सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

लघुकथा



मित्रो,
जिस समय मैंने लघुकथा लेखन में प्रवेश किया उस समय लघुकथा लेखन में एक आन्दोलन- जैसी स्थिति थी। बड़ी व्यवसायिक पत्रिकाएँ तो लघुकथा के लिए स्थान बना ही चुकी थीं और उन्हें ससम्मान छापने भी लगी थीं। हिंदी की प्रसिद्ध कथा पत्रिका ‘सारिका’ के ‘लघुकथा विशेषांकों ने इसमें गति भी प्रदान की। इसके अतिरिक्त बहुत सी लघु- पत्रिकाएं भी मैदान में थीं जो पूरी तरह समर्पित भाव से लघुकथा के विकास और संवर्द्धन के लिए खुद को कटिबद्ध किये हुए थीं। मुझे याद आती हैं –‘लघु-आघात’ ‘मिनीयुग’ ‘क्षितिज’ ‘सनद’ पत्रिकाएँ जो अच्छी और मानक लघुकथाओं के प्रकाशन के लिए उस दिनों जानी जाती थीं और हर नया पुराना लेखक यदि कोई नई लघुकथा लिखता था तो इन पत्रिकाओं में उसे छपवाने के लिए लालायित रहता था। मेरी शुरूआती दौर की कई लघुकथाओं को ‘लघु-आघात’, ‘क्षितिज’ और ‘सनद’ में प्रकाशित होने का गौरव प्राप्त हुआ है। आरंभ में ये पत्रिकाएँ मुझे भाई रमेश बत्तरा उपलब्ध कराया करते थे, बाद में फिर मैं इनका सदस्य बन गया था और ये मुझे डाक से मिलने लग पड़ी थीं। भाई रमेश बत्तरा जब विवाह के बाद राजौरी गार्डन से नया गाजियाबाद शिफ्ट हुए तो मैं अक्सर अवकाश वाले दिन उनके घर चला जाता था। इसके दो कारण थे। एक तो उनके यहाँ ढेरों नई-पुरानी हिंदी-पंजाबी की पत्र-पत्रिकाएँ आया करती थीं जिनको देखने-पढ़ने का लालच मुझे खींच ले जाता था और दूसरा यह भी कि मैं उन दिनों मैं गाजियाबाद के बहुत निकट मुरादनगर में रहता था, जिसके कारण आने-जाने में कोई परेशानी नहीं आती थी। रमेश भाई ‘सारिका’ के दफ्तर में जब मिलते तो बहुत कम बोलते थे। उनके मुँह में पान होता और वह अपने काम में व्यस्त-से रहते। बीच-बीच में छोटी-छोटी कोई एक आध बात कर लेते थे। लेकिन घर पर वह खुलकर बात करते, घर-परिवार के बारे में, साहित्य के बारे में, नये लिखे के बारे में। कभी-कभी राजनीति के बारे में भी। वे मुझे अच्छी पत्रिकाओं में रचनाएँ भेजने के लिए प्रेरित करते रहते।

उन दिनों बहुत से ऐसे कॉमन-से विषय थे जिनपर हर कोई कलम चला रहा था। जैसे सामाजिक- राजनैतिक भ्रष्टाचार, पुलिस और नेताओं के चरित्र, आदि। दनादन लिखी जा रही लघुकथाओं की भीड़ में बहुत-सी अच्छी लघुकथाएँ भी दब कर रह जाती थीं। यहाँ प्रस्तुत मेरी लघुकथा ‘दिहाड़ी’ वर्ष 1984 में लिखी गई और ‘सारिका’ के वर्ष 1985 के लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई। कथाकार बलराम ने इसे मेरी अन्य लघुकथाओं के साथ “हिंदी लघुकथा कोश”(वर्ष 1988) में संकलित किया। यह लघुकथा भी मेरी अन्य लघुकथाओं की भाँति पंजाबी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर छपी।
-सुभाष नीरव


दिहाड़ी
सुभाष नीरव

महीने के आखिरी दिन चल रहे थे।
इन दिनों घर में राशन-पानी सब खत्म हो चुका होता है। जब वह ड्यूटी पर रहता था तो किसी तरह खींच-खाँचकर ले जाता था-पहली तारीख तक। पुलिस में सिपाही होने का यह फायदा तो था ही उसे। लेकिन पिछले दो महीनों से वह मेडिकल-लीव पर चल रहा था- पीलिया के कारण। उसने सरकारी अस्पताल के डॉक्टर के आगे बहुत मिन्नत-चिरौरी की कि उसे ड्यूटी दे दे, पर वह नहीं माना और एक महीने का रेस्ट और बढ़ा दिया।
सुबह बच्चे बिना खाये-पिये ही स्कूल चले गये थे। पत्नी ने पड़ोसियों से कुछ भी माँगने से साफ इन्कार कर दिया था। वह चुपचाप चारपाई पर लेटा सोचता रहा- सुबह तो बच्चे भूखे-प्यासे चले गये, शाम को भी क्या बिना खाये-पिये सोना पड़ेगा उन्हें ?
वह उठकर बैठ गया। बहुत देर तक सोचता रहा।
एकाएक उसकी नज़र खूँटी पर टँगी वर्दी पर टँगकर रह गयी।
शाम होते ही वह वर्दी पहनकर अपने इलाके में पहुँच गया।
रेहड़ी-पटरी वालों में उसे देखते ही हरकत आ गयी। बहुत दिनों बाद दिखाई दिया था वह। सब सलाम ठोंकने लगे। वह डंडा घुमाता हुआ सबके सामने से गुजरा- बेहद चौकन्नेपन और सावधानी के साथ।
''अरे रतन, तू तो मेडिकल-लीव पर था! ड्यूटी ज्वाइन कर ली क्या ?''
जिस बात का उसे डर था, वही हो गयी। घर वापसी के समय सामने से आते हुए रामसिंह ने रोककर पूछ ही लिया।
''नहीं यार, घर पर सारा दिन यूँ ही पड़े-पड़े बोर हो जाता हूँ। सोचा, थोड़ा टहल ही आऊँ। सो, इधर ही आ गया।'' उसने सफाई दी।
''वर्दी में हो, मैंने सोचा...''
''वो...वो क्या है कि पत्नी ने आज सभी कपड़े धोने के लिए भिगो दिये थे। सो, वर्दी ही पहनकर आ गया इधर।'' उसने मुस्कराते हुए बात को घुमाने की कोशिश की।
''और यह डंडा ?''
रामसिंह का यह प्रश्न डंडे की भाँति ही आया। उसे लगा, इस प्रहार से वह चारों खाने चित्त हो गया है।
''आदत-सी पड़ गयी है न। वर्दी पहनते ही डंडा हाथ में आ जाता है।''
और वे दोनों एक-साथ हँस पड़े।
रामसिंह से विदा ले, जब वह घर की ओर चला तो बहुत उत्साहित था। जेब में आयी दिहाड़ी को उसने टटोलकर देखा- काफी है।
लेकिन तभी एक बात उसके जेहन में तेजी से उभरी और सुन्न-सा करती चली गयी- कल फिर अगर रामसिंह या कोई और टकरा गया तो!
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